राज शेखावत की कथित पुलिस हिरासत पर दिल्ली हाई कोर्

UGC नियमों के विरोध के बीच राज शेखावत की हिरासत पर HC में सुनवाई, जानें क्या है पूरा मामला

Delhi high court (File photo)

नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट आज मंगलवार को क्षत्रिय करणी सेना के अध्यक्ष राज शेखावत की उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें दिल्ली पुलिस पर उन्हें प्रदर्शन में शामिल होने से पहले हिरासत में लेने और बाद में एक मित्र के घर से बाहर नहीं निकलने देने का आरोप लगाया गया है। याचिका में दावा है कि इस पूरी कार्रवाई के लिए कोई लिखित हिरासत या गिरफ्तारी आदेश नहीं दिया गया।

प्रदर्शन में जाने से पहले हिरासत का आरोप

राज शेखावत की ओर से अधिवक्ता लोकेश भारद्वाज ने मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ के समक्ष याचिका का उल्लेख किया। वकील ने अदालत को बताया कि शेखावत को 23 अगस्त को उस समय कथित तौर पर पुलिस ने हिरासत में ले लिया, जब वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के इक्विटी नियमों के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे थे। खंडपीठ ने याचिका पर आज सुनवाई करने पर सहमति जताई है।

जनवरी से UGC नियमों के खिलाफ अभियान

याचिका के मुताबिक, शेखावत जनवरी 2026 से UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 को वापस लेने की मांग को लेकर अभियान चला रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि 23 अगस्त को प्रस्तावित कार्यक्रम के बारे में पहले ही सिविल लाइंस थाने के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) को लिखित सूचना दी गई थी। इसमें कार्यक्रम का स्थान, समय और करीब 450 से 500 लोगों के संभावित जुटने की जानकारी भी दी गई थी।

दोस्त के घर से बाहर निकलने पर भी रोक का दावा

याचिका के अनुसार, 23 अगस्त को शाम करीब 5:30 बजे पुलिस ने शेखावत को हिरासत में लिया। आरोप है कि उन्हें करीब आधी रात तक रखा गया और इसके बाद बिना किसी गिरफ्तारी ज्ञापन, पुलिस रिकॉर्ड पर आवश्यक समर्थन/एंडोर्समेंट या हिरासत की वजह बताए बिना छोड़  दिया गया। याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि 24 अगस्त की सुबह से दिल्ली पुलिस के जवान शेखावत के नेब सराय स्थित एक मित्र के आवास के बाहर तैनात कर दिए गए। याचिकाकर्ता का दावा है कि उन्हें वहां से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई।

'निषेधाज्ञा भी नहीं दी गई'

शेखावत की याचिका में कहा गया है कि उन्हें किसी तरह का निषेधात्मक आदेश (prohibitory order) भी नहीं सौंपा गया था। याचिका के मुताबिक, न तो कोई गिरफ्तारी ज्ञापन था, न रिमांड आदेश और न ही निवारक हिरासत (preventive detention) का आदेश। इसमें यह भी कहा गया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) या किसी अन्य कानून के तहत ऐसा कोई लिखित आदेश मौजूद नहीं था, जो उनकी कथित हिरासत को वैध ठहरा सके।

सुप्रीम कोर्ट के UGC नियमों वाले आदेश का भी हवाला

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 29 जनवरी के आदेश का भी सहारा लिया गया है। यह आदेश Mritunjay Tiwari v. Union of India & Anr. मामले में UGC के 2026 के इक्विटी नियमों से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने प्रथमदृष्टया माना था कि 2026 के नियमों के कुछ प्रावधानों में अस्पष्टता है और उनके दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके बाद शीर्ष अदालत ने इन नियमों को फिलहाल प्रभावी न रखने यानी abeyance में रखने का निर्देश दिया था। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के नियमों को लागू रखने का निर्देश दिया था।

हाई कोर्ट से क्या मांग की गई है?

शेखावत ने दिल्ली हाई कोर्ट से हैबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) रिट जारी करने की मांग की है। इसके तहत संबंधित अधिकारियों को उन्हें अदालत के सामने पेश करने का निर्देश देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि यदि अधिकारी उनकी कथित हिरासत के लिए कोई वैध कानूनी अधिकार साबित नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। 

इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने उनकी कथित आवाजाही पर रोक से जुड़े रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने और अदालत के समक्ष पेश करने की भी मांग की है। उन्होंने अदालत से यह निर्देश देने का अनुरोध भी किया है कि भविष्य में अधिकारियों द्वारा ऐसी कार्रवाई दोबारा न की जाए, जब तक वह कानून के अनुरूप न हो। ​(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)

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