जस्टिस अभय एस. ओका बोले—लंबित नियुक्तियों पर सरकार से सवाल पूछे कॉलेजियम
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओका ने मंगलवार को कहा कि जब उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिशें महीनों तक लंबित रहती हैं, तो कॉलेजियम को सरकार से सवाल पूछना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की जवाबदेही के विषय पर बोलते हुए, जस्टिस ओका ने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली अपने आप में कोई समस्या नहीं है और इसे तब तक काम करते रहना चाहिए जब तक कि इसकी जगह लेने के लिए कोई बेहतर प्रणाली नहीं आ जाती। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम के शीर्ष पर बैठे लोग इसे ठीक से लागू नहीं कर सकते हैं और कभी-कभी गलतियां इसके शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों की वजह से हो सकती हैं, लेकिन इससे प्रणाली अपने आप में खराब नहीं हो जाती।
30-40 सिफारिशों की एक श्रृंखला तीन महीने में मंजूर
उन्होंने कहा, "मैं कॉलेजियम प्रणाली में दृढ़ विश्वास रखता हूं। हो सकता है कि मामलों के शीर्ष पर कुछ ऐसे व्यक्ति हों जो इसे ठीक से लागू न करें, लेकिन इससे प्रणाली खराब नहीं होती।" जस्टिस ओका ने कहा, "कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिशें महीनों तक लंबित रहती हैं। पिछले साल, हाईकोर्ट की 30-40 सिफारिशों की एक श्रृंखला तीन महीने में मंजूर कर ली गई थी। वह एक अपवाद था। कॉलेजियम को सरकार से सवाल पूछने चाहिए।" उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर केवल विस्तृत कॉलेजियम प्रस्ताव प्रकाशित करने मात्र से पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि पारदर्शिता कॉलेजियम की प्रक्रिया और कार्यप्रणाली में होनी चाहिए।
न्यायाधीशों की जवाबदेही कार्यालय की शपथ से
उन्होंने कहा, "वेबसाइट पर विस्तृत प्रस्ताव प्रकाशित करने से सिस्टम में पारदर्शिता नहीं आती। पारदर्शिता कॉलेजियम में अपनाई जाने वाली कार्यप्रणाली और प्रक्रिया में होनी चाहिए।" जस्टिस ओका ने कहा कि न्यायाधीशों की जवाबदेही उस शपथ से शुरू होती है जो वे अपने न्यायिक फैसलों में देश के संविधान और कानूनों को बनाए रखने के लिए लेते हैं। उन्होंने कहा, "न्यायाधीशों की जवाबदेही सबसे पहले कार्यालय की शपथ से आती है, जो भारत के कानूनों और संविधान को बनाए रखने के लिए होती है। इसलिए सबसे पहले वे भारत के संविधान के प्रति जवाबदेह हैं।"
न्यायाधीशों की जवाबदेही में कई पहलू शामिल
उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की जवाबदेही में कई पहलू शामिल हैं, जिनमें न्यायिक निर्णय, रोस्टर, कॉलेजियम के माध्यम से की गई नियुक्तियां और सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें शामिल हैं। उन्होंने कहा, "अदालत के सामने आने वाले उन वादकारियों से समझौता किए बिना जवाबदेही के हर आयाम को मजबूत किया जाना चाहिए, जो समय पर न्याय चाहते हैं।"
वादकारियों और वकीलों में अनिश्चितता
जस्टिस ओका ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को अपने रोस्टर सिस्टम और प्रशासनिक कामकाज की भी जांच करने की जरूरत है ताकि वह वादकारियों के प्रति अधिक जवाबदेह बन सके। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट और सरल रोस्टर के अभाव से वादकारियों और वकीलों में अनिश्चितता बनी रहती है कि उनके मामलों की सुनवाई कौन सी बेंच करेगी। उन्होंने कहा, "कुछ हाईकोर्ट में रोस्टर इतना जटिल है कि एक ही बेंच को अलग-अलग मामले सौंप दिए जाते हैं। इसलिए रोस्टर को एक सरल तरीके से तय किया जाना चाहिए ताकि वकील और वादकारिए इसे समझ सकें।"
सुनवाई के लिए बेंच तय करने में ऑटो-डेटिंग प्रणाली की कमी
सुप्रीम कोर्ट के विषय-वार रोस्टर का हवाला देते हुए, जस्टिस ओका ने मामलों की सुनवाई के लिए बेंच तय करने में ऑटो-डेटिंग प्रणाली की कमी की आलोचना की, जैसा कि अधिकांश मामलों में होता है। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत में एक ही प्रकार की कई श्रेणियां के मामले कई बेंचों को सौंपे जा सकते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि कौन तय करता है कि कोई विशेष मामला किस बेंच के समक्ष सूचीबद्ध होगा। उन्होंने कहा, "एक वादकारी के लिए यह मुद्दा बन जाता है कि उनका मामला किस बेंच के समक्ष सूचीबद्ध होने जा रहा है। मुख्य सवाल यह उठता है कि यदि एक ही प्रकार के मामले चार या पांच बेंचों को सौंपे जाते हैं, तो यह कौन तय करता है कि एक (विशेष) मामला किस बेंच के समक्ष सूचीबद्ध होने वाला है? क्या यह सीजेआई हैं या कोई और?"
