ईरान और यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी टैरिफ संकट का असर

ईरान-यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी टैरिफ से वैश्विक असमानता में बढ़ोतरी, मंदी का खतरा

Global Inequality Peaks, UN Warns of Recession

नई दिल्ली। ईरान और यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी टैरिफ संकट का असर अब वैश्विक स्तर अपना असर दिखाने लगा है। दुनिया में अमीर और गरीब देशों के बीच असमानता तेजी से बढ़ रही है। मंदी का खतरा मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है। रिपोर्ट में सम्पन्न देशों द्वारा छोटे देशों को घटती आर्थिक मदद, बढ़ते टैरिफ और वैश्विक तनाव को इसका प्रमुख कारण माना गया है।

घटती आर्थिक मदद और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव से वैश्विक मंदी का खतरा

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की चेतावनियों के अनुसार, विकसित देशों द्वारा मदद में कटौती और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने तेल कीमतों में उछाल और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) को बाधित कर दिया है। इससे वैश्विक स्तर पर मंदी का खतरा मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है। यह रिपोर्ट अगले हफ्ते वाशिंगटन में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की अहम बैठकों से ठीक पहले जारी की गई है।

अमेरिका की मदद में कटौती से कमजोर अर्थव्यवस्थाओं पर बढ़ा दबाव

रिपोर्ट के अनुसार अमीर और गरीब देशों के बीच असमानता तेजी से बढ़ रही है। इसके पीछे तीन बड़े कारण सामने आए हैं- घटती आर्थिक मदद, बढ़ते टैरिफ और वैश्विक तनाव। रिपोर्ट में बताया गया है कि सबसे ज्यादा असर अमेरिका की ओर से मदद घटने का रहा, जिससे कमजोर अर्थव्यवस्थाओं पर सीधा दबाव बढ़ा। अमेरिका ने विकासशील देशों को दिए जाने वाले फंड में 59 प्रतिशत तक कटौती कर दी है। इससे कुल मदद में 23 फीसदी की गिरावट आई। यह अब तक की सबसे बड़ी कमी है। नतीजा यह रहा कि विकसित और समृद्ध राष्ट्र और मजबूत होते जा रहे हैं। वहीं, गरीब देश विकास की दौड़ में पीछे छूटते जा रहे हैं। इस खाई को कम करने के लिए वैश्विक वित्तीय संस्थानों में बड़े सुधार समेत कई ऐतिहासिक फैंसलों पर सहमति बनी थी लेकिन वह पूरी नहीं हुई।

2030 तक विकास लक्ष्यों को हासिल करना होगा चुनौतीपूर्ण

संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि 2030 तक विकास लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा। पिछले साल जून में अमीर देशों और गरीब देशों के बीच बढ़ती खाई को कम करने के लिए एक प्लान बनाया गया था और रूपरेखा तैयार की गई थी। इस रूपरेखा का उद्देश्य अमीर-गरीब देशों के बीच की खाई को पाटना और 2030 तक संयुक्त राष्ट्र के विकास लक्ष्यों को हासिल करना है।

बढ़ते टैरिफ से गरीब देशों की अर्थव्यवस्था पर असर

बढ़ती वैश्विक असमानता की दूसरी बड़ी वजह बढ़ते टैरिफ हैं। गरीब देशों पर औसत टैरिफ 9 फीसदी से बढ़कर 28 फीसदी तक पहुंच गया है, जबकि अन्य विकासशील देशों के लिए यह 19 फीसदी तक हो गया। इससे उनका निर्यात प्रभावित हुआ और आर्थिक रफ्तार धीमी पड़ गई। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बढ़ती व्यापारिक बाधाएं और एक के बाद एक आ रही जलवायु संबंधी आपदाएं भी इस बढ़ती खाई को और चौड़ा कर रही हैं।

वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव से वित्तीय संसाधन जुटाना मुश्किल

संयुक्त राष्ट्र में आर्थिक और सामाजिक मामलों के अवर महासचिव ली जुनहुआ ने चेतावनी देते हुए बताया कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव विकासशील देशों की चुनौतियों को और गंभीर बना रहे हैं। इन तनावों के कारण विकासशील देशों के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना पहले से कहीं ज्यादा कठिन होता जा रहा है। उन्होंने कहा, 'अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए यह समय बेहद जोखिम भरा बनता जा रहा है, क्योंकि भू-राजनीतिक हित अब तेजी से आर्थिक संबंधों और वित्तीय नीतियों की दिशा तय करने लगे हैं।'

IMF प्रमुख ने ईरान युद्ध के कारण वैश्विक विकास पर जताई अनिश्चितता

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने कहा कि वैश्विक विकास को गति देने की पूरी तैयारी थी लेकिन ईरान युद्ध के कारण अब विश्व अर्थव्यवस्था के भविष्य पर अनिश्चितता के गहरे बादल छा गए हैं। स्पेन के सेविले में पिछले साल आयोजित सम्मेलन में अमेरिका को छोड़कर कई देशों के नेताओं ने सर्वसम्मति से 'सेविले प्रतिबद्धता' को अपनाया था। इसका उद्देश्य विकास के लिए हर साल मौजूद चार हजार अरब डॉलर की वित्तीय कमी को पाटना था। सेविले प्रतिबद्धता को लागू करने का आकलन करती संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती वित्तीय खाई को पाटने के लिए यह सबसे बड़ी उम्मीद है। 

रिपोर्ट में नए संकट की चेतावनी

संयुक्त राष्ट्र अवर महासचिव ली जुनहुआ ने कहा कि 2025 में 25 देशों ने गरीब राष्ट्रों के लिए अपनी विकास सहायता में कटौती कर दी। इसके परिणामस्वरूप 2024 की तुलना में कुल मिलाकर 23 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी 59 प्रतिशत की गिरावट अमेरिका की ओर से देखी गई। ली ने यह भी कहा कि प्रारंभिक आंकड़ों के आधार पर 2026 में इसमें और 5.8 प्रतिशत की गिरावट आने की आशंका है, जो वैश्विक सहयोग के सामने नई चुनौतियों की ओर संकेत करती है।

यह भी पढ़ें: https://www.primenewsnetwork.in/india/india-sends-second-medical-aid-shipment-to-iran/156839

भारत ने ईरान को भेजी चिकित्सा सहायता की दूसरी खेप