प्रदूषण से जंग: केवल मौसमी नहीं, सालभर की नीति बनाए भारत; FICCI-EY रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
नई दिल्ली। भारत को वायु प्रदूषण के खिलाफ मौसमी और तात्कालिक कदमों से आगे बढ़कर स्वास्थ्य-केंद्रित एक स्थायी रणनीति अपनानी होगी। गुरुवार को जारी FICCI और EY की संयुक्त रिपोर्ट 'क्लीन एयर, हेल्दी इंडिया' में यह सिफारिश की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इसके लिए 'नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम' (NCAP) में सूक्ष्म कणों (PM2.5) को कम करने के स्पष्ट और बाध्यकारी लक्ष्यों को सीधे शामिल किया जाना बेहद जरूरी है।
2023 में प्रदूषण से 20 लाख से ज्यादा मौतें
रिपोर्ट ने देश में जारी स्वास्थ्य आपातकाल की ओर इशारा करते हुए गंभीर आंकड़े सामने रखे हैं। अकेले 2023 में भारत में वायु प्रदूषण के कारण 20 लाख (2 मिलियन) से अधिक लोगों की जान चली गई।
सूक्ष्म कण (PM2.5) फेफड़ों और रक्तप्रवाह में गहराई तक समा जाते हैं। यह स्थिति पुरानी सांस की बीमारियों, हृदय रोग, स्ट्रोक और मानसिक क्षमता में कमी का कारण बनती है। इसके चलते परिवारों पर इलाज का आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है।
कामकाज की संख्या नहीं, स्वास्थ्य नतीजे हों सफलता का पैमाना
अध्ययन में एक बड़े नीतिगत बदलाव की वकालत की गई है। इसके तहत सरकार, स्वास्थ्य संस्थानों और निजी क्षेत्र को एक साथ मिलकर काम करने का सुझाव दिया गया है।
अब स्वच्छ हवा की सफलता को केवल लागू किए गए कागजी उपायों से नहीं मापा जाएगा। इसका असली पैमाना लोगों के स्वास्थ्य में सुधार और प्रदूषण के असर में कमी होना चाहिए।
ज़हरीली हवा से निपटने के लिए 10 व्यावहारिक उपाय
रिपोर्ट में शहरी, औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में ज़हरीली हवा को काबू करने के लिए 10 ठोस समाधान सुझाए गए हैं:
- निर्माण स्थलों पर नियंत्रण: बड़े निर्माण और विध्वंस स्थलों पर 'क्लोज्ड-लूप डस्ट मैनेजमेंट' लागू हो, ताकि स्थानीय स्तर पर PM2.5 और PM10 का उत्सर्जन रोका जा सके।
- हॉटस्पॉट की रीयल-टाइम पहचान: शहरों के भीतर मॉनिटरिंग नेटवर्क बिछाए जाएं। इससे ट्रैफिक, कचरा जलाने और औद्योगिक क्लस्टर से होने वाले प्रदूषण की तुरंत पहचान होगी।
- स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम: बड़े शहरों में स्मार्ट सिग्नल लगाए जाएं, ताकि गाड़ियों का बेवजह आइडलिंग टाइम और ट्रैफिक जाम कम हो सके।
- औद्योगिक उत्सर्जन का लाइव मार्केट: स्टैक-इमिशन के लाइव डेटा के आधार पर औद्योगिक प्रदूषण बाजार चलाया जाए और जहरीले धुएं की डिजिटल निगरानी हो।
- स्वच्छ तकनीक अपनाना: भारी डीजल जनरेटरों की जगह बैटरी-हाइब्रिड सिस्टम लाए जाएं और पारंपरिक ईंट भट्ठों को 'जिग-जैग' तकनीक में बदला जाए।
- कृषि अवशेषों का व्यावसायिक इस्तेमाल: पराली और फसल अवशेषों को बाजार योग्य ईंधन तथा औद्योगिक उत्पादों में बदलने की तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू किया जाए।
- कचरे से निर्माण सामग्री: प्लास्टिक कचरे, निर्माण मलबे और औद्योगिक अवशेषों को रिसाइकिल करके आवास और बुनियादी ढांचे के लिए सामग्री बनाई जाए।
- ग्रीन प्रोजेक्ट्स की फंडिंग: छोटे स्तर की पर्यावरण परियोजनाओं को एक साथ जोड़कर बड़े संस्थागत और निजी निवेश आकर्षित किए जाएं।
- स्पष्ट नियम व अनुपालन: सरकार उद्योगों के लिए पारदर्शी मानक तय करे, जिससे सेक्टर में नवाचार और दक्षता को बढ़ावा मिले।
- मौसमी तैयारी व अस्पताल निगरानी: सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने से पहले अस्पतालों में स्वास्थ्य निगरानी मजबूत की जाए, पब्लिक एडवाइजरी जारी हो और स्कूलों के लिए सुरक्षा प्लान बने।
विशेषज्ञों ने दिए कड़े सुझाव
"स्वच्छ हवा को भारत के स्वास्थ्य सेवा एजेंडे के केंद्र में होना चाहिए, न कि इसे केवल पर्यावरण से जुड़ा एक लक्ष्य माना जाए। स्वास्थ्य संस्थानों को जन जागरूकता बढ़ाने, बीमारियों की ट्रैकिंग और तैयारियों को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभानी होगी।" - डॉ. आशुतोष रघुवंशी, अध्यक्ष, FICCI हेल्थ सर्विसेज कमिटी एवं MD व CEO, फोर्टिस हेल्थकेयर
"हमें मौसमी प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर प्रदूषण के असर को कम करने को सालभर की जन-स्वास्थ्य प्राथमिकता बनाना होगा। इसके लिए वायु गुणवत्ता निगरानी को हेल्थ सर्विलांस से जोड़ना और स्थानीय प्रदूषण स्रोतों के हिसाब से कदम उठाना अनिवार्य है।" - डॉ. अरुण अग्रवाल, अध्यक्ष, FICCI वायु प्रदूषण वर्किंग ग्रुप एवं मेडिकल एडवाइजर, अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप
"भारत के स्वच्छ हवा एजेंडे को सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य नतीजों से जोड़ा जाना चाहिए। NCAP में PM2.5 को कम करने के स्पष्ट लक्ष्य हों, जिन्हें सटीक निगरानी, क्षेत्रीय समन्वय और किफायती स्वच्छ विकल्पों में निवेश का समर्थन मिले।" - अमित गोयल, पार्टनर (स्ट्रेटेजी एंड ट्रांजैक्शंस), EY इंडिया
प्रशासनिक सीमाओं से परे है प्रदूषण का संकट
रिपोर्ट में इस तथ्य को रेखांकित किया गया है कि दिल्ली के जहरीले PM2.5 में उसके अपने स्थानीय स्रोतों का योगदान सर्दियों में केवल 36% और गर्मियों में 26% होता है। यह स्पष्ट करता है कि हवा का प्रदूषण किसी जिले या राज्य की प्रशासनिक सीमाओं में नहीं बंधता।
NCAP की मौजूदा कमियों—जैसे मोटे PM10 आंकड़ों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता, छोटे कस्बों में मॉनिटरिंग का अभाव और ढीला प्रवर्तन—को दूर करने के लिए रिपोर्ट में राज्यों के बीच साझा 'एयरशेड मैनेजमेंट', व्यापक PM2.5 ट्रैकिंग और नतीजों पर आधारित फंडिंग मॉडल की पुरजोर सिफारिश की गई है।
यह भी पढ़ें: दिल्ली की हवा हुई जहरीली, AQI 482 पर पहुंचा; कई इलाकों में प्रदूषण गंभीर