इंदौर में CJI सूर्य कांत ने कहा कि न्याय व्यवस्था

इंदौर में CJI सूर्य कांत का बड़ा संदेश: न्याय नागरिकों तक पहुंचे, कानूनी संस्थाएं खुद लोगों तक जाएं

Chief Justice of India Surya Kant

नई दिल्ली। इंदौर में शनिवार को नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) के वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्याय तक सही पहुंच के लिए जरूरी है कि कानूनी संस्थाएं उन लोगों तक पहुंचें जो उन तक नहीं पहुंच पाते। उन्होंने कहा कि न्याय को नागरिकों तक पहुंचना चाहिए, न कि नागरिकों से यह उम्मीद की जाए कि वे न्याय प्रणाली तक आएं।

संवाद, सम्मान और समावेश को न्याय व्यवस्था की मजबूत नींव बताया

CJI ने कहा कि कॉन्फ्रेंस के तीन स्तंभ - बातचीत, सम्मान और समावेश - समान न्याय के संवैधानिक वादे को व्यावहारिक अर्थ देते हैं। संवाद के विषय पर जस्टिस कांत ने कहा कि न्याय तक पहुंच केवल कानूनों से नहीं बन सकती और इसकी शुरुआत लोगों की समस्याओं को सुनने से होती है। उन्होंने कहा कि बातचीत पूरे कानूनी सेवा ढांचे में होनी चाहिए - NALSA और राज्य व जिला कानूनी सेवा प्राधिकरणों से लेकर पैरा-लीगल स्वयंसेवकों तक, जो समुदायों के सबसे करीब होते हैं।

स्थानीय जरूरतों के मुताबिक होनी चाहिए कानूनी सहायता

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एकजुट आवाज का मतलब यह नहीं है कि हर कोई एक ही बात कहे, बल्कि एक ही लक्ष्य की दिशा में काम करते हुए उन लोगों की जरूरतों को पूरा करना है जिनकी वे सेवा करते हैं। उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कानूनी सेवाओं की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश में एक आदिवासी परिवार, गोवा में एक मछुआरा समुदाय, गुजरात में एक प्रवासी श्रमिक और मुंबई में सहायता चाहने वाली एक महिला की कानूनी जरूरतें बहुत अलग-अलग हो सकती हैं।

सरल भाषा और समुदायों के अनुभव से बेहतर होगी कानूनी जागरूकता

CJI ने कहा कि कानूनी जागरूकता को कानूनी शब्दावली के बजाय जानी-पहचानी भाषा में बताया जाना चाहिए और इस बात पर जोर दिया कि संस्थाओं को उन समुदायों से भी सीखना चाहिए जिनकी वे सेवा करती हैं। CJI ने कहा कि पैरा-लीगल स्वयंसेवकों, कानूनी सहायता वकीलों, न्यायिक अधिकारियों और नागरिक समाज संगठनों के अनुभव व्यावहारिक और स्थायी समाधान विकसित करने में सहायक हो सकते हैं।

सम्मानजनक व्यवहार से मजबूत होगा न्याय व्यवस्था पर भरोसा

सम्मान के मुद्दे पर, जस्टिस कांत ने कहा कि न्याय का अनुभव न्यायिक आदेश सुनाए जाने से बहुत पहले ही शुरू हो जाता है। एक आम नागरिक के लिए, यह तब शुरू होता है जब वे कानूनी सहायता क्लिनिक, कोर्ट परिसर या तालुका कानूनी सेवा प्राधिकरण के कार्यालय में प्रवेश करते हैं। उन्होंने कहा कि पहली बार कानूनी प्रणाली से जुड़ने वाले कई लोग अदालती प्रक्रियाओं से अनजान हो सकते हैं और बोलने में हिचकिचा सकते हैं। इसलिए, धैर्यपूर्वक समझाना, सम्मानपूर्वक बातचीत करना और यह भरोसा दिलाना कि कोई सुनने को तैयार है, एक बड़ा अंतर ला सकता है।

कानूनी सहायता दान नहीं, संवैधानिक अधिकार है

जस्टिस कांत ने कहा कि कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम यह मानता है कि समाज के कुछ वर्गों को अधिक संस्थागत समर्थन की आवश्यकता होती है - दान के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार के रूप में। उन्होंने कहा कि हर कानूनी सहायता वकील जो धैर्यपूर्वक सुनता है, हर पैरा-लीगल स्वयंसेवक जो कानून को सरलता से समझाता है और हर न्यायिक अधिकारी जो वादियों के साथ विनम्रता से पेश आता है, वे न्याय प्रणाली में जनता का भरोसा मजबूत करने में मदद करते हैं। सबको साथ लेकर चलने (इनक्लूज़न) की बात करते हुए, CJI ने कहा कि न्याय तक पहुंच को तब तक सार्थक नहीं माना जा सकता जब तक कि दूरी, गरीबी, विकलांगता, भाषा या जानकारी की कमी के कारण भी कोई एक नागरिक इससे वंचित रह जाए। ​(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)

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