मुंबई। देश में यदि किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन बैंक

ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड मामले में रिजर्व बैंक देगा पीड़ित को मुआवजा

ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड मामले में रिजर्व बैंक देगा पीड़ित को मुआवजा

मुंबई। देश में यदि किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड होता है तो बैंकों द्वारा उसे मुआवजा मिलेगा। भारतीय रिजर्व बैंक ने कम धनराशि के आनलाइन साइबर फ्राड के मामले में पीड़ितों को मुआवजा देने का एक फ्रेमवर्क पेश किया है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने स्मॉल वैल्यू डिजिटल फ्रॉड यानी छोटे मूल्य के डिजिटल बैंकिंग फ्रॉड ट्रांजैक्शंस से पीड़ित ग्राहकों को राहत देने के लिए एक नया फ्रेमवर्क प्रस्तावित किया है। इस प्रस्ताव के तहत अगर किसी व्यक्ति के साथ 50,000 रुपये तक का ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड होता है, तो उसे 85 फीसदी तक मुआवजा दिया जा सकता है। हालांकि इसकी अधिकतम सीमा 25,000 रुपये तय की गई है।

रिजर्व बैंक के प्रस्ताव के अनुसार यह नियम 1 जुलाई 2026 से इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शंस पर लागू होगा। आरबीआई ने प्रस्तावित फ्रेमवर्क पर सभी हितधारकों से 6 अप्रैल 2026 तक सुझाव मांगे हैं। यह प्रस्ताव आरबीआई द्वारा जारी ड्राफ्ट संशोधन का हिस्सा है। इस प्रस्ताव के अनुसार मुआवजा पाने के लिए ग्राहक को फ्रॉड की जानकारी पांच दिनों के भीतर अपने बैंक के साथ-साथ नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल या हेल्पलाइन पर भी देनी होगी।

आरबीआई द्वारा प्रस्तुत फ्रेमवर्क के मुताबिक यह मुआवजा व्यक्ति को उसके लाइफ टाइम में केवल एक बार ही मिलेगा। इसके लिए जरूरी होगा कि ग्राहक फ्रॉड होने के पांच दिनों के भीतर इसकी शिकायत दर्ज कराएं। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत मुआवजे का बड़ा हिस्सा आरबीआई वहन करेगा। साथ ही ग्राहक का बैंक और लाभार्थी बैंक भी इसमें हिस्सा देंगे। 

प्रस्ताव के फार्मूला के अनुसार फ्राड की स्थिति में 29,412 रुपये से कम नुकसान होने पर आरबीआई 65 फीसदी मुआवजा देगा और दोनों बैंक 10-10 फीसदी योगदान करेंगे। वहीं 29,412 रुपये से 50,000 रुपये के बीच नुकसान होने पर मुआवजा 25,000 रुपये तक सीमित रहेगा, जिसमें आरबीआई करीब 19,118 रुपये और दोनों बैंक लगभग 2,941-2,941 रुपये का भुगतान करेंगे।

आरबीआई ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर फ्रॉड बैंक की लापरवाही के कारण होता है तो ग्राहक की जिम्मेदारी शून्य होगी। साथ ही अगर ग्राहक पांच दिनों के भीतर अनधिकृत ट्रांजैक्शन की सूचना देता है तो तीसरे पक्ष के फ्रॉड में भी उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। बैंकों को 500 रुपये से अधिक के सभी इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शंस पर तुरंत एसएमएस अलर्ट भेजना होगा और 24 घंटे फ्रॉड रिपोर्ट करने की सुविधा देनी होगी। इसके अलावा बैंकों को शिकायत मिलने के बाद अधिकतम 30 दिनों के भीतर मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय करनी होगी।

आरबीआई के ड्राफ्ट प्रस्ताव में फ्रॉड के मामलों में बैंकों और कस्टमर्स की लापरवाही को भी बताया गया है। बैंक की लापरवाही में ज़रूरी सिक्योरिटी सिस्टम को लागू न करना, ट्रांज़ैक्शन अलर्ट न भेजना, रिपोर्टिंग चैनल न होना या कस्टमर की शिकायतों पर कार्रवाई में देरी शामिल हो सकती है।

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