झीरम घाटी नरसंहार: NIA कोर्ट ने 10 दोषियों को सुनाई फांसी की सजा, 27 लोगों की हुई थी मौत
जगदलपुर (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास के सबसे भीषण और खौफनाक नक्सली हमले 'झीरम घाटी नरसंहार' मामले में अदालत का ऐतिहासिक फैसला आ गया है। जगदलपुर स्थित विशेष एनआईए (NIA) अदालत ने बुधवार को मामले के सभी 10 दोषियों को मृत्युदंड (फांसी की सजा) की सजा सुनाई है। साल 2013 में कांग्रेस की 'परिवर्तन यात्रा' पर हुए इस सुनियोजित आतंकी हमले में राज्य के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व और सुरक्षाकर्मियों समेत 27 लोगों की जान चली गई थी।
25 मई 2013 को माओवादियों ने किया था हमला
अदालत ने इससे पहले 5 सितंबर को सभी 10 आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा की अवधि पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। NIA कोर्ट ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC), आर्म्स एक्ट, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की विभिन्न कठोर धाराओं के तहत दोषी पाया है। यह मामला 25 मई 2013 का है, जब प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के सशस्त्र कैडरों ने छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के दरभा स्थित झीरम घाटी में कांग्रेस पार्टी की 'परिवर्तन यात्रा' के काफिले को निशाना बनाया था।
माओवादियों ने किए थे गोलीबारी और ग्रेनेड धमाके
एनआईए की प्रेस रिलीज के अनुसार, माओवादियों ने आईईडी (IED) ब्लास्ट, अंधाधुंध गोलीबारी और ग्रेनेड धमाके किए थे। इस बर्बर हमले में 24 निर्दोष नागरिकों और पुलिसकर्मियों की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि 35 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। इलाज के दौरान तीन अन्य घायलों ने दम तोड़ दिया था, जिससे मृतकों की कुल संख्या 27 हो गई थी। हमले के बाद नक्सली मृतकों और घायलों से हथियार, गोला-बारूद, वॉकी-टॉकी सेट और मोबाइल फोन लूटकर फरार हो गए थे।
NIA की लंबी जांच और 39 आरोपियों पर शिकंजा
मामले की जांच करते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने 25 सितंबर 2014 को 9 आरोपियों के खिलाफ पहली चार्जशीट दाखिल की थी। इसके बाद 28 सितंबर 2015 को 30 अन्य आरोपियों के खिलाफ पूरक (सप्लीमेंट्री) चार्जशीट पेश की गई। इस तरह कुल 39 आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। शुरुआती सुनवाई के दौरान 101 अभियोजन गवाहों के बयान दर्ज किए गए। मुकदमे के दौरान एक गिरफ्तार आरोपी की न्यायिक हिरासत में ही मौत हो गई थी। एनआईए की जांच में यह स्थापित हुआ कि प्रतिबंधित आतंकी संगठन सीपीआई (माओवादी) के सशस्त्र कैडरों ने अपनी रणनीति (TCOC - टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन) के तहत स्थानीय कमेटियों के साथ मिलकर आपराधिक षड्यंत्र रचा था। इनका मुख्य मकसद परिवर्तन यात्रा में शामिल वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं और सुरक्षा बलों को खत्म करना था।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बताया न्याय की जीत
अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा कि 10 दोषियों को मिली मृत्युदंड की सजा न्याय की जीत है। मुख्यमंत्री ने लिखा, "झीरम घाटी का बर्बर नरसंहार छत्तीसगढ़ के इतिहास का एक अत्यंत पीड़ादायक अध्याय है, जिसकी दर्दनाक यादें हमें लंबे समय तक सालती रहेंगी। इस जघन्य हिंसा में हमने प्रदेश के शीर्ष नेताओं, सुरक्षाकर्मियों और आम नागरिकों को खोया था। जगदलपुर एनआईए कोर्ट द्वारा मामले में दोषी पाए गए दस माओवादियों को दी गई फांसी की सजा न्याय की जीत है।"
केंद्र के मजबूत नेतृत्व से बस्तर में लौट रही शांति
मुख्यमंत्री ने एनआईए की जांच की सराहना करते हुए केंद्र सरकार के प्रयासों को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा, "आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दृढ संकल्प और मजबूत नेतृत्व में हमने राज्य को सशस्त्र माओवाद के चंगुल से मुक्त कराया है। दशकों तक माओवादी हिंसा झेलने वाला बस्तर अब शांति, विश्वास और विकास के नए युग की ओर बढ़ रहा है।"
आतंकवाद को वैचारिक संरक्षण देने वालों पर तंज
राजनीतिक और वैचारिक संरक्षण देने वालों पर प्रहार करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, "यह क्षण आत्मनिरीक्षण का भी अवसर है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो आदिवासी समाज की लाशों पर राजनीति करते हैं और आतंकवाद को बौद्धिक व वैचारिक संरक्षण प्रदान करते हैं। बौद्धिक नक्सलियों को भी यह समझना चाहिए कि निहित स्वार्थों के लिए किसी भी आतंकवाद को शरण देना अंततः सभी के लिए विनाश का कारण बनता है। भारतीय लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ लड़ने वाला आतंकवाद का भस्मासुर किसी विचारधारा या क्षेत्र की सीमाओं का सम्मान नहीं करता।" (भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)
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