एम्स दिल्ली में 22 किलो वजन और 98 सेमी कद वाली महिला की दुर्लभ लैप्रोस्कोपिक हिस्टेरेक्टॉमी सफल
नई दिल्ली। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के डॉक्टरों की मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम ने 44 वर्षीय महिला की दुर्लभ लैप्रोस्कोपिक हिस्टेरेक्टॉमी सफलतापूर्वक की। महिला का कद केवल 98 सेंटीमीटर और वजन 22 किलोग्राम था। वह गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस से भी पीड़ित थीं, जिसके कारण सर्जरी के दौरान कई जटिलताओं का खतरा था। डॉक्टरों ने विशेष तकनीकों और सावधानी के साथ इस चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया को पूरा किया।
एंडोमेट्रियोसिस और एडेनोमायोसिस से पीड़ित थी मरीज
महिला गहरे एंडोमेट्रियोसिस और एडेनोमायोसिस के कारण असहनीय पेल्विक दर्द से जूझ रही थीं। उनकी स्थिति को देखते हुए गर्भाशय निकालने की सर्जरी जरूरी थी। हालांकि, गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस और नाजुक शारीरिक बनावट के कारण हड्डियों में फ्रैक्चर तथा सांस लेने से जुड़ी जटिलताओं का खतरा काफी अधिक था। ऐसे में डॉक्टरों के सामने मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए सर्जरी पूरी करने की चुनौती थी।
90 मिनट में पूरी हुई लैप्रोस्कोपिक हिस्टेरेक्टॉमी
डॉक्टरों की टीम ने मरीज के लिए विशेष फ्लैट पोजिशनिंग की व्यवस्था की और दर्द नियंत्रण की खास तकनीकों का इस्तेमाल किया। बेहद सटीकता के साथ की गई यह सर्जरी 90 मिनट में पूरी हुई। इसमें न्यूनतम चीर-फाड़ वाली लैप्रोस्कोपिक तकनीक अपनाई गई। सर्जरी के बाद मरीज की रिकवरी अच्छी रही और उन्हें तीसरे दिन ही अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
गायनेकोलॉजी और एनेस्थीसिया विभाग की टीम ने संभाली जिम्मेदारी
इस जटिल सर्जरी में एम्स के गायनेकोलॉजी विभाग की टीम ने प्रो. रीता माहे और डॉ. स्वाति तोमर के नेतृत्व में काम किया। एनेस्थीसिया विभाग से डॉ. पारिन लालवानी और डॉ. चोरो अथिप्रो कायना भी टीम में शामिल रहे। OBGYN विभाग की प्रमुख प्रो. नीना मल्होत्रा और प्रो. के. अपर्णा शर्मा के नेतृत्व में मरीजों को बेहतर और जीवन बदलने वाली स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य किया गया।
एम्स में सुपर माइक्रोसर्जरी पर आयोजित हुई कार्यशाला
इस सर्जरी से करीब एक महीने पहले, 16 और 17 सितंबर को एम्स नई दिल्ली में सुपर माइक्रोसर्जरी पर कार्यशाला आयोजित की गई थी। इसमें छह सर्जरी की गईं और इस क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। कार्यशाला का आयोजन एम्स के प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने किया था, जिसमें भारत और विदेश के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।
क्या है सुपर माइक्रोसर्जरी?
सुपर माइक्रोसर्जरी, माइक्रोसर्जरी का उन्नत रूप है, जिसमें 0.8 मिलीमीटर से भी छोटी रक्त वाहिकाओं पर काम किया जाता है। इसमें 0.3 से 0.5 मिलीमीटर तक की बारीक रक्त वाहिकाओं की सर्जरी भी शामिल है। इन प्रक्रियाओं में अत्याधुनिक सर्जिकल माइक्रोस्कोप और बेहद बारीक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें उपयोग होने वाले टांके इंसानी बाल से भी तीन से पांच गुना पतले होते हैं, जिससे अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर सर्जरी करना संभव होता है।
फाइलेरिया और ब्रेस्ट कैंसर के बाद होने वाली सूजन का उपचार
कार्यशाला में की गई छह सर्जरी में फाइलेरिया यानी हाथीपांव और ब्रेस्ट कैंसर के बाद हाथ में होने वाली सूजन के उपचार के लिए लिम्फैटिक सुपर माइक्रोसर्जरी शामिल थी। इसके अलावा, मधुमेह के कारण पैर में बने ऐसे घाव का सुपर माइक्रोसर्जिकल रिकंस्ट्रक्शन किया गया, जो ठीक नहीं हो रहा था। इस प्रक्रिया में त्वचा की बेहद पतली परत यानी स्किन फ्लैप का इस्तेमाल किया गया।
दक्षिण कोरिया समेत कई संस्थानों के विशेषज्ञ हुए शामिल
कार्यशाला में दक्षिण कोरिया के प्रोफेसर जून पियो (जे.पी.) होंग मुख्य विशेषज्ञ के रूप में शामिल हुए। वह सुपर माइक्रोसर्जरी और लिम्फैटिक रिकंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में विश्व स्तर पर जाने-माने विशेषज्ञ हैं। इनके अलावा, कोयंबटूर के गंगा अस्पताल से डॉ. हरि वेंकटरामनी और कासरगोड के एस्टर अस्पताल से डॉ. समरीन जाफर ने भी भाग लिया। एम्स की ओर से विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. मनीष सिंघल, डॉ. शशांक चौहान, डॉ. शिवांगी साहा और डॉ. नंदिनी सिंह तंवर सहित अन्य फैकल्टी सदस्य मौजूद रहे।
ICG और हाई-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड मैपिंग का प्रदर्शन
कार्यशाला के दौरान इंडोसाइनिन ग्रीन (ICG) इन्फ्रारेड मैपिंग और हाई-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड मैपिंग जैसी तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया। इन तकनीकों के इस्तेमाल से सुपर माइक्रोसर्जरी के दौरान सूक्ष्म संरचनाओं की पहचान और सर्जिकल प्रक्रिया में मदद मिल सकती है।
एम्स में हर साल होती हैं 300 से अधिक माइक्रोसर्जरी
एम्स, नई दिल्ली में हर साल 300 से अधिक माइक्रोसर्जरी की जाती हैं। सुपर माइक्रोसर्जरी, ICG मैपिंग और हाई-फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड मैपिंग जैसी आधुनिक तकनीकों के जुड़ने से ब्रेस्ट कैंसर और अन्य प्रकार के कैंसर, लिम्फोएडेमा यानी सूजन तथा डायबिटिक फुट अल्सर के उपचार के विकल्प बढ़ने की उम्मीद है। ये तकनीकें डिमेंशिया और माइग्रेन की सर्जरी जैसे क्षेत्रों में भी इलाज के नए रास्ते खोल सकती हैं। (Source: ANI)
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