100 वर्ष का सफ़र, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का महत्व और योगदान
विनोद तैलंग, भोपाल
भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक धारा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का नाम एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नागपुर में स्थापित यह संगठन अब अपनी शताब्दी वर्षगांठ (2025) मना रहा है। अपने 100 वर्षों के सफ़र में संघ ने भारतीय समाज, संस्कृति, शिक्षा, राजनीति और राष्ट्रवाद के क्षेत्र में गहरी छाप छोड़ी है। यह संगठन न केवल विचारधारा का पोषण करता है बल्कि सेवा, अनुशासन और संगठन के बल पर समाज को दिशा देने का भी प्रयास करता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और महत्व
आरएसएस की स्थापना का समय विशेष था. 1920 का दशक स्वतंत्रता संग्राम की ऊष्मा से भरा हुआ था, लेकिन समाज जातीयता, भाषा और प्रांतीयता के भेदों में बंटा हुआ था। हेडगेवार का मानना था कि अगर भारत को स्वतंत्रता के बाद भी मजबूत बनाना है तो समाज को पहले संगठित करना होगा। संघ ने प्रारंभ से ही स्वयं को एक सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया। “हम सब भारतीय हैं” की भावना इसका मूल सिद्धांत रहा। यह संगठन राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक परिभाषा तक सीमित न रखकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में देखता है।
आरएसएस का योगदान
1. स्वतंत्रता आंदोलन और विभाजन काल
आलोचनाओं के बावजूद संघ के कई स्वयंसेवक भूमिगत आंदोलनों और सामाजिक जागरण में जुड़े रहे. 1947 के विभाजन के समय संघ ने शरणार्थियों के पुनर्वास और उनकी सुरक्षा में अग्रणी भूमिका निभाई.
2. सेवा कार्य और आपदाओं में सहयोग
2001 का गुजरात भूकंप, 2013 की केदारनाथ त्रासदी और हाल ही में कोविड-19 महामारी—हर बार संघ के स्वयंसेवक राहत और सेवा में सबसे आगे रहे. भोजन वितरण, शव-दाह, अस्पताल सेवा और ग्रामीण सहायता में संघ की सक्रियता देखी गई.
3. शिक्षा और सामाजिक संस्थाएँ
संघ से प्रेरित संस्थाओं ने शिक्षा और सेवा का विशाल नेटवर्क खड़ा किया है. विद्या भारती, सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम जैसी संस्थाएँ लाखों बच्चों और परिवारों के जीवन को नई दिशा दे रही हैं.
4. राजनीतिक प्रभाव
संघ ने प्रत्यक्ष राजनीति में प्रवेश नहीं किया, परंतु भारतीय जनता पार्टी और अन्य संगठनों के वैचारिक आधार को मजबूत किया। आज केंद्र और कई राज्यों में सत्ता संरचना पर उसका प्रभाव दिखाई देता है.
5. ग्रामोदय और समाज सुधार
ग्रामीण विकास, गौ-सेवा, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी उत्पादों के प्रोत्साहन और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में भी संघ का योगदान उल्लेखनीय है.
विशेषताएँ और संगठन शैली
• अनुशासन और समयपालन: संघ की शाखाएँ निश्चित समय पर लगती हैं और स्वयंसेवकों को समयबद्धता सिखाती हैं. • स्वयंसेवक भावना: बिना वेतन और स्वार्थ, समाज और राष्ट्र के लिए कार्य करना इसकी आत्मा है। • विचारधारा का संगठन: संघ कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है। • दीर्घकालिक दृष्टि: यह संगठन तत्काल लाभ के बजाय पीढ़ियों तक असर डालने वाले कार्यों पर केंद्रित रहता है।
आलोचनाएँ और विवाद
संघ जितना प्रभावशाली है, उतना ही विवादों का केंद्र भी रहा है. 1. सांप्रदायिकता का आरोप – आलोचकों का कहना है कि यह संगठन केवल हिंदू समाज पर केंद्रित है, जिससे अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस कर सकते हैं. 2. राजनीतिक प्रभाव – विरोधियों का मानना है कि संघ का प्रभाव भाजपा की नीतियों में स्पष्ट दिखता है. 3. महिला भागीदारी – आलोचक संघ की मुख्यधारा शाखाओं में महिलाओं की सीमित भूमिका को लेकर प्रश्न उठाते हैं, हालांकि ‘राष्ट्र सेविका समिति’ सक्रिय है. 4. स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका – इतिहासकारों में मतभेद है कि संघ की प्रत्यक्ष भूमिका स्वतंत्रता आंदोलन में कितनी रही.
महान व्यक्तियों की राय
आरएसएस के बारे में भारतीय महान नेताओं ने समय-समय पर अपने विचार व्यक्त किए: • महात्मा गांधी (1947, नागपुर शाखा दौरे पर): “मैंने संघ में कोई असमानता नहीं देखी। यहाँ सब जातियों और वर्गों के लोग मिलकर काम कर रहे हैं.” • डॉ. भीमराव आंबेडकर: “संघ की शाखा में मैंने देखा कि न कोई ब्राह्मण है न अछूत—सब समान भाव से खेलते और राष्ट्रभक्ति सीखते हैं. यही भारतीय समाज की आवश्यकता है.” • लाल बहादुर शास्त्री: “संघ के स्वयंसेवकों का अनुशासन और निस्वार्थ सेवा देश के लिए एक आदर्श है.” • सुभाष चंद्र बोस: “यदि भारत को अनुशासित और संगठित समाज चाहिए, तो आरएसएस जैसी संस्थाओं की भूमिका अहम होगी.” • डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन: “आरएसएस शाखाएँ भारतीय संस्कृति और संगठन की शक्ति का प्रतीक हैं.”
निष्कर्ष
100 वर्षों की इस यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय समाज को एकजुट करने और अनुशासन, सेवा तथा राष्ट्रभक्ति की भावना जगाने का कार्य किया है. आलोचनाएँ और विवाद इसके साथ रहे हैं, लेकिन इनसे इसकी प्रासंगिकता कम नहीं होती. आज जब भारत विश्व पटल पर नई ऊँचाइयाँ छू रहा है, तब राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक समरसता का संदेश देने वाले संगठनों की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है. आरएसएस की शताब्दी यात्रा यह प्रमाणित करती है कि विचार, संगठन और सेवा की शक्ति से ही राष्ट्र निर्माण संभव है. आने वाले समय में भी संघ की भूमिका भारतीय समाज के लिए प्रेरणादायी बनी रहेगी. प्रधानमंत्री मोदी ने बुधवार को आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर डाक टिकट और 100 रुपए का सिक्का जारी किया है.
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