क्रीमीलेयर की पहचान आर्थिक आधार पर न हो
ओबीसी आरक्षणः सुप्रीम कोर्ट में गोपनीय रिपोर्ट
क्रीमीलेयर की पहचान आर्थिक आधार पर न हो
आरक्षण का उद्देश्य समाजिक व शैक्षणिक पिछड़ापन दूर करना
भोपाल। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सिफारिश की है कि ओबीसी आरक्षण में क्रीमीलेयर की पहचान में आर्थिक आधार को शामिल नहीं किया जाए। यह भी कहा गया कि आरक्षण का उद्देश्य समाजिक और शैक्षणिक कमी को समाप्त करना है।
नियम बताते हैं कि जिनकी वार्षिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है, वे क्रीमीलेयर की श्रेणी में आते हैं। ऐसे लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यह प्रावधान ओबीसी को वास्तविक लाभ नहीं दे रहा है। रिपोर्ट महू स्थित बीआर अम्बेदकर सामाजिक विज्ञान विवि ने तैयार किया है। मालूम हो कि साल 2023 में प्रदेश के 10548ओबीसी लोगों का सर्वे तैयार किया गया। इसमें दस हजार लोगों के उत्तर का आकलन किया गया। रिपोर्ट तैयार करने वाली टीम में 27 प्रोफेसरऔर शोधार्थी थे। यह कार्य उस समय के कुलपति डा. रामदास की अध्यक्षता में हुआ।उस समय रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई।
इस रिपोर्ट में कहा गया कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में 50 प्रतिशत की सीमा हटाने पर विचार हो। शिक्षा और नौकरी में आरक्षण सही है, व्यवहारिक है। रिपोर्ट में इंदिरा साहनी केस की चर्चा करते हुए कहा गया कि सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन अलग है। शिक्षा व रोजगार में मेरिट आधार होता है। वहीं, राजनीति में यह चुनाव और वोट से तय होता है।