डॉ. बी.आर. अंबेडकर की हीरो-वर्शिपिंग के खिलाफ चेतावनी
जस्टिस ओका ने पहले की तरह और अन्य अवसरों पर अपने और अन्य न्यायाधीशों द्वारा कही गई बात को दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट "बहुत अधिक सीजेआई-केंद्रित" था और यदि वह हाईकोर्ट के समान एक उचित रोस्टर प्रणाली अपनाता है, जिसमें मानवीय हस्तक्षेप को दूर रखा जाए, तो यह वादकारियों के प्रति अधिक जवाबदेह हो जाएगा। उन्होंने इस संदर्भ में डॉ. बी.आर. अंबेडकर की व्यक्ति-पूजा (हीरो-वर्शिपिंग) के खिलाफ चेतावनी का भी हवाला दिया, और कहा कि प्रशासनिक शक्तियों का अत्यधिक संकेंद्रण चीफ जस्टिस के कार्यालय के आसपास ऐसी संस्कृति को बढ़ावा दे सकता है।
न्यायाधीशों को संख्या घटाकर 40-50 करने की आवश्यकता
कॉज लिस्ट (उन मामलों की सूची जिनकी सुनवाई अदालतों द्वारा की जानी है) पर, जस्टिस ओका ने कहा कि यह अदालत की है, न कि चीफ जस्टिस या रजिस्ट्री की। उन्होंने कहा, "यदि कोई तारीख दी जाती है और मामला सूचीबद्ध होता है, और यदि वह सुनवाई तक नहीं पहुँच पाता है, तो वादकारी को दूसरी तारीख मिलनी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि वादकारी बिना तारीख के रह जाए।" उन्होंने कॉज लिस्ट में भारी कटौती करने की प्रथा पर भी सवाल उठाया, और कहा कि यदि 100 मामले सूचीबद्ध हैं, तो न्यायाधीशों को संख्या घटाकर 40-50 करने की आवश्यकता हो सकती है, जिससे रजिस्ट्री को यह तय करने के लिए छोड़ दिया जाता है कि किन मामलों को लिया जाए। उन्होंने कहा, "कॉज लिस्ट में कटौती करके, न्यायाधीश रजिस्ट्री के हाथों की कठपुतली बन जाते हैं," और उन्होंने राजस्थान और बॉम्बे हाईकोर्ट में अपनाए जाने वाले इस सिद्धांत का हवाला दिया कि कॉज लिस्ट अदालत की होती है।
फैसलों की आलोचना उनकी कानूनी शुद्धता के आधार पर की जाए
जस्टिस ओका ने कहा कि जवाबदेही की बहस में इस बात को भी शामिल किया जाना चाहिए कि फैसलों पर कैसे चर्चा की जाती है और उनकी आलोचना कैसे की जाती है। उन्होंने कहा कि फैसलों की आलोचना उनकी कानूनी शुद्धता के आधार पर की जानी चाहिए, न कि इस आधार पर कि वे सरकार या किसी अन्य पक्ष के पक्ष में हैं या नहीं। उन्होंने कहा, "फैसलों की आलोचना उनकी कानूनी शुद्धता या अशुद्धता के लिए की जानी चाहिए, न कि इस आधार पर कि यह सरकार समर्थक था या नहीं।" उन्होंने कहा कि आलोचकों को यह समझाना चाहिए कि कोई फैसला कानूनी रूप से कहां गलत हुआ है, बजाय इसके कि वे न्यायाधीशों पर मंशा का आरोप लगाएं। उन्होंने कहा, "फैसलों की रचनात्मक आलोचना - यह कहने के लिए नहीं कि 'मैं सहमत नहीं हूँ', बल्कि यह कहने के लिए कि फैसला कानूनी रूप से कहाँ गलत हुआ है।" उन्होंने कहा, "फैसलों पर रचनात्मक बहस होनी चाहिए। यदि कोई फैसला सरकार के पक्ष में है, तो उस पर मंशा का आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए।"
स्वाभाविक रूप से एक पक्ष रहता है न्यायिक निर्णय से असंतुष्ट
उन्होंने कहा कि अदालतों को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों पर निष्पक्ष चर्चा को प्रोत्साहित करना चाहिए, यह रेखांकित करते हुए कि एक प्रतिकूल न्यायिक प्रणाली (एडवरसैरियल सिस्टम) स्वाभाविक रूप से एक पक्ष को न्यायिक निर्णय से असंतुष्ट छोड़ देती है। उन्होंने कहा, "हमारे पास एक प्रतिकूल प्रणाली है। एक पक्ष हमेशा फैसले से असंतुष्ट रहता है। हम यह नहीं देख सकते कि न्यायाधीश लगातार शिकायतों के अधीन रहें।"
न्यायाधीश के रूप में अपने स्वयं के अनुभव का दिया हवाला
जस्टिस ओका ने हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में अपने स्वयं के अनुभव का भी हवाला दिया, और कहा कि जो न्यायाधीश बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा करते हैं और कड़े फैसले लेते हैं, उन्हें भी शिकायतों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने एक ऐसे उदाहरण को याद किया जब एक हाईकोर्ट के जज के रूप में उनके खिलाफ एक शिकायत भारत के राष्ट्रपति तक पहुँच गई थी। उन्होंने कहा, "एक मामले में, किसी ने राष्ट्रपति से शिकायत की। भारत के राष्ट्रपति ने हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ जांच के आदेश दिए। वह मैं खुद था।"
