रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह बोले- सैन्य सेवाओं के लिए भारत को अपनी AI लेयर विकसित करनी होगी
नई दिल्ली। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा कि भारत को अपनी सैन्य सेवाओं के लिए स्वदेशी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) लेयर विकसित करनी होगी। आधुनिक साइबर खतरों और ड्रोन युद्ध की चुनौतियों से निपटने के लिए देश अपने रक्षा ढांचे को मजबूत कर रहा है। शुक्रवार को KPMG के एक कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि भारत हवाई सुरक्षा तंत्र को व्यापक और बहुस्तरीय बनाने के साथ-साथ मिसाइल उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी काम कर रहा है।
AI से लक्ष्य की पहचान और सैन्य निर्णय लेने में मिलेगी मदद
रक्षा सचिव ने कहा कि सैन्य अभियानों में AI का इस्तेमाल निर्णय लेने में सहायता, लक्ष्यों की पहचान और विभिन्न स्रोतों से प्राप्त डेटा को एकीकृत करने के लिए किया जाता है। इससे सेंसर से लेकर लक्ष्य पर हमले तक की प्रक्रिया को प्रभावी बनाने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि सैन्य प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाले संवेदनशील डेटा को देखते हुए भारत के लिए अपनी AI लेयर विकसित करना जरूरी है।
AI मिशन के साथ मिलकर विकसित की जाएगी तकनीक
राजेश कुमार सिंह के अनुसार, रक्षा क्षेत्र के लिए जरूरी कंप्यूटिंग क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय संसाधनों को जुटाया जा रहा है। इस प्रक्रिया में कुछ निजी कंपनियों को भी शामिल किया जाएगा। उन्होंने बताया कि सरकार का AI मिशन के साथ मिलकर काम करने का इरादा है, ताकि मिशन द्वारा पहले से चुनी गई निजी कंपनियों की मदद से सशस्त्र बलों के लिए स्वदेशी AI लेयर तैयार की जा सके।
रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता पर जोर
रक्षा सचिव ने कहा कि महत्वपूर्ण सैन्य प्रणालियों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय तकनीकी आत्मनिर्भरता सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस तरह की संवेदनशील तकनीक के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना उचित नहीं होगा। भारत जहां तक संभव हो, इन तकनीकों को घरेलू स्तर पर विकसित करना चाहता है। हालांकि, उन्होंने भरोसेमंद मित्र देशों के साथ चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय सहयोग की संभावना से भी इनकार नहीं किया।
IACCS से मजबूत हो रहा भारत का हवाई सुरक्षा तंत्र
राजेश कुमार सिंह ने बताया कि भारत ने अपने एयरस्पेस कंट्रोल आर्किटेक्चर को नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) देश के हवाई सुरक्षा ढांचे के लिए एक एकीकृत डिजिटल आधार के रूप में काम करता है। इसमें रडार, जमीन पर मौजूद सिस्टम, हवाई प्लेटफॉर्म और एयर डिफेंस सिस्टम आपस में जुड़े हैं।
रक्षा सचिव ने कहा कि प्रधानमंत्री की ओर से भारत के लिए ‘आयरन डोम’ जैसी बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की परिकल्पना के संदर्भ में इसी तरह के एकीकृत तंत्र की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक, भारत इस दिशा में शुरुआती कदम उठा चुका है और नेटवर्क आधारित हवाई सुरक्षा प्रणाली को मजबूत किया जा रहा है।
ड्रोन के खिलाफ आधुनिक बनाई जा रहीं पुरानी एयर डिफेंस गन
रक्षा सचिव ने कहा कि रक्षा क्षेत्र के आधुनिकीकरण में पुराने हार्डवेयर को हटाकर अत्याधुनिक प्रणालियां शामिल करना महत्वपूर्ण है। हालांकि, पुराने उपकरणों की कुछ क्षमताएं भी ड्रोन युद्ध के दौर में उपयोगी साबित हो रही हैं। उन्होंने बताया कि रडार से लैस पुरानी एयर डिफेंस गन को आधुनिक बनाकर नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है, ताकि ड्रोन जैसे खतरों से निपटने में उनका इस्तेमाल किया जा सके।
उन्होंने कहा कि ड्रोन को निशाना बनाने के लिए ऐसी तोपों का इस्तेमाल मिसाइलों की तुलना में काफी सस्ता पड़ सकता है। एक मिसाइल की कीमत 5 से 10 करोड़ रुपये तक हो सकती है। ऐसे में आधुनिक तकनीक से लैस पुरानी एयर डिफेंस गन असमान युद्ध की परिस्थितियों में प्रभावी विकल्प बन सकती हैं।
कामिकेज़ ड्रोन से बढ़ी महंगे सैन्य उपकरणों के सामने चुनौती
राजेश कुमार सिंह ने कहा कि कम लागत वाले और बड़ी संख्या में इस्तेमाल किए जाने वाले कामिकेज़ ड्रोन महंगे सैन्य उपकरणों के लिए गंभीर चुनौती बन गए हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे ड्रोन और अन्य कम लागत वाले हथियार बैलिस्टिक मिसाइलों की तुलना में काफी सस्ते होते हैं। इससे सैन्य संसाधनों के इस्तेमाल और रक्षा खर्च के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण हो गया है।
बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन बढ़ाने की तैयारी
रक्षा सचिव ने स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन बड़े पैमाने पर बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उत्पादन का स्तर बढ़ने से प्रति यूनिट लागत कम करने में मदद मिल सकती है। हाल के वैश्विक संघर्षों से मिले सबक का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि मिसाइल उत्पादन क्षमता बढ़ाना रक्षा तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि DRDO के चेयरमैन के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने पारंपरिक मिसाइल तकनीकों को व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाए। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीकों को सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराया गया है, जिससे इनके उत्पादन में घरेलू उद्योग की भागीदारी बढ़ सके।
करीब 17 कंपनियां मिसाइल तकनीक हस्तांतरण की प्रक्रिया में
राजेश कुमार सिंह ने बताया कि भारत में लगभग 17 बड़ी निजी और कुछ सरकारी कंपनियां विभिन्न प्रकार की पारंपरिक मिसाइलों के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण प्रस्ताव (POTs) ले चुकी हैं या इस प्रक्रिया में हैं। इसका उद्देश्य घरेलू स्तर पर मिसाइल उत्पादन की क्षमता बढ़ाना और भविष्य की जरूरतों के लिए औद्योगिक ढांचे को तैयार करना है।
उन्होंने कहा कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन और पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों की जितनी बड़ी संख्या में जरूरत हो सकती है, वह पहले के अनुमानों से कहीं अधिक है। इसलिए अतिरिक्त उत्पादन क्षमता विकसित करना जरूरी है। रक्षा सचिव के मुताबिक, इससे देश की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में भी मदद मिलेगी। (Source: ANI)