840 करोड़ रुपये के DGHS मेडिकल खरीद घोटाले में नीरज चोपड़ा को झटका
नई दिल्ली। राउज एवेन्यू कोर्ट ने 840 करोड़ रुपये के कथित DGHS मेडिकल खरीद घोटाले के मामले में आरोपी नीरज चोपड़ा की जमानत याचिका खारिज कर दी है। उसने इस आधार पर नियमित जमानत मांगी थी कि उसके और दो अन्य लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। नीरज चोपड़ा साल 2022 में सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) में डिप्टी कंट्रोलर अकाउंट्स (DCA) के पद पर थे। अदालत ने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों, अपराध की गंभीरता, उनकी कथित भूमिका और सह-आरोपी राजीव रंगीला को लेकर चल रही जांच का हवाला देते हुए उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया।
एंटी करप्शन ब्रांच ने चार्जशीट दाखिल की
एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) ने पूर्व डायरेक्टर जनरल हेल्थ सर्विसेज (DGHS) वत्सला अग्रवाल, डॉ. विनोद कुमार रंगा और नीरज चोपड़ा के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है। स्पेशल जज (ACB) विद्या प्रकाश ने मामले के समग्र तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद जमानत याचिका खारिज कर दी। इसमें आरोपों की प्रकृति, कथित अपराधों की गंभीरता, दोषी ठहराए जाने की स्थिति में निर्धारित सजा की गंभीरता, उनके खिलाफ अपराध को अंजाम देने में कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए तौर-तरीकों, उनके द्वारा निभाई गई कथित भूमिका और इस तथ्य को ध्यान में रखा गया कि सह-आरोपी राजीव कुमार उर्फ राजीव रंगीला तथा अन्य अज्ञात संस्थाओं, फर्मों और कंपनियों के खिलाफ आगे की जांच अभी जारी है।
आरोपी इस चरण में जमानत की रियायत का हकदार नहीं
स्पेशल जज ने 31 अक्टूबर को अपने आदेश में कहा कि अदालत की यह स्पष्ट राय है कि आरोपी इस चरण में जमानत की रियायत का हकदार नहीं है। परिणामस्वरूप, जमानत याचिका को खारिज किया जाता है और इसका निस्तारण किया जाता है। इस दलील को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि केवल चार्जशीट दाखिल हो जाने मात्र से आरोपी को जमानत पर रिहा करने का अधिकार नहीं मिल जाता है, खासकर जब अपराधों की प्रकृति और गंभीरता, उसे सौंपी गई विशिष्ट भूमिका, जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री, मामले की परिस्थितियों और न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप की संभावना को ध्यान में रखा जाए। जमानत पर सुनवाई के दौरान, आरोपी के वकील ने दलील दी कि सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) द्वारा दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और अस्पताल की आपूर्ति की खरीद में उनकी कोई भूमिका नहीं थी।
जांच के दौरान और चार्जशीट के साथ पर्याप्त साक्ष्य एकत्र
इसके अलावा, बढ़े हुए खरीद दरों से जुड़े आरोप, जो विचाराधीन एफआईआर का मुख्य आधार हैं, उनका आरोपी से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि दरों को तय करने का काम सह-आरोपी व्यक्तियों यानी डॉ. विनोद कुमार रंगा और डॉ. वत्सला अग्रवाल द्वारा किया गया था। वकील ने दलील दी कि इसलिए, इस आरोपी का मामला दोनों सह-आरोपी व्यक्तियों यानी डॉ. विनोद कुमार रंगा और डॉ. वत्सला अग्रवाल के मामले से पूरी तरह अलग है, जिनकी जमानत याचिकाएं इस अदालत द्वारा 17 अक्टूबर, 2026 को खारिज कर दी गई थीं। जमानत याचिका का विरोध करते हुए सीनियर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (SPP) कुमार संजय ने तर्क दिया कि जांच के दौरान और चार्जशीट के साथ पर्याप्त साक्ष्य एकत्र किए गए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि वर्तमान आवेदक/आरोपी ने सह-आरोपी व्यक्तियों तथा अज्ञात संस्थाओं, फर्मों और कंपनियों के साथ मिलीभगत की थी।
बोली प्रक्रिया में कार्टेललाइजेशन को बढ़ावा
इस आपराधिक साजिश के तहत, उसने न केवल सरकारी विभाग के हितों के खिलाफ काम किया, बल्कि बोली प्रक्रिया में कार्टेललाइजेशन को बढ़ावा देकर समाज के सदस्यों के हितों के खिलाफ भी काम किया। इस संबंध में उसने GeM पोर्टल के माध्यम से ई-प्रोक्योरमेंट को अचानक छोड़कर CVC दिशानिर्देशों, वित्त नियमों और निहित नियमों व शर्तों का उल्लंघन किया।
(इनपुटः ANI)
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