हिमालय में पिघलते ग्लेशियर और नई झीलें ला सकती हैं

हिमालय में मंडरा रहा GLOF का खतरा, ग्लेशियोलॉजिस्ट की चेतावनी- भवन निर्माण नियमों को सख्ती से लागू करे सरकार

Retd. glaciologist and scientist S.S. Randhawa

शिमला (हिमाचल प्रदेश)। हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ता तापमान और पिघलते ग्लेशियर एक बड़े जल प्रलय (GLOF) की खौफनाक आहट दे रहे हैं। हिमाचल प्रदेश सहित ट्रांस-हिमालय (पार-हिमालय) और पूरे हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बन रहीं नई हिमनद झीलें (Glacial Lakes) किसी भी वक्त भयानक बाढ़ और भूस्खलन का कारण बन सकती हैं। जाने-माने ग्लेशियोलॉजिस्ट और वैज्ञानिक एस.एस. रंधावा ने इस विनाशकारी खतरे को लेकर गंभीर चेतावनी दी है और सरकारों से मांग की है कि संवेदनशील इलाकों में निर्माण कार्यों पर तुरंत रोक लगाई जाए और भवन निर्माण के नियमों (Building By-laws) को बिना किसी ढिलाई के सख्ती से लागू किया जाए।

तेजी से पीछे हट रहे हिमाचल के ग्लेशियर

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत 'हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद' के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी एस.एस. रंधावा ने न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत में कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश के ग्लेशियरों पर दशकों तक किए गए फील्ड और सैटेलाइट आधारित अध्ययनों से यह साफ हो गया है कि ग्लेशियर तेजी से पीछे खिसक रहे हैं (Glacier Retreat), हालांकि अलग-अलग नदी बेसिन में इनके पिघलने की दर में भिन्नता है।

हर ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार अलग

रंधावा ने स्पष्ट किया, "कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश के अधिकांश ग्लेशियर पीछे खिसकने (रिट्रीटिंग) के चरण में हैं। हालांकि, उनके पीछे हटने की दर अलग-अलग है क्योंकि इसमें ग्लेशियर का स्थान, उसकी ढलान, दिशा और सर्दियों में बर्फ जमा होने की मात्रा जैसे कई कारक शामिल होते हैं।" साल 1993 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग से जुड़ने के बाद से रंधावा 2023 में अपनी सेवानिवृत्ति तक हिमाचल में ग्लेशियर अनुसंधान से गहराई से जुड़े रहे हैं। इस काम में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की मदद से फील्ड इन्वेस्टिगेशन और सैटेलाइट-आधारित मैपिंग दोनों को शामिल किया गया था।

'तीसरे ध्रुव' के ग्लेशियरों की निगरानी

उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के बाद हिमालय को 'तीसरे ध्रुव' (Third Pole) के रूप में जाना जाता है। रंधावा के मुताबिक, अधिक ऊंचाई वाले इन दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के अध्ययन के लिए पारंपरिक तरीके नाकाफी थे। उन्होंने कहा, "हिमालय में बड़ी संख्या में मौजूद ग्लेशियरों का अध्ययन करने के लिए 1993 में इसरो (ISRO) के अंतरिक्ष उपयोग केंद्र की मदद से हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर मैपिंग का काम शुरू किया गया था।"

सैटेलाइट मैपिंग से आसान हुई ग्लेशियरों की पड़ताल

शुरुआती दौर में अपेक्षाकृत कम रेजोल्यूशन वाली सैटेलाइट इमेजरी (जैसे LISS-I और LISS-II) का इस्तेमाल किया गया। लेकिन, तकनीकी प्रगति के साथ अब बेहद हाई-रेजोल्यूशन वाले सैटेलाइट डेटा उपलब्ध हैं। लगभग 23.5 मीटर के रेजोल्यूशन वाले LISS-III सैटेलाइट डेटा का उपयोग करने वाले पूर्व अध्ययनों में 2001 से 2007 के बीच हिमाचल के कई बेसिन में बड़े पैमाने पर बर्फ पिघलने (Deglaciation) का दस्तावेजीकरण किया गया था।