निचली अदालतों के लिए लोअर कोर्ट शब्द का इस्तेमाल न हो
जस्टिस ओका ने कहा कि जवाबदेही न्यायिक प्रणाली के निचले स्तर तक भी फैलनी चाहिए, साथ ही इस बात पर जोर दिया कि जिला और निचली अदालतों के लिए लोअर कोर्ट शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "जवाबदेही का एक अन्य पहलू सेमिनार और चर्चाएं हैं। हम हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की जवाबदेही पर चर्चा करते हैं। शायद ही कभी हम ट्रायल कोर्ट और जिला अदालतों पर चर्चा करते हैं।" उन्होंने कहा, "किसी भी अदालत को निचली अदालत (लोअर कोर्ट) नहीं कहा जाना चाहिए।" उन्होंने कहा कि जिला न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही की जांच करने की आवश्यकता है क्योंकि वहां के न्यायाधीश दशकों तक आम नागरिकों के मामलों को संभालते हैं।
जिला अदालतों के न्यायाधीशों का तबादला हर तीन-चार साल में
जस्टिस ओका ने राज्यों के भीतर न्यायिक अधिकारियों के लगातार तबादलों पर भी चिंता जताई और कहा कि ट्रायल और जिला अदालतों के न्यायाधीशों का तबादला हर तीन-चार साल में और कुछ मामलों में कुछ महीनों के भीतर हो सकता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक अधिकारियों के लिए एक तर्कसंगत और समान स्थानांतरण नीति के लिए पैरामीटर तय करने चाहिए।
न्यायाधीश ट्रायल कोर्ट में जमीनी हकीकत नहीं जान सकते
जस्टिस ओका ने निचली अदालतों द्वारा जमीनी हकीकत पर विचार किए बिना मामलों के समयबद्ध निस्तारण का निर्देश देने वाली उच्च न्यायालयों की प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने कहा, "उच्च न्यायालयों को निचली अदालतों से मामलों के समयबद्ध निस्तारण का निर्देश नहीं देना चाहिए।" उन्होंने कहा कि उच्च अदालतों के न्यायाधीश ट्रायल कोर्ट में जमीनी हकीकत नहीं जान सकते हैं, जिसमें इसके समक्ष लंबित पुराने मामलों की संख्या भी शामिल है। उन्होंने कहा, "वहाँ बहुत पुराने मामले लंबित हो सकते हैं। कई योग्य वादकारी छूट जाते हैं क्योंकि कुछ वादकारी उच्च न्यायालय तक पहुँचने और अपने मामले को तेजी से निपटाने के लिए अनुकूल आदेश प्राप्त करने का खर्च उठाने में सक्षम होते हैं।"
अंधाधुंध निर्देशों के बजाय विस्तृत विचार-विमर्श की आवश्यकता
जस्टिस ओका ने यह भी सवाल उठाया कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष किस श्रेणी के मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायपालिका को इस संबंध में एक समान दिशा-निर्देश तय करने चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर उच्च न्यायालयों के अंधाधुंध निर्देशों के बजाय विस्तृत विचार-विमर्श की आवश्यकता है। उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत में एक हल्की-फुल्की बात का भी जिक्र किया, और कहा कि वे हवाई अड्डे पर एक व्यक्ति से मिले थे जिसने उनसे कहा था कि लोग आज के कार्यक्रम में उनके भाषण से पटाखों (फायरवर्क्स) की उम्मीद कर रहे थे। जस्टिस ओका ने स्पष्ट किया कि उनसे "पटाखे फोड़ने" की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि यह उनके द्वारा 2024 में दिया गया फैसला था जिसने पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले पटाखों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की जवाबदेही पर भाषण
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश कैंपेन फॉर जुडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (CJAR) द्वारा आयोजित "सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की जवाबदेही" विषय पर एक पैनल चर्चा में मुख्य भाषण दे रहे थे। इस पैनल में सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रेखा शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार मनीष छिब्बर, एडवोकेट प्रशांत भूषण, एडवोकेट और CJAR कार्यकारी सदस्य इंदिरा उन्नीनयार, CJAR सह-संयोजक आलोक प्रसन्ना और कार्यकारी सदस्य अंजलि भारद्वाज भी शामिल थे।
(इनपुटः ANI)
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