भारत-चीन संबंधों को फिर मजबूत करने के संकेत, विदेश मंत्रालय ने राजनयिक वार्ता का दिया हवाला
नई दिल्ली: विदेश मंत्रालय ने बुधवार को भारत और चीन के बीच जारी उच्च स्तरीय राजनयिक वार्ताओं का जिक्र किया। यह बयान केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की उन टिप्पणियों के बाद आया, जिनमें उन्होंने चीन के साथ आर्थिक संबंधों को फिर से मजबूत करने की संभावनाओं के संकेत दिए थे। गोयल की टिप्पणियों में संभावित द्विपक्षीय बैठकों और दोनों देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पिछले एक वर्ष से राजनयिक माध्यमों के जरिए लगातार संवाद जारी है। जायसवाल ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा, "भारत-चीन संबंधों पर, हमने पिछले एक वर्ष में कई बैठकें की हैं।" हाल ही में हुए उच्च स्तरीय राजनयिक संपर्कों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "जब राष्ट्रपति शी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए यहां आए थे, तब हमारी एक शिखर स्तरीय बैठक हुई थी; उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी।" उन्होंने आगे कहा, "हम आपको इस संबंध में हो रहे घटनाक्रमों से अवगत कराते रहे हैं, और आगे भी ऐसा करते रहेंगे।"
निष्पक्ष शर्तों पर चीन के साथ व्यापार को तैयार भारत
पीयूष गोयल के बयान से चीन के साथ आर्थिक संबंधों को नए सिरे से विकसित करने की संभावना का संकेत मिला है। उन्होंने कहा कि भारत चीन समेत दुनिया भर के देशों के साथ व्यापारिक संबंध बनाने के लिए तैयार है, बशर्ते शर्तें निष्पक्ष हों और भू-राजनीतिक स्थिति स्थिर बनी रहे। ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और प्रौद्योगिकी साझेदारी पर एक पैनल चर्चा के दौरान गोयल ने कहा, “हम दुनिया भर के सभी देशों के साथ व्यापार के लिए तैयार हैं, बशर्ते हमें निष्पक्ष समझौता मिले, हमारे संबंधों में निरंतरता सुनिश्चित हो और भू-राजनीतिक स्थिति में कोई गिरावट न आए।” उन्होंने आगे कहा, “हम चीन के साथ संबंधों को फिर से विकसित करने के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन इस यात्रा का अंत अभी नहीं हुआ है।”
जयशंकर ने सीमा पर शांति और स्थिरता को बताया जरूरी
इस बीच, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत-चीन संबंधों को सामान्य बनाने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता जरूरी है। उन्होंने जोर दिया कि सीमा पर किसी भी तरह की अशांति के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम के प्रधान संपादक जॉन मिकलेथवेट के साथ बातचीत में जयशंकर ने कहा कि भारत और चीन के बीच कोई सर्वमान्य सीमा रेखा नहीं है और यह मुद्दा दशकों से बना हुआ है। उन्होंने कहा, “भारत और चीन के बीच कोई सर्वमान्य सीमा नहीं है। यह कोई नया मुद्दा नहीं है; यह कई दशकों से चला आ रहा है... 1975 से 2020 तक, पूरे 45 वर्षों तक, उस सीमा पर कोई खून-खराबा नहीं हुआ। आखिरी बार जानमाल का नुकसान 1975 में हुआ था। इस दौरान भारत-चीन संबंध मजबूत हुए।”
सीमा विवाद सुलझने के साथ संबंध सामान्य होने की उम्मीद
चीन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने पर भारत के रुख को स्पष्ट करते हुए जयशंकर ने कहा कि व्यापक द्विपक्षीय संबंधों में प्रगति के लिए सीमा की स्थिति स्थिर रहना जरूरी है। उन्होंने कहा, “हम चीन से यही कहते हैं: ‘अगर आप सामान्य संबंध चाहते हैं, अगर बाकी के संबंध आगे बढ़ने हैं, तो यह स्वाभाविक है। इसमें कोई शक नहीं कि सीमा स्थिर होनी चाहिए, हमें सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता चाहिए।’ सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिति सुधर रही है, 2024 से काफी हद तक स्थिति स्थिर हो चुकी है; इसके साथ ही संबंध भी सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं।”
चीन के निवेश और बाजार पहुंच पर भी चर्चा
जब जयशंकर से पूछा गया कि क्या भारत शीघ्र समझौते पर पहुंचने की स्थिति में चीन को अधिक निवेश की अनुमति देने पर विचार करेगा, तो उन्होंने कहा कि संभावनाओं पर चर्चा जारी है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि निवेश और बाजार पहुंच से जुड़ी नीतियों पर सीमा विवाद से अलग विचार किया जाएगा।
(एएनआई)
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