साधारण आपराधिक केस होने पर नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता : इलाहाबाद हाईकोर्ट
High Court : साधारण या मामूली प्रकृति के लंबित आपराधिक मामले (Small/Trivial Criminal Case) के आधार पर किसी अभ्यर्थी को सरकारी नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। खास तौर पर तब जब उसने मामले की जानकारी स्वयं दी हो। इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह आदेश दिया है।
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अहम फैसले में कहा है कि मामूली लड़ाई-झगड़े (उदा. धारा 323, 504, 506 IPC) के लंबित मामलों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्यता नहीं माना जा सकता, जब तक कि दोषसिद्धि न हुई हो। खास तौर पर तब जब अभ्यर्थी ने ईमानदारी से इस मामले की जानकारी स्वयं दी हो। कोर्ट ने कहा कि यदि उम्मीदवार ने फॉर्म भरते समय आपराधिक मामले की जानकारी छुपाने के बजाय, उसे स्वयं घोषित किया है, तो यह उनके पक्ष में एक सकारात्मक तथ्य माना जाता है।
न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार की एकल पीठ ने यह फैसला राकेश कुमार वर्मा की सेवा संबंधी याचिका को मंजूर करते हुए पारित किया। अदालत में दायर याचिका में कहा गया था कि याची का चयन उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग से कनिष्ठ सहायक पद पर हुआ था और वह चिकित्सकीय रूप से भी उपयुक्त पाया गया था। इसके बावजूद उसके खिलाफ एक लंबित आपराधिक मुकदमे के आधार पर उसे नियुक्ति देने से इन्कार कर दिया गया था। इसे याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याची के विरुद्ध दहेज प्रताड़ना, साधारण मारपीट, अपशब्द कहने समेत धमकी देने के आरोपों में केस दर्ज था जो, उसके बड़े भाई के वैवाहिक विवाद से जुड़ा हुआ था। अदालत ने पाया कि याची इस मामले में मुख्य आरोपी नहीं, बल्कि सह आरोपी है और उसके खिलाफ कोई विशिष्ट आरोप भी नहीं है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवतार सिंह मामले में दिए निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि यदि अभ्यर्थी ने आपराधिक मामले की जानकारी स्वयं दी है और मामला गंभीरे प्रकृति का नहीं है, तो उसे केवल इसी आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याचिका मंजूर कर ली।
न्यायालय ने यह भी कहा कि पारिवारिक विवाद से जुड़े मामलों में सामान्य आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति के भविष्य को प्रभावित करना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, न कि दंडात्मक। इसी आधार पर न्यायालय ने नियुक्ति से इनकार संबंधी 6 जुलाई, 2020 के आदेश को निरस्त करते हुए, संबंधित विभाग को याची को तत्काल नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह फैसला गंभीर आपराधिक मामलों (जैसे हत्या, बलात्कार, डकैती) या उन मामलों में लागू नहीं हो सकता है जहाँ नैतिक अधमता (Moral Turpitude) शामिल हो।
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