सिंधु जल संधि को निलंबित करने पर विनय क्वात्रा का

सिंधु जल संधि पर विनय क्वात्रा का बड़ा बयान: पाकिस्तान की धमकियां घरेलू विफलताओं से ध्यान भटकाने की चाल

Indian Ambassador to the United States Vinay Kwatra

नई दिल्ली। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने एक प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका 'न्यूजवीक' में लिखे गए अपने लेख के जरिए पाकिस्तान पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत द्वारा 1960 की सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को निलंबित (In Abeyance) करने का निर्णय केवल इस बात की औपचारिक पुष्टि है, जिसे पाकिस्तान के लगातार शत्रुतापूर्ण आचरण ने बहुत पहले ही नष्ट कर दिया था। क्वात्रा के मुताबिक, पाकिस्तान की ओर से युद्ध की धमकियां देना केवल उसकी घरेलू विफलताओं और आंतरिक समस्याओं से जनता का ध्यान भटकाने की एक पुरानी चाल मात्र है।

सिंधु जल संधि विवाद और भारत के कड़े रुख से जुड़ी मुख्य बातें:

  • पहलगाम आतंकी हमला: भारत का यह बड़ा नीतिगत कदम 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों द्वारा पर्यटकों पर किए गए बेहद बर्बर हमले के ठीक एक दिन बाद उठाया गया था।
  • बड़ा नागरिक नुकसान: पहलगाम हमले में 25 भारतीय नागरिकों और 1 नेपाली नागरिक समेत कुल 26 बेकसूर लोगों की जान चली गई थी, जो 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमलों के बाद भारत में किसी आतंकी घटना में सबसे बड़ा नागरिक हताहतों का आंकड़ा है।
  • पाकिस्तान की रणनीतिक विफलता: राजदूत क्वात्रा ने बताया कि पाकिस्तान को मिलने वाले कुल पानी का केवल 40 फीसदी हिस्सा ही उसके खेतों तक पहुंच पाता है, जबकि 30 फीसदी से अधिक पानी रास्ते में बर्बाद हो जाता है और शेष पानी बिना इस्तेमाल के समुद्र में बह जाता है।
  • ऐतिहासिक असंतुलन: 1960 की संधि के तहत भारत को तीन पूर्वी नदियां (लगभग 20% पानी) और पाकिस्तान को तीन पश्चिमी नदियां (लगभग 80% पानी) मिलीं, जिससे दशकों तक भारत के कई क्षेत्र जल अधिकारों से वंचित रहे, फिर भी भारत ने समझौते का सम्मान किया।

आपसी सद्भाव की भावना को पाकिस्तान ने किया खंड-खंड

राजदूत विनय क्वात्रा ने 'न्यूजवीक' में लिखे अपने लेख में याद दिलाया कि इस संधि की प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि यह "सद्भाव और मित्रता की भावना" के साथ संपन्न हुई थी। लेकिन विडंबना यह है कि पाकिस्तान ने पिछले आधी सदी में अपनी हरकतों से इस सद्भाव को पूरी तरह से समाप्त कर दिया।

भारत का यह कदम इस बात की मात्र मान्यता है कि पाकिस्तान का आचरण पहले ही इस समझौते के मूल आधार को खत्म कर चुका था। हाल ही में इस्लामाबाद में पाकिस्तान द्वारा एक सम्मेलन आयोजित कर भारत के फैसले का विरोध करने और युद्ध की धमकियां देने पर क्वात्रा ने कहा कि यह केवल उनकी अंदरूनी कलह और प्रशासनिक नाकामी को छिपाने का हथकंडा है।

'आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकती'

भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत की वकालत करने वालों को आड़े हाथों लेते हुए भारतीय राजदूत ने दो टूक कहा कि जो लोग भारत और पाकिस्तान के बीच अतीत की वार्ताओं के इतिहास पर ध्यान नहीं देते, या जो यह मानते हैं कि बार-बार एक ही तरीके को अपनाकर अलग-अलग परिणामों की उम्मीद करना पागलपन नहीं है, वे गंभीर भ्रम में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्पष्ट और अटल रुख को दोहराते हुए क्वात्रा ने लिखा कि भारत की नीति बिल्कुल साफ है- "आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकती। आतंक और व्यापार एक साथ नहीं चल सकता। पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते।" 

पाकिस्तान ने 1965, 1971 और 1999 में भारत के खिलाफ युद्ध छेड़े और दशकों तक सीमा पार आतंकवाद जारी रखा, जिसमें 2001 की संसद पर हमला, 2008 का मुंबई हमला, 2016 के उरी और पठानकोट हमले, तथा 2019 का पुलवामा हमला शामिल है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि कैसे पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के कारण पिछले दशकों में भारत में 40,000 से अधिक नागरिकों की जान जा चुकी है।

कूटनीतिक और संस्थागत बाधाओं का लंबा इतिहास

लेख में इस बात का भी विशेष जिक्र किया गया है कि पाकिस्तान ने पिछले छह दशकों में न केवल भारत के जल संसाधनों के विकास को रोकने की साजिश रची, बल्कि संधि के प्रावधानों का इस्तेमाल कर भारत की हर हाइड्रो प्रोजेक्ट को कानूनी और नौकरशाही की अंतहीन बाधाओं में उलझाए रखा। 

वर्ष 2012 में टुलबुल नेविगेशन प्रोजेक्ट पर हुआ सीधा आतंकी हमला इसका सबसे बड़ा प्रमाण है, जिसने भारत को संधि के तहत मिलने वाले अपने वैध अधिकारों का उपयोग करने से पूरी तरह रोक दिया था। राजदूत ने रेखांकित किया कि पाकिस्तान ने छह दशकों तक भारत की उन पहलों को लगातार बाधित किया और ठुकराया, जिनके जरिए समकालीन वास्तविकताओं के अनुरूप संधि का पुनर्गठन करके भारत अपनी जलविद्युत क्षमता विकसित कर सकता था।

प्रभाव विश्लेषण (Impact Analysis)

1. भारत-पाकिस्तान कूटनीति पर इसका क्या असर होगा? इस स्पष्ट और आक्रामक कूटनीतिक संदेश से वैश्विक स्तर पर यह साफ हो गया है कि भारत अब आतंकवाद और द्विपक्षीय वार्ताओं को एक साथ जोड़कर देखने की नीति को पूरी तरह खारिज कर चुका है। सिंधु जल संधि पर भारत का रुख कड़ा होना यह बताता है कि रणनीतिक मोर्चे पर नई दिल्ली अब पाकिस्तान के हर कृत्य का माकूल और कड़ा जवाब देने के लिए तैयार है।

2. क्या पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में इस बयान का असर पड़ेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अपनी विफल अर्थव्यवस्था, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ती महंगाई से जनता का ध्यान भटकाने के लिए अक्सर भारत विरोधी बयानबाजी और युद्ध की धमकियों का सहारा लेता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस तरह की पोल खुलने से इस्लामाबाद पर अपनी घरेलू जल प्रबंधन प्रणालियों को सुधारने का नैतिक दबाव बढ़ेगा। ​(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)

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