अलग-अलग बेसिन में पिघलने की अलग रफ्तार

आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि उस अवधि के दौरान चिनाब बेसिन में लगभग 5.18 प्रतिशत, ब्यास बेसिन में 7.03 प्रतिशत, रावी बेसिन में 4.67 प्रतिशत, बसपा बेसिन में 6.42 प्रतिशत और स्पीति बेसिन में 4.62 प्रतिशत बर्फ पिघलने का अनुमान लगाया गया था। हालांकि, रंधावा ने आगाह किया कि ये आंकड़े बेसिन-विशिष्ट हैं और इन्हें पूरे राज्य में ग्लेशियर के पीछे हटने की एक समान दर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान का कहर और झीलों का निर्माण

बढ़ता तापमान अब ग्लेशियरों पर, विशेषकर ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में, भारी दबाव डाल रहा है। रंधावा ने कहा, "जलवायु परिवर्तन हो रहा है और तापमान बढ़ रहा है। यह भी अच्छी तरह से प्रलेखित है कि निचले इलाकों की तुलना में उच्च हिमालय में तापमान अधिक है। जब अधिक ऊंचाई पर तापमान बढ़ता है, तो ग्लेशियरों पर इसका प्रभाव कहीं अधिक विनाशकारी होता है।"

खतरनाक होती झीलें: कभी भी आ सकता है जल प्रलय

इस त्वरित बर्फ पिघलने का सबसे खतरनाक परिणाम हिमनद झीलों (Glacial Lakes) का निर्माण और उनका लगातार विस्तार है। जब ये झीलें अस्थिर हो जाती हैं और अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ती हैं, तो वे 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOFs) को ट्रिगर कर सकती हैं, जिससे निचले इलाकों में भारी तबाही मच सकती है। समय के साथ विभिन्न नदी घाटियों में इन झीलों की संख्या काफी बढ़ी है, जिससे इनकी व्यवस्थित निगरानी बेहद जरूरी हो गई है।

सतलुज बेसिन का सच: सैटेलाइट से रखी गई हर एक नजर

अपने कार्यकाल के दौरान सतलुज बेसिन में की गई विस्तृत निगरानी का जिक्र करते हुए रंधावा ने डराने वाले आंकड़े पेश किए। अप्रैल और अक्टूबर के बीच AWiFS, LISS-III और LISS-IV इमेजरी सहित विभिन्न सैटेलाइट डेटासेट का उपयोग करके इस बेसिन की सालाना निगरानी की गई। लगभग 5.8 मीटर के रेजोल्यूशन वाले LISS-IV डेटा ने एक बेहद विस्तृत तस्वीर सामने रखी है।

सतलुज बेसिन में झीलों का विस्फोट

विश्लेषण के अनुसार, 2020 में सतलुज बेसिन में लगभग 1,359 हिमनद झीलों की पहचान की गई थी। यह संख्या 2021 में बढ़कर 1,632, 2022 में 1,953 और 2023 में 2,292 हो गई। 2023 में पहचानी गई इन 2,292 झीलों में से लगभग 2,192 का क्षेत्रफल पांच हेक्टेयर से कम था, 51 झीलें पांच से 10 हेक्टेयर के बीच थीं, और 49 झीलों का क्षेत्रफल 10 हेक्टेयर से अधिक था।

अगर इनके भौगोलिक वितरण को देखें, तो हिमाचल के भीतर सतलुज बेसिन में लगभग 470 झीलें, स्पीति/निचले सतलुज क्षेत्र में 487 और तिब्बती तरफ ऊपरी सतलुज क्षेत्र में 1,335 झीलें मौजूद हैं। रंधावा ने स्पष्ट किया कि बड़ी संख्या में छोटी झीलों का बनना अपने आप में एक महत्वपूर्ण संकेतक है।

उन्होंने बताया, "छोटी झीलों की इतनी बड़ी संख्या काफी महत्वपूर्ण है। यह इंगित करता है कि ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बढ़ रहा है और झीलों का निर्माण बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है।" उन्होंने इन झीलों के बढ़ते खतरे को दीर्घकालिक आपदा-प्रबंधन के नजरिए से देखने और एक स्थायी निगरानी तंत्र स्थापित करने की मांग की।

निगरानी, मॉडलिंग और नेपाल आपदा से सबक

"इन सभी झीलों का हर साल नक्शा बनाया जाना चाहिए और इनकी निगरानी की जानी चाहिए। हमें बेसलाइन डेटा स्थापित करने और उनके जल-फैलाव क्षेत्र तथा अन्य विशेषताओं में हो रहे बदलावों की पहचान करने की आवश्यकता है," रंधावा ने कहा। उन्होंने जोर दिया कि हर ग्लेशियर तक भौतिक पहुंच संभव नहीं है, इसलिए सैटेलाइट तकनीक बेहद महत्वपूर्ण होगी।

हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि सिर्फ सैटेलाइट इमेजरी किसी भी झील की पूरी संवेदनशीलता का निर्धारण नहीं कर सकती। "प्रत्येक झील की भेद्यता (Vulnerability) को परिभाषित करने के लिए फील्ड-आधारित डेटा भी आवश्यक है। दुर्गम इलाके होने के कारण हर झील के लिए विस्तृत फील्ड डेटा एकत्र करना बहुत मुश्किल है। फिर भी सैटेलाइट डेटा बदलावों का प्रारंभिक आकलन दे सकता है।"

रंधावा ने ग्लेशियल लेक डेटा, फ्लडप्लेन, निचले इलाकों और नदी छतों (River terraces) को शामिल करते हुए 'बेसिन-वार आपदा मॉडल' तैयार करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा, "एक बार आपके पास यह डेटा आ जाए, तो आप बेसिन-स्तरीय मॉडलिंग कर सकते हैं। यदि कोई विशेष झील टूटती है, तो आप यह पहचान सकते हैं कि कौन से इलाके जलमग्न या प्रभावित होने की संभावना रखते हैं।" इससे आपदा तैयारियों और निकासी योजना में काफी सुधार होगा।

घेपांग गाथ झील (Ghepang Gath Lake) का उदाहरण देते हुए उन्होंने इसे एक संभावित संवेदनशील झील बताया, जिसकी गहराई, पानी की मात्रा, क्षेत्रफल और ग्लेशियर से इसके जुड़ाव के कारण कड़ी वैज्ञानिक निगरानी की जरूरत है।

हाल ही में नेपाल में आई ग्लेशियल बाढ़ आपदा पर हवाई चित्रों और रिपोर्टों का हवाला देते हुए रंधावा ने बताया कि ग्लेशियर के मुहाने (Snout) और एब्लेशन जोन (बर्फ पिघलने वाले क्षेत्र) के आसपास बड़े पैमाने पर बर्फ पिघलती दिखी है। इसके सटीक कारणों की विस्तृत वैज्ञानिक जांच की आवश्यकता है, क्योंकि इसमें कई भूवैज्ञानिक और हिमनद कारक शामिल हो सकते हैं। एक भूकंप, लटकते ग्लेशियर (Hanging glacier) का गिरना या नदी के रास्ते का अवरुद्ध होना जैसी कई वजहें एक साथ काम कर सकती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसी घटनाओं को स्वतः किसी एक कारण से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

भूकंपीय खतरे और विकास नीतियों में बदलाव की सख्त जरूरत

यह खतरा केवल हिमाचल तक सीमित नहीं है, बल्कि जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, सिक्किम और पूर्वोत्तर के हिमालयी क्षेत्रों तक फैला है। भारत के भूकंपीय ज़ोनिंग ढांचे के हालिया संशोधन का हवाला देते हुए रंधावा ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र को भूकंप के जोखिम के नजरिए से अत्यधिक संवेदनशील माना जाना चाहिए।

रंधावा ने स्पष्ट किया, "भूस्खलन विभिन्न प्रकार की भूवैज्ञानिक गतिविधियों द्वारा सक्रिय होते हैं। थ्रस्ट ज़ोन (Thrust zones) के साथ, भूस्खलन सक्रिय हो सकते हैं, जबकि भूकंप भी ढलानों की विफलता (Slope failures) को ट्रिगर कर सकते हैं। यदि कोई हिमनद झील पहले से मौजूद है, तो भूकंप या हिमस्खलन संभावित रूप से इसे बाधित कर सकता है और इसके टूटने का कारण बन सकता है।"

इस बढ़ते जलवायु-जनित खतरे से निपटने के लिए रंधावा ने विकास योजना में बुनियादी बदलाव का आह्वान किया। उन्होंने निचले इलाकों और प्राकृतिक नदी चैनलों के किनारे भवन निर्माण उपनियमों और बाढ़ नियमों को सख्ती से लागू करने की मांग की।

