विभाजन के दौरान पलायन करने वाले लोग 'विस्थापित' थे, 'शरणार्थी' नहींः मोहन भागवत
नागपुर,(महाराष्ट्र)। आरएसएस प्रमुख मोहन भगवत ने कहा,"विभाजन के दौरान पीढ़ियों की संपत्ति, व्यवसाय और कृषि भूमि छोड़कर भारत आने वाले लोगों को शरणार्थी नहीं बल्कि विस्थापित व्यक्ति कहा जाना चाहिए।" उन्होंने कहा, कि वे "संघर्षरत योद्धा" थे, जिन्होंने भौतिक संपदा के बजाय अपनी मातृभूमि और धर्म को चुना। नागपुर में सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के 75वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख भागवत ने कहा, कि विभाजन के बाद भारत आने वालों के लिए "शरणार्थी" शब्द इस्तेमाल करना गलत है।
लोग शरणार्थी नहीं बल्कि विस्थापित
भागवत ने कहा, कि विभाजन के समय लोग अपनी पीढ़ियों की जमा-पूंजी, व्यापार और कृषि भूमि छोड़कर भारत आए थे। उनके अनुसार, वे लोग शरणार्थी नहीं बल्कि विस्थापित थे, जिन्होंने अपनी मातृभूमि और धर्म के प्रति आस्था के कारण यह रास्ता चुना। उन्होंने आगे कहा, कि उन परिवारों ने धन या करियर को प्राथमिकता नहीं दी, बल्कि राष्ट्र और अपने धर्म को सर्वोपरि रखा। भागवत के मुताबिक, समय के साथ परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन मूल्य हमेशा स्थिर रहते हैं। उन्होंने यह भी टिप्पणी की, कि राजनीति में अक्सर सफलता के साथ ईर्ष्या जुड़ जाती है। उनके अनुसार, जब कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है, तो कुछ लोग स्वाभाविक रूप से उससे ईर्ष्या करने लगते हैं।
कई लोग बिना औपचारिक शिक्षा के भी सफल
शिक्षा पर बोलते हुए, भागवत ने कहा, कि रोजगार पाने में मदद करने वाली शिक्षा जरूरी है, लेकिन सफलता की गारंटी नहीं है। उन्होंने कहा, कि कई लोग बिना औपचारिक शिक्षा के भी सफल हुए हैं और आगे चलकर उन्होंने उच्च शिक्षित लोगों को रोजगार भी दिया है। उनके अनुसार, शिक्षा का असली उद्देश्य ज्ञान और मूल्यों का विकास करना है, जिसकी नींव घर से ही पड़ती है। उन्होंने लोगों से कठिन परिस्थितियों में धैर्य और दृढ़ता बनाए रखने की अपील की और कहा, कि किसी को भी हालात या भाग्य के सामने हार नहीं माननी चाहिए, बल्कि लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।
भगवद गीता का किया उल्लेख
भगवद गीता का उल्लेख करते हुए, उन्होंने कहा, कि साहस और दृढ़ निश्चय अंततः सफलता दिलाते हैं। उन्होंने यह भी कहा, कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य दूसरों के लिए जीना और केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से अच्छाई को प्रेरित करना है। अपने संबोधन के अंत में आरएसएस प्रमुख ने कहा कि मानव जीवन का सबसे बड़ा संदेश यही होना चाहिए, कि व्यक्ति अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए जिए। हमें ईमानदारी से जीवन जीना चाहिए और दूसरों को भी अपने आचरण से ईमानदारी का मार्ग दिखाना चाहिए। (एएनआई)
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