'सूखा नल और जहरीला पानी जीवन के लिए खतरा': NHRC कार्यक्रम में बोले CJI सूर्यकांत
नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने साफ कहा है कि पीने के पानी तक नागरिकों की पहुंच का मतलब केवल घरों में नल का कनेक्शन लगा देना नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सूखा नल पानी का वादा पूरा नहीं कर सकता और आर्सेनिक या फ्लोराइड से दूषित पानी लोगों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए सीधा खतरा है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के स्थापना दिवस समारोह और 'जल – जीवन का अमृत' विषय पर आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए CJI ने कहा कि सुरक्षित और भरोसेमंद जल आपूर्ति नागरिकों की मानवीय गरिमा और संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है।
'दूषित पानी कोई सेवा नहीं, जीवन के लिए खतरा'
CJI सूर्यकांत ने कड़े शब्दों में कहा, "केवल नल लगा देना पानी की उपलब्धता नहीं है। जो पाइप सूखा पड़ा रहे, वह जलापूर्ति के संवैधानिक वादे को पूरा नहीं करता। आर्सेनिक, फ्लोराइड या अन्य हानिकारक पदार्थों से मिला पानी कोई सुविधा नहीं, बल्कि जीवन और सेहत पर मंडराता खतरा है।"
उन्होंने पानी और मानवाधिकारों के अटूट संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि स्वच्छ जल से ही स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन संभव होता है। "जब तक किसी समुदाय के पास पानी की भरोसेमंद पहुंच नहीं है, तब तक वह संविधान द्वारा दिए गए गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का पूरी तरह से लाभ नहीं उठा सकता। इसलिए जल का अधिकार कोई अलग-थलग विषय नहीं, बल्कि अन्य सभी मौलिक अधिकारों को पूरा करने की बुनियादी शर्त है।"
सामूहिक जिम्मेदारी और संस्थागत भूमिका
जलापूर्ति की चुनौतियों से निपटने के लिए CJI ने सामूहिक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इसमें सरकार, न्यायपालिका, मानवाधिकार आयोग, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं - सभी की अपनी-अपनी भूमिका है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का काम मजबूत जलापूर्ति तंत्र बनाना और बनाए रखना है, जबकि संवैधानिक अधिकारों का हनन होने पर अदालतों का हस्तक्षेप करना जरूरी हो जाता है। वहीं मानवाधिकार आयोगों को शिकायतों की जांच कर प्रशासनिक व संस्थागत कमियों को उजागर करना चाहिए।
भूजल संकट और भविष्य की पीढ़ियों की चिंता
पर्यावरण संरक्षण पर बात करते हुए CJI सूर्यकांत ने भूजल के अत्यधिक दोहन, नदियों के बढ़ते प्रदूषण और पेयजल स्रोतों से खिलवाड़ पर गंभीर चेतावनी दी। उन्होंने कहा, "जल के अधिकार को केवल वर्तमान की जरूरत के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।"
33 वर्षों में NHRC का शानदार ट्रैक रिकॉर्ड
मानवाधिकार आयोग के योगदान की सराहना करते हुए CJI ने बताया कि अपने 33 वर्षों के इतिहास में NHRC ने 24 लाख से अधिक मामले दर्ज किए हैं, जिनमें से 23 लाख से ज्यादा मामलों का सफलतापूर्वक निपटारा किया गया है। आयोग का केस डिस्पोजल रेट 98 प्रतिशत से भी अधिक रहा है।
NHRC को संविधान का प्रहरी बताते हुए CJI ने कहा, "अगर संविधान एक वादा है, तो आयोग उसका रक्षक है। यह उन दूरदराज इलाकों और लोगों तक पहुंचता है जहां अदालतें आसानी से नहीं पहुंच पातीं। आयोग बिना किसी औपचारिक शिकायत के भी स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर कार्रवाई कर सकता है।"
CJI ने हाशिए पर खड़े समुदायों, विचाराधीन कैदियों (Undertrials), प्रवासी मजदूरों, बुजुर्गों, दिव्यांगों और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा में आयोग की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। साथ ही, आम जनता की आसान पहुंच के लिए मोबाइल ऐप लॉन्च करने और रिकॉर्ड्स के डिजिटलाइजेशन की पहल के लिए NHRC की सराहना की। (भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)
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