BIRC 2026: पराली और कार्बन क्रेडिट से धान किसान कमाएंगे अतिरिक्त मुनाफा, विशेषज्ञों ने बताए आसान रास्ते
नई दिल्ली। नई दिल्ली में आयोजित 'भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस (BIRC) 2026' में कृषि विशेषज्ञों ने एक बड़ी उम्मीद जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि कार्बन क्रेडिट, जल-संरक्षण तकनीकों और टिकाऊ खेती को अपनाकर भारतीय धान किसान अपनी लागत कम करने के साथ-साथ कमाई के नए जरिए भी बना सकते हैं।
भारत में चावल की सप्लाई चेन और टिकाऊ खेती (सस्टेनेबिलिटी) पर आयोजित इस मंथन में विशेषज्ञों ने साफ किया कि अगर जलवायु-अनुकूल खेती और आधुनिक तकनीकों को सही नीतिगत प्रोत्साहन मिले, तो यह मॉडल किसानों के लिए बेहद फायदेमंद साबित होगा।
10 लाख एकड़ में कार्बन प्रोग्राम और बड़ा निवेश
कार्बन प्रोजेक्ट्स पर काम करने वाली कंपनी 'वराह' (Varaha) के निदेशक कौशल बिष्ट ने कॉन्फ्रेंस में एक जमीनी उदाहरण पेश किया। उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में छोटे किसानों के लिए एक विशेष कार्बन कार्यक्रम चला रही है, जो करीब 10 लाख एकड़ क्षेत्र में फैला है।
कौशल बिष्ट ने बताया कि कंपनी ने इक्विटी और प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग के जरिए लगभग 10 करोड़ डॉलर (करीब 830 करोड़ रुपये) जुटाए हैं। इसमें फ्रांसीसी एसेट मैनेजर 'मिरोवा' से मिले 3 करोड़ डॉलर का निवेश भी शामिल है, जिससे किसानों को टिकाऊ उपकरण और आधुनिक तरीके मुहैया कराए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, "बड़े पैमाने पर बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। अब जरूरत इस बात की है कि उद्योग के ज्यादा से ज्यादा हितधारक इस दिशा में एक साथ आगे आएं।"
पराली से बनेगा 'बायोचार', संगरूर में लगेंगे 2 प्लांट
पंजाब में पराली जलाने की समस्या का समाधान बताते हुए कौशल बिष्ट ने बड़ी योजना का खुलासा किया। कंपनी पंजाब के संगरूर में दो गैसीफिकेशन यूनिट्स स्थापित करने जा रही है।
इन यूनिट्स में लगभग 60,000 टन धान की पराली को 'बायोचार' (Biochar) में बदला जाएगा। इससे न केवल खेतों की मिट्टी की सेहत सुधरेगी, बल्कि कार्बन क्रेडिट भी जेनरेट होंगे।
तेलंगाना में प्रति हेक्टेयर 3 कार्बन क्रेडिट का फॉर्मूला
'VKU सर्टिफिकेशन' के ऑपरेशंस डायरेक्टर बरुन कुमार ने तेलंगाना का उदाहरण दिया, जहां करीब 20,000 किसान 'अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग' (खेत में बारी-बारी से पानी भरने और सुखाने) की तकनीक अपना रहे हैं।
उन्होंने कहा कि खेती के एक ही सीजन में प्रति हेक्टेयर लगभग तीन कार्बन क्रेडिट हासिल किए जा सकते हैं, जिससे किसानों को सीधी अतिरिक्त आय होगी। हालांकि, उन्होंने डेटा और सबूतों की पारदर्शिता पर बल देते हुए कहा, "बिना ठोस निगरानी और सत्यापन के कार्बन क्रेडिट जारी करना मुमकिन नहीं है।"
बाजार की विश्वसनीयता और नीतिगत सुधारों की जरूरत
'इंडियन चैंबर ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर' के सीईओ संजय सेठी ने कार्बन मार्केट में बढ़ते निवेश का स्वागत तो किया, लेकिन सतर्क रहने की सलाह भी दी। उन्होंने कहा कि ढीले सत्यापन से विश्वसनीयता घट सकती है और किसान वापस पुरानी आदतों पर लौट सकते हैं। इसलिए कड़े सुरक्षा उपाय बेहद जरूरी हैं।
वहीं, इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) की भारत प्रमुख और वैज्ञानिक डॉ. स्वाति नायक ने कहा कि जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए सरकारी और निजी प्रोत्साहनों को दोबारा डिजाइन करना होगा, ताकि किसानों को स्पष्ट आर्थिक फायदा दिखे।
HNYB टेक-इनक्यूबेशन के संस्थापक दीपक पारेख ने मांग रखी कि पर्यावरण के अनुकूल उगाए गए चावल की बाजार में बेहतर कीमत मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा, "चावल के दाम तय करते समय उसकी सस्टेनेबिलिटी का मूल्य भी जोड़ा जाना चाहिए।"
जलवायु परिवर्तन और वैश्विक बाजार की चुनौतियां
IRRI के डॉ. सौरभ बडोनी ने तापमान बढ़ने के जोखिम का जिक्र करते हुए कहा कि हमें चावल की ऐसी नई किस्मों की जरूरत है जो बदलती जलवायु के बावजूद दाने की गुणवत्ता बनाए रखें, ताकि भारत का चावल निर्यात अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत बना रहे।
S&P ग्लोबल की प्रिंसिपल एनालिस्ट गरिमा जोशी ने जोर देकर कहा कि तकनीक, किसान जागरूकता और संशोधित सरकारी नीतियों का संगम ही कृषि क्षेत्र को जलवायु जोखिमों और बाजार के उतार-चढ़ाव से बचा सकता है।
बता दें कि 23 से 25 अक्टूबर तक चलने वाले BIRC 2026 में देश-विदेश के चावल निर्यातक, खरीदार और नीति निर्माता वैश्विक चावल व्यापार के भविष्य का रोडमैप तैयार कर रहे हैं। (इनपुट: ANI)
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