सस्ते चिकन की भारी कीमत: पोल्ट्री फार्म बन रहे जानलेवा बैक्टीरिया की ‘नर्सरी’, 100 गुना तेजी से फैल रहा ‘कैम्पिलोबैक्टर’
सस्ते चिकन की भारी कीमत: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने अपनी चौंकाने वाली रिपोर्ट में खुलासा किया है कि पोल्ट्री फार्मिंग के बेलगाम विस्तार से खतरनाक बैक्टीरिया 'कैम्पिलोबैक्टर' 100 गुणा तेजी से फैल रहा है, जिसके खिलाफ अब दवाएं भी बेअसर हो रही हैं। जिस चिकन को दुनिया सस्ते और आसानी से मिलने वाले प्रोटीन के रूप में देख रही है, वही अब एक खतरनाक बैक्टीरिया के तेजी से फैलने का माध्यम बनता जा रहा है।
औद्योगिक पोल्ट्री फार्मिंग ने बढ़ाई बैक्टीरिया की रफ्तार
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने अपनी नई रिपोर्ट में खुलासा किया है कि औद्योगिक पोल्ट्री फार्मिंग यानी मुर्गियों की बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खेती ने फूड पॉइजनिंग और डायरिया की वजह बनने वाले बैक्टीरिया 'कैम्पिलोबैक्टर' के फैलने की रफ्तार को 100 गुणा से अधिक बढ़ा दिया है। चिंता की बात है कि यह बैक्टीरिया अब एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ भी तेजी से प्रतिरोध विकसित कर रहा है, जिससे इसके संक्रमण का इलाज पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन होता जा रहा है।
30 देशों के करीब 2,800 जीनोम का अध्ययन
अमेरिका के प्रतिष्ठित नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) जर्नल में प्रकाशित इस रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने 1979 से 2024 के बीच 30 देशों से एकत्र किए गए 'कैम्पिलोबैक्टर' के करीब 2,800 जीनोम का विश्लेषण किया है। इनमें व्यावसायिक रूप से पाली जाने वाली मुर्गियों के साथ-साथ जंगली पक्षियों से प्राप्त नमूने भी शामिल थे। अध्ययन में पाया गया कि औद्योगिक पोल्ट्री फार्म बैक्टीरिया के फैलने, आपस में मिलकर नए रूप (स्ट्रेन) विकसित करने और जीवित रहने की नई क्षमताएं हासिल करने के लिए आदर्श वातावरण बन चुके हैं।
कुदरती चक्र में इंसानी दखल: सात गुना बढ़ी मुर्गियों की संख्या
वैज्ञानिकों के मुताबिक, 1960 के दशक के बाद दुनिया में मुर्गियों की आबादी सात गुणा बढ़कर करीब 3,100 करोड़ पर पहुंच गई है। आपको जानकर हैरानी होगी कि आज पृथ्वी पर मौजूद सभी पक्षियों के कुल भार (बायोमास) का करीब 70 फीसदी हिस्सा अकेले मुर्गियों का है। इससे एक तरफ जहां जीवों से मिलने वाले सस्ते प्रोटीन की उपलब्धता तो बढ़ी, लेकिन साथ ही सस्ता मांस पैदा करने की अंधी दौड़ ने एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया, जहां मुर्गियों के दड़बे और फार्म बैक्टीरिया के पनपने का सबसे आसान ठिकाना बन गए। नतीजन बैक्टीरिया के तेजी से विकसित होने और फैलने के अनुकूल अवसर पैदा हो गए।
बैक्टीरिया ने सीख लिए नए हथकंडे
जीनोमिक विश्लेषण से पता चला कि 'कैम्पिलोबैक्टर' में ऐसे आनुवंशिक बदलाव हुए हैं, जो उसे आधुनिक पोल्ट्री फार्मों के वातावरण में अधिक सफल बनाते हैं। इनमें एंटीबायोटिक प्रतिरोध विकसित करने वाले जीन, ऑक्सीडेटिव तनाव सहने की क्षमता, धातुओं से पोषण प्राप्त करने और अधिक तेजी से फैलने जैसी विशेषताएं शामिल हैं। ये गुण बैक्टीरिया को आधुनिक पोल्ट्री उत्पादन प्रणाली में लंबे समय तक जीवित रहने और तेजी से फैलने में मदद करते हैं।
जंगली पक्षियों से फार्म तक पहुंचा संक्रमण
अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ शोधकर्ता और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर सैम शेपर्ड के मुताबिक, औद्योगिक पोल्ट्री फार्मिंग ने पृथ्वी पर सबसे बड़े कृत्रिम पशु आवासों में से एक तैयार कर दिया है। इससे वे बैक्टीरिया, जो पहले मुख्य रूप से जंगली पक्षियों तक सीमित थे, अब आसानी से व्यावसायिक मुर्गियों के झुंडों में पहुंचकर तेजी से फैल रहे हैं और स्थाई रूप से बस रहे हैं। निष्कर्ष यह साबित करते हैं कि इंसान द्वारा कुदरत में किया गया बेवजह बदलाव संक्रामक बीमारियों को बढ़ा रहा है। जो बैक्टीरिया कभी जंगली परिंदों तक सीमित थे, उन्हें इंसानी लापरवाही ने फलने-फूलने का रास्ता दे दिया है। उनके अनुसार, यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मानव द्वारा पर्यावरण में किए गए बदलाव संक्रामक रोगों के प्रसार को बढ़ा सकते हैं।
‘पैथोजन स्पंज’ बन रहे पोल्ट्री फार्म
रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि मुर्गियों की घनी आबादी वाले ये फार्म एक 'पैथोजन स्पंज' (बीमारियों के सोखने वाले स्पंज) की तरह काम कर रहे हैं। यानी वे अलग-अलग स्रोतों से आने वाले बैक्टीरिया को अपने भीतर समेटते हैं, उन्हें बढ़ने का अवसर देते हैं।
एंटीबायोटिक के खिलाफ भी मजबूत हो रहा ‘कैम्पिलोबैक्टर’
ऑक्सफोर्ड, 10 अगस्त: यहां बैक्टीरिया सिर्फ रुकता नहीं, बल्कि खुद को इतना ताकतवर बना लेता है कि उस पर एंटीबायोटिक (एंटीमाइक्रोबियल) दवाएं असर करना बंद कर देती हैं। मॉडलिंग से पता चला कि जब मुर्गियों की संख्या एक निश्चित स्तर से ऊपर पहुंच जाती है, तो जंगली पक्षियों से आए बैक्टीरिया भी पोल्ट्री आबादी में बिना बाहरी स्रोत के लंबे समय तक बने रह सकते हैं।
बदलते माहौल के साथ खुद को ढाल रहा बैक्टीरिया
अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता ओकेम काइन का कहना है कि जैसे-जैसे 'कैम्पिलोबैक्टर', मुर्गियों के वातावरण के अनुरूप खुद को ढालता है, वैसे-वैसे वह ऐसे गुण भी विकसित कर लेता है जो उसे कठिन परिस्थितियों और एंटीबायोटिक दवाओं के बीच भी जीवित रहने में मदद करते हैं। उनके अनुसार, यदि भोजन से फैलने वाली बीमारियों का बोझ कम करना है, तो यह समझना बेहद जरूरी है कि आधुनिक कृषि पद्धतियां बैक्टीरिया के विकास और उनके व्यवहार को किस तरह बदल रही हैं।
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