लंदन में भारतीय उच्चायोग पर हमले का मामला; विशेष एनआईए अदालत ने आरोपी पर तय किए आरोप
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की एक विशेष एनआईए (NIA) अदालत ने मार्च 2023 में लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग (Indian High Commission) पर हुए हिंसक प्रदर्शन और हंगामे के मामले में एक बड़ा कानूनी कदम उठाया है। अदालत ने आरोपी इंदरपाल सिंह गाबा के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए (UAPA) के तहत आरोप तय कर दिए हैं। हालांकि, अदालत ने उन्हें राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम (Prevention of Insults to National Honour Act) के आरोपों से राहत देते हुए बरी कर दिया है।
विशेष न्यायाधीश विकास ढुल का महत्वपूर्ण आदेश
मामले की सुनवाई करते हुए एनआईए के विशेष न्यायाधीश विकास ढुल ने 8 अक्टूबर को यह आदेश पारित किया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड के आधार पर यह मजबूत संदेह पैदा होता है कि आरोपी ने गैरकानूनी गतिविधि में हिस्सा लेने का अपराध किया है। इसी आधार पर अदालत ने यूएपीए की धारा 13(1) के तहत गाबा पर शिकंजा कसा है।
बचाव पक्ष का तीखा रुख, हाईकोर्ट जाने की तैयारी
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की ओर से इस मामले में अधिवक्ता अनिल डबास पेश हुए, जबकि आरोपी इंदरपाल सिंह गाबा की पैरवी कर रहे अधिवक्ता अरुण खत्री ने अदालत में डिस्चार्ज अर्जी दाखिल की थी। आदेश के बाद बचाव पक्ष के वकील अरुण खत्री ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, "हम इस आदेश को उच्च न्यायालय (High Court) में चुनौती देंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि हाईकोर्ट विदेशी धरती पर हुई घटना के लिए एक विदेशी नागरिक के खिलाफ एनआईए द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों का मूल्यांकन कैसे करता है, खासकर मंजूरी (Sanction) के पहलू पर।"
19 मार्च 2023 की वह घटना और खालिस्तानी उपद्रव
यह पूरा मामला 19 मार्च 2023 (रविवार) को भारतीय समयानुसार दोपहर करीब 1:45 बजे का है, जब लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर लगभग 50 से 60 उपद्रवियों की भीड़ जमा हो गई थी। इन प्रदर्शनकारियों के हाथों में खालिस्तानी अलगाववादियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पीले रंग के झंडे थे। आरोप है कि भीड़ में शामिल भारतीय नागरिक अवतार सिंह उर्फ खंडा और गुरचरण सिंह भगवा पगड़ी पहनकर भारत विरोधी और खालिस्तान समर्थक नारे लगाकर भीड़ को उकसा रहे थे। इसी दौरान भीड़ में शामिल एक अन्य व्यक्ति भारतीय ध्वज वाले पोल की बाल्कनी पर चढ़ गया।
तिरंगे का अपमान और उच्चायोग के अधिकारियों पर हमला
एफआईआर के अनुसार, जसवीर सिंह नाम के एक अन्य व्यक्ति ने उपद्रवियों को बाल्कनी तक चढ़ने में मदद की और उसने सम्मान के साथ फहराए गए भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को नीचे खींच लिया। उपद्रवी नीचे से रस्सी खींच रहे थे और तिरंगे को फाड़ने की कोशिश कर रहे थे। बाल्कनी पर चढ़े उपद्रवी को नीचे से पीले रंग का खालिस्तानी झंडा थमाया गया, जिसे उसने लहराया और झंडे के खंभे पर लगाने की कोशिश की। इसके साथ ही आरोपी ने लोहे के पोल (पाइप) से उच्चायोग के सुरक्षा अधिकारियों पर हमला कर दिया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं।
संपत्ति को नुकसान और साजिश के आरोप
भीड़ लगातार खालिस्तान के समर्थन में नारे लगा रही थी और अधिकारियों को नीचे गिराने के लिए उकसा रही थी। इस हंगामे के दौरान उपद्रवियों ने लोहे की छड़ों से भारतीय उच्चायोग की खिड़कियों के शीशे और मुख्य प्रवेश द्वार के दरवाजे तोड़ दिए, जिससे भारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा। इस घटना के संबंध में दिल्ली पुलिस में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसे बाद में एनआईए ने अपने हाथ में लेते हुए दोबारा दर्ज किया और जांच आगे बढ़ाई।
बचाव पक्ष की दलीलें और कानूनी बिंदु
सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील अरुण खत्री ने दलील दी कि चार्जशीट में ऐसे कोई तथ्य या सामग्री नहीं है जो प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ मामला बनाती हो। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत कोई मामला नहीं बनता है, क्योंकि कथित रूप से अपमानित किया गया झंडा कभी जब्त ही नहीं किया गया था। इसके अलावा, आरोपी एक ब्रिटिश नागरिक है और घटना लंदन की है, जबकि उक्त कानून का विस्तार केवल भारत तक है और इसमें कोई अतिरिक्त क्षेत्रीय प्रावधान नहीं है।
यूएपीए के आरोपों पर भी उठाए गए सवाल
यूएपीए की धारा 13(1) के तहत लगाए गए आरोपों पर बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष के गवाह किरण कुमार भोसले द्वारा दर्ज कराई गई शुरुआती एफआईआर में आरोपी का नाम तक नहीं था। वकील ने कहा कि शुरुआती एफआईआर केवल 19 मार्च की घटना से संबंधित थी, जबकि एनआईए खुद यह मानती है कि उस दिन आरोपी मौके पर मौजूद नहीं था। साथ ही, दोनों पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद विशेष अदालत ने यूएपीए के तहत आरोप तय करने का फैसला सुनाया।
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