जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है, संतान की लंबी आयु, सुख और समृद्धि की कामना से किया जाने वाला महत्वपूर्ण व्रत है।
यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और उनके मंगलमय जीवन की कामना के लिए करती हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से जुड़ी परंपराओं के साथ होती है।
इस व्रत में कई स्थानों पर महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं। स्थानीय परंपराओं के अनुसार व्रत की विधि में अंतर हो सकता है।
मान्यता है, कि जीमूतवाहन ने नागवंश के एक बालक की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया था, इसलिए उन्हें त्याग और संतान-सुरक्षा से जोड़ा जाता है।
जितिया व्रत में जीमूतवाहन की कथा सुनने और उनका स्मरण करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
व्रत के दौरान महिलाएं पूजा स्थल को सजाकर जीमूतवाहन की प्रतिमा या चित्र स्थापित करती हैं और विधि-विधान से पूजा करती हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत में फलों, मिठाइयों और पारंपरिक प्रसाद का भोग लगाया जाता है। भोग की सामग्री क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
इस पर्व से जुड़ी लोकपरंपराओं में सरई की डाली, धागा और अन्य पूजन सामग्री का इस्तेमाल भी कई क्षेत्रों में किया जाता है।
बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ मिथिला क्षेत्रों में जितिया व्रत विशेष रूप से श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
जितिया पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि मातृ प्रेम और संतान के प्रति समर्पण का प्रतीक भी माना जाता है।
व्रत के दौरान महिलाएं परिवार की सुख-शांति और संतान के स्वास्थ्य के लिए पूजा, प्रार्थना और धार्मिक कथा करती हैं।
व्रत का पारण अष्टमी तिथि के बाद निर्धारित परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार किया जाता है। पारण का सही समय स्थान और पंचांग के अनुसार देखना चाहिए।
जीवित्पुत्रिका व्रत की सबसे खास बात यह है कि इसमें मां की संतान के प्रति ममता, त्याग और मंगलकामना धार्मिक आस्था के साथ जुड़ी दिखाई देती है।