आईआईटी गुवाहाटी की नई तकनीक से CO₂ कैप्चर और माइक्रोएल्गल बायोफ्यूल उत्पादन को मिलेगी रफ्तार
गुवाहाटी: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक दो-चरणीय संवर्धन प्रक्रिया विकसित की है, जो कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) अवशोषण, सूक्ष्म शैवाल बायोमास उत्पादन, कुशल स्व-कटाई और जैव ऊर्जा उत्पादन को एक साथ बढ़ा सकती है। सूक्ष्म शैवाल CO₂ को अवशोषित करते हुए बायोमास तैयार करते हैं, जिसे बायोडीजल जैसे नवीकरणीय ईंधन और अन्य उपयोगी जैव ऊर्जा उत्पादों में बदला जा सकता है।
लंबे समय तक ज्यादा CO₂ से आती है परेशानी
हालांकि, पिछले शोधों से पता चला है कि उच्च CO₂ सांद्रता के लंबे समय तक संपर्क में रहने से पोषक तत्वों की कमी हो सकती है और प्रकाश संश्लेषण की क्षमता कम हो सकती है। इससे सूक्ष्म शैवाल की वृद्धि प्रभावित होती है और बायोमास उत्पादन की क्षमता घट सकती है।
दो-चरणीय प्रक्रिया से समस्या का समाधान
इस समस्या के समाधान के लिए आईआईटी गुवाहाटी के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के प्रोफेसर कौस्तुभा मोहंती के नेतृत्व में शोध टीम ने शोधार्थी दीपेश सिंह चौहान के साथ मिलकर दो-चरणीय प्रक्रिया विकसित की है। पहले चरण में शोध टीम ने 15% CO₂ के तहत सूक्ष्म शैवाल का संवर्धन किया। उच्च कार्बन उपलब्धता से शुरुआती दौर में शैवाल की तेज वृद्धि को बढ़ावा मिला। हालांकि, शोधकर्ताओं ने पाया कि 15% CO₂ के लंबे समय तक संपर्क में रहने से अम्लीकरण हुआ और शैवाल की वृद्धि दर कम हो गई।
दूसरे चरण में CO₂ की मात्रा घटाई
दूसरे चरण में टीम ने CO₂ की सांद्रता को घटाकर 5% कर दिया। इसके साथ ही वातावरण को स्थिर करने और बायोमास के एकत्रीकरण को बेहतर बनाने के लिए कैल्शियम और फास्फोरस मिलाए गए। CO₂ की सांद्रता कम करने से pH संतुलन बहाल करने और प्रकाश संश्लेषण की गतिविधि को बनाए रखने में मदद मिली। वहीं, कैल्शियम के इस्तेमाल से सूक्ष्म शैवाल कोशिकाओं के स्व-फ्लोक्यूलेशन को बढ़ावा मिला।
शोध में सामने आए बेहतर नतीजे
इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित Renewable Energy पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। 2-लीटर बबल-कॉलम फोटोबायोरिएक्टर में किए गए प्रयोग के दौरान शोधकर्ताओं ने सूक्ष्म शैवाल की वृद्धि और प्रदर्शन को रिकॉर्ड किया। शोध में 25.7% अधिक बायोमास उत्पादन, 35.4% अधिक CO₂ स्थिरीकरण और 1.86 गुना अधिक लिपिड उत्पादकता दर्ज की गई। इसके अलावा, कुल अंतःकोशिकीय जैव ऊर्जा दक्षता में 37.65% सुधार और परिणामी बायोमास में उच्च ऊर्जा मूल्य पाया गया।
औद्योगिक स्तर पर CO₂ कैप्चर की उम्मीद
शोध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रोफेसर कौस्तुभा मोहंती ने कहा, "यह शोध औद्योगिक स्तर पर CO₂ को प्रभावी ढंग से ग्रहण करने का मार्ग प्रशस्त करता है, जहां औद्योगिक फ्लू गैस को CO₂ के निरंतर स्रोत के रूप में उपयोग किया जा सकता है।" उन्होंने कहा कि शोध CO₂ ग्रहण के व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण पहलू यानी डाउनस्ट्रीम पृथक्करण ऊर्जा को कम करने पर भी ध्यान केंद्रित करता है। यह माइक्रोएल्गल बायोरेफाइनरी की लागत का एक प्रमुख हिस्सा है। उनके मुताबिक, इस तकनीक का सबसे तत्काल प्रभाव CO₂-समृद्ध औद्योगिक निकास धाराओं और एकीकृत माइक्रोएल्गल बायोरेफाइनरी के लिए पायलट-स्तरीय तकनीक के रूप में देखने को मिल सकता है।
कैल्शियम से आसान हुई बायोमास की रिकवरी
विकसित प्रक्रिया की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता माइक्रोएल्गल बायोमास का स्वतः अवसादन है। शोध दल ने पाया कि कैल्शियम मिलाने से कोशिकाओं का एकत्रीकरण बढ़ा, जिससे शैवाल कोशिकाएं सघन समूह बना सकीं। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप बायोमास पुनर्प्राप्ति दक्षता में 98.46% की वृद्धि दर्ज की गई। इससे बायोमास को अलग करने में लगने वाली ऊर्जा और प्रक्रिया की लागत को कम करने की संभावना बढ़ती है।
भारत समेत तीन क्षेत्रों के मानकों पर खरा बायोडीजल
शोधकर्ताओं के अनुसार, विकसित सूक्ष्म शैवाल से प्राप्त बायोडीजल भारत, अमेरिका और यूरोप के बायोडीजल मानकों के अनुरूप पाया गया। इससे इस तकनीक के नवीकरणीय ईंधन उत्पादन में इस्तेमाल की संभावनाएं और मजबूत होती हैं। विकसित प्रक्रिया और इसके उप-उत्पादों की क्षमता के बारे में शोधार्थी दीपेश सिंह चौहान ने कहा कि निष्कर्ष एक ही संवर्धन ढांचे के भीतर CO₂ कैप्चर, सूक्ष्म शैवाल बायोमास उत्पादन, नवीकरणीय जैव ऊर्जा उत्पादन और कम ऊर्जा वाले बायोमास पुनर्प्राप्ति को एकीकृत करने की क्षमता दिखाते हैं। अध्ययन का निष्कर्ष है कि दो-चरणीय पोषक तत्व-सहायता प्राप्त CO₂ मॉड्यूलेशन रणनीति सूक्ष्म शैवाल बायोरेफाइनरी की दिशा में एक आशाजनक रास्ता प्रदान करती है। यह रणनीति एक साथ दो बड़ी चुनौतियों का समाधान करने की कोशिश करती है—लंबे समय तक संवर्धन के दौरान प्रभावी कार्बन स्थिरीकरण बनाए रखना और बायोमास की कटाई से जुड़ी ऊर्जा जरूरतों को कम करना।
(एएनआई)
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