"हमें सख्त प्रवर्तन की आवश्यकता है। प्रत्येक बेसिन के निचले इलाकों में विकासात्मक गतिविधियों को भवन निर्माण उपनियमों और बाढ़ नियमों के अनुसार प्रतिबंधित किया जाना चाहिए," उन्होंने चेतावनी दी कि प्राकृतिक नदी मार्गों में हस्तक्षेप करने से नदियां कभी भी अपना रास्ता बदल सकती हैं, जैसा कि ब्यास नदी के मामले में बार-बार देखा गया है।

पहाड़ी क्षेत्रों में लगभग 1.6 डिग्री सेल्सियस तापमान में वृद्धि का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इससे नमी का स्तर बदल रहा है, जो खड़ी ढलानों और संकरी घाटियों के साथ मिलकर 'बादल फटने' (Cloudbursts) जैसी चरम मौसम की घटनाओं को तेज कर सकता है। रंधावा ने सुझाव दिया कि ऐतिहासिक रूप से उच्च बाढ़ स्तर वाले क्षेत्रों की पहचान पारंपरिक और स्थानीय ज्ञान (Traditional and local knowledge) की मदद से की जानी चाहिए और उन्हें चिह्नित (Mark) किया जाना चाहिए ताकि लोग उस स्तर तक घर न बनाएं।

बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भूवैज्ञानिक जांच (Geological investigations) को अनिवार्य बनाने के कदम का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि यह नियम केवल बड़े प्रोजेक्ट्स ही नहीं, बल्कि आवासीय और वाणिज्यिक संपत्तियों पर भी लागू होना चाहिए। घाटी क्षेत्रों में निर्माण से मिट्टी के द्रवीकरण (Liquefaction) जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

अंत में रंधावा ने स्पष्ट किया कि स्थानीय उपायों से जलवायु परिवर्तन को रोका नहीं जा सकता, लेकिन बेहतर योजना, वैज्ञानिक निगरानी और सख्त नियमों के माध्यम से जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा, "पहाड़ी क्षेत्रों में जलवायु-जनित खतरे काफी बढ़ गए हैं। प्रत्येक बेसिन को वैज्ञानिक जियोमॉर्फोलॉजिकल मैपिंग की आवश्यकता है ताकि सुरक्षित और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की जा सके।"

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

सवाल 1: GLOF (जल प्रलय) क्या है और पहाड़ों में इसका खतरा क्यों बढ़ रहा है? जवाब: GLOF का मतलब है 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (Glacial Lake Outburst Flood)। जब पहाड़ों पर ग्लेशियर पिघलने से बनी हिमनद झीलें (Glacial Lakes) अस्थिर होकर अचानक टूट जाती हैं, तो भारी मात्रा में पानी ढलान से नीचे आता है, जो निचले इलाकों में भयानक बाढ़ और तबाही मचाता है। ग्लोबल वॉर्मिंग और बढ़ते तापमान के कारण हिमालय में ऐसी झीलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे यह खतरा गहरा गया है।

सवाल 2: ग्लेशियरों के पिघलने और आपदाओं को लेकर वैज्ञानिक एस.एस. रंधावा ने क्या चेतावनी दी है? जवाब: जाने-माने ग्लेशियोलॉजिस्ट एस.एस. रंधावा ने चेतावनी दी है कि ट्रांस-हिमालय सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर बहुत तेजी से पीछे खिसक रहे हैं (Retreat)। उन्होंने सरकारों से मांग की है कि बड़ी तबाही से बचने के लिए संवेदनशील इलाकों और नदियों के प्राकृतिक रास्तों पर निर्माण कार्यों पर तुरंत रोक लगाई जाए और भवन निर्माण के नियमों (Building By-laws) का सख्ती से पालन हो।

सवाल 3: भविष्य में ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? जवाब: विशेषज्ञों के अनुसार, आपदा से बचने के लिए 3 प्रमुख कदम जरूरी हैं: पहला, सैटेलाइट (जैसे ISRO के डेटा) की मदद से इन झीलों की हर साल निगरानी की जाए। दूसरा, किसी भी बड़े या छोटे निर्माण से पहले भूवैज्ञानिक जांच (Geological Investigations) अनिवार्य हो। तीसरा, पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल कर उन जगहों को चिह्नित किया जाए जहां पहले बाढ़ आ चुकी है, ताकि लोग वहां घर न बनाएं। (इनपुट: ANI)

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