CJP नेता रत्ना सिंह के सोशल मीडिया पोस्ट पर दिल्ली

CJP नेता रत्ना सिंह की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, दिल्ली सरकार के वकील ने आपराधिक अवमानना कार्रवाई को दी मंजूरी

Delhi Govt Lawyer Approves Criminal Contempt Proceedings Against CJP Leader Ratna Singh

नई दिल्ली (भारत)। दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील (आपराधिक) अमोल सिन्हा ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की नेता रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की सहमति दे दी है। यह मामला सोशल मीडिया पर किए गए उन पोस्ट से जुड़ा है, जिनमें कथित तौर पर एक न्यायिक अधिकारी के किसी अज्ञात 'मालिक' के इशारे पर काम करने का संकेत दिया गया था। अमोल सिन्हा ने 2 नवंबर को अपनी राय में कहा कि ये आरोप प्रथम दृष्टया न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं।

न्यायिक अधिकारी की निष्पक्षता पर सवाल उठाने का आरोप

यह सहमति वकील कौशिक चटर्जी की ओर से दाखिल अर्जी के आधार पर दी गई है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रकाशित बयानों और प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) की रिपोर्ट में आई टिप्पणियों को लेकर रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की थी।

अर्जी के मुताबिक, सिंह ने अपने पोस्ट में न्यायिक अधिकारी के आचरण पर सवाल उठाए थे। इनमें एक पोस्ट में कथित तौर पर कहा गया कि 'जज' किसी 'मालिक की सेवा' कर रहे हैं, जबकि दूसरे पोस्ट में दिल्ली पुलिस और जज दोनों के 'मालिक के आदेशों का पालन' करने का संकेत दिया गया था।

साकेत कोर्ट की कार्यवाही से जुड़ा है पूरा विवाद

यह विवाद साकेत कोर्ट में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अभिनव पांडे के सामने चल रही कार्यवाही से संबंधित है। यह मामला दिल्ली पुलिस द्वारा रत्ना सिंह को कथित तौर पर हिरासत में लिए जाने से जुड़ा है। 10 अक्टूबर को पारित आदेश में अदालत ने उनकी कथित हिरासत के संबंध में मांगी गई राहत देने से इनकार कर दिया था।

सरकारी वकील के पास पहुंची अर्जी के अनुसार, इस आदेश के बाद सिंह ने X पर पोस्ट करके न्यायिक कार्यवाही के प्रति असंतोष जताया और संबंधित न्यायिक अधिकारी के आचरण पर आरोप लगाए।

न्यायिक आदेश की आलोचना और अवमानना के बीच अंतर

अपनी राय में अमोल सिन्हा ने न्यायिक आदेश की वैध आलोचना और किसी न्यायिक अधिकारी पर बाहरी प्रभाव में काम करने का आरोप लगाने के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि न्यायिक आदेशों की आलोचना की जा सकती है और उनसे असहमत व्यक्ति कानून में उपलब्ध विकल्पों के जरिए उनके तर्क, वैधता और शुद्धता को चुनौती दे सकता है।

राय में कहा गया, "न्यायिक आदेशों की आलोचना की जा सकती है।" हालांकि, किसी न्यायिक अधिकारी के बारे में यह कहना कि वह किसी 'मालिक की सेवा' कर रहा है या उसके आदेशों का पालन कर रहा है, केवल न्यायिक आदेश के गुण-दोष की आलोचना तक सीमित नहीं है।

अदालत की गरिमा और न्याय प्रशासन पर असर का तर्क

अमोल सिन्हा के मुताबिक, किसी पहचाने जा सकने वाले न्यायिक अधिकारी पर बिना ठोस आधार के बाहरी प्राधिकरण के निर्देशों पर काम करने का आरोप लगाना यह धारणा पैदा कर सकता है कि न्यायिक फैसले मामले के गुण-दोष के बजाय बाहरी कारकों से प्रभावित थे।

राय में कहा गया कि इस तरह के आरोप प्रथम दृष्टया अदालत की गरिमा को कम करने और न्याय प्रशासन में जनता के विश्वास को कमजोर करने की क्षमता रखते हैं। सरकारी वकील ने इन्हें दिल्ली हाईकोर्ट के आपराधिक अवमानना अधिकार क्षेत्र को लागू करने के लिए पर्याप्त आधार माना।

CJP नेताओं से जुड़ी अन्य कार्यवाहियों का भी हुआ जिक्र

पूरक प्रतिवेदन में CJP नेताओं सौरभ दास और आशुतोष रांका से जुड़ी निवारक कार्यवाहियों के बारे में बाद में प्रकाशित सामग्री का भी उल्लेख किया गया। इसमें विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (Special Executive Magistrate) प्रणाली के कामकाज से जुड़े बयान शामिल थे।

हालांकि, अमोल सिन्हा ने इन बयानों को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से जुड़े विशिष्ट आरोपों से अलग माना। उन्होंने कहा कि बाद में प्रकाशित सामग्री मुख्य रूप से दिल्ली पुलिस के आचरण और विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट प्रणाली के कामकाज पर केंद्रित थी। केवल कड़ी आलोचना किए जाने के आधार पर इन बयानों को आपराधिक अवमानना नहीं माना जा सकता।

21 अक्टूबर के आदेश में माफी या अवमानना का निष्कर्ष नहीं

राय में 21 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया कि उस आदेश में रत्ना सिंह की ओर से कोई व्यक्तिगत माफी या वचन (Undertaking) दर्ज नहीं था। साथ ही, उनके खिलाफ अवमानना का कोई निष्कर्ष भी नहीं निकाला गया था।

अतिरिक्त स्थायी वकील के अनुसार, आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की सहमति मुख्य रूप से शुरुआती सोशल मीडिया प्रकाशनों पर आधारित थी, जिनमें मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आचरण को किसी अज्ञात 'मास्टर' के निर्देशों से जोड़ा गया था।

Contempt of Courts Act की धारा 15(2) के तहत दी गई सहमति

अमोल सिन्हा ने न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 15(2) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए सक्षम विधि अधिकारी के प्रस्ताव के माध्यम से रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की सहमति दी है।

हालांकि, राय में स्पष्ट किया गया है कि ये टिप्पणियां केवल आरोपों के प्रथम दृष्टया आकलन पर आधारित हैं। इन्हें आपराधिक अवमानना का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। मामले पर अंतिम विचार दिल्ली हाईकोर्ट को करना है। (Source: ANI)

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