गाजियाबाद की चार वर्षीय बच्ची से जुड़े रेप और हत्य

गाजियाबाद रेप-हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, बच्ची को इलाज से इनकार पर अस्पताल और डॉक्टर को लगाई फटकार

SC Slams Hospital Over Denial of Emergency Care to Rape-Murder Victim

नई दिल्ली (भारत)। गाजियाबाद में बलात्कार और हत्या के मामले में चार वर्षीय पीड़िता को आपातकालीन उपचार देने से कथित तौर पर इनकार करने के आरोप में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक निजी अस्पताल और उसके डॉक्टर को कड़ी फटकार लगाई। पीड़िता की बाद में चोटों के कारण मृत्यु हो गई।

डॉक्टर के आचरण को बताया निर्दयी और असंवेदनशील

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की बेंच ने उनके आचरण को निर्दयी, क्रूर और असंवेदनशील बताते हुए डॉक्टर की चिकित्सा नैतिकता पर सवाल उठाया और अस्पताल को चेतावनी दी कि यदि उसके इस आचरण के लिए आर्थिक जुर्माना लगाया गया तो इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा। 

आपातकालीन इलाज न देने पर कोर्ट की नाराजगी

कोर्ट ने अस्पताल का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील से कहा, “यदि आप अपना कर्तव्य नहीं निभाते हैं तो आपको अपने नाम के साथ 'डॉक्टर' लिखने का कोई अधिकार नहीं है। यदि आपमें संवेदनशीलता होