जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से पहले एक्टिविस्ट वासिक खान

जंतर-मंतर प्रदर्शन से पहले एक्टिविस्ट को रोकने पर दिल्ली HC सख्त, पुलिस से मांगा जवाब

Delhi High Court seeks status report from police

नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन रोकने के लिए एक्टिविस्ट की आवाजाही पर पाबंदी लगाने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने दिल्ली पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मांगते हुए पूछा है कि किस कानून के आधार पर किसी नागरिक को परिसर में कैद रखा गया।

पुलिस की कार्रवाई और कानूनी आधार पर तीखे सवाल

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को एक्टिविस्ट मोहम्मद वासिक नदीम खान की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें आरोप लगाया गया है कि जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से ठीक पहले, 29 सितंबर को पुलिसकर्मियों ने उन्हें उनके कार्यालय परिसर में ही रोक दिया था।

सुनवाई के दौरान जस्टिस की पीठ ने दिल्ली पुलिस की कार्यशैली और उसके कानूनी आधार पर गंभीर सवाल खड़े किए। पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए पूछा: "आपको अपनी ड्यूटी करने का पूरा अधिकार था; लेकिन आप इसे इस तरीके से कैसे कर सकते हैं? उन्हें रोके रखने का आपके पास क्या वैध कारण या अधिकार था?"

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि पुलिस के पास किसी विरोध प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार करने का अधिकार है, लेकिन किसी व्यक्ति की आवाजाही की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का कानूनी आधार पुलिस को बताना ही होगा।

बिना नोटिस 8 घंटे तक घेराबंदी का आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शाहरु आलम ने अदालत को बताया कि 29 सितंबर को पुलिसकर्मी सुबह करीब 9:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक कार्यालय परिसर में मौजूद रहे। इस दौरान खान को न तो कोई लिखित आदेश दिखाया गया और न ही कोई औपचारिक नोटिस दिया गया। एडवोकेट आलम ने अदालत के समक्ष उस समय की तस्वीरें भी प्रस्तुत कीं, जिनमें पुलिसकर्मी परिसर में तैनात दिखाई दे रहे हैं।

इसके अलावा, अधिवक्ता ने अदालत को यह भी सूचित किया कि 2 अक्टूबर को जब खान अपनी बीमार माँ से मिलने जा रहे थे, तब भी उन्हें पुलिस का फोन आया। लगातार हो रही इस तरह की गतिविधियों और फोन कॉल्स के कारण याचिकाकर्ता के मन में आगे की पुलिस कार्रवाई को लेकर गहरा डर बैठ गया है।

जमात-ए-इस्लामी हिंद और APCR का संदर्भ

सुनवाई के दौरान जब अदालत ने स्पष्टता चाही कि क्या खान को जमात-ए-इस्लामी हिंद परिसर में हिरासत में लिया गया था, तो अधिवक्ता शाहरुख़ आलम ने स्थिति साफ की। उन्होंने बताया कि यह एक कंपाउंड है जहाँ उनका कार्यालय स्थित है और खान 'एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स' (APCR) के साथ जुड़कर काम करते हैं।

दिल्ली पुलिस का पक्ष: हिरासत नहीं, केवल आवाजाही पर रोक

दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस के वकील ने याचिका में लगाए गए आरोपों का खंडन किया। पुलिस का तर्क था कि जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन की अनुमति खारिज कर दी गई थी। इसके बावजूद पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि खान प्रदर्शन स्थल की ओर बढ़ सकते हैं।

पुलिस वकील ने दावा किया कि पुलिसकर्मी केवल रिसेप्शन पर बैठे थे और याचिकाकर्ता को औपचारिक रूप से हिरासत में नहीं लिया गया था, बल्कि केवल उनकी आवाजाही पर पाबंदी लगाई गई थी। पुलिस ने बाद में याचिकाकर्ता के परिसर में जाने के आरोपों से भी इनकार किया।

अग्रिम कॉपी मिलने के बावजूद स्टेटस रिपोर्ट न देने पर नाराजगी

सुनवाई के दौरान बेंच ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि शनिवार को याचिका की एडवांस कॉपी मिल जाने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट दाखिल क्यों नहीं की।

इस दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने अदालत से गुजारिश की कि वे इस मामले में औपचारिक नोटिस जारी न करे। उन्होंने तर्क दिया कि नोटिस जारी होने से 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) की धारा 163 के तहत जारी निषेधाज्ञा (Prohibitory Order) को दी गई अलग चुनौती पर असर पड़ सकता है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पुलिस की दलीलों को दरकिनार करते हुए नोटिस जारी कर दिया। अदालत ने दर्ज किया कि पुलिस को पहले ही सूचित कर दिया गया था, लेकिन वे अपनी स्टेटस रिपोर्ट के साथ तैयार नहीं थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) का वह बयान भी ऑन-रिकॉर्ड दर्ज किया, जिसमें उन्होंने आश्वासन दिया कि पुलिस आगे खान को समन या कॉल नहीं करेगी।

मौलिक अधिकारों का उल्लंघन और निष्पक्ष जांच की मांग

अपनी याचिका में मोहम्मद वासिक नदीम खान ने नई दिल्ली जिले में बीएनएसएस की धारा 163 के तहत सार्वजनिक सभाओं और विरोध प्रदर्शनों पर लगाई गई व्यापक पाबंदियों को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह प्रशासनिक आदेश नागरिकों के संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का सीधा हनन करता है।

याचिका में मांग की गई है कि 29 सितंबर को उनकी आवाजाही पर लगाई गई अवैध रोक को पूरी तरह से गैर-कानूनी घोषित किया जाए। साथ ही, इस पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच कराई जाए और अगर कोई पुलिसकर्मी अवैध रूप से काम करने का दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। ​(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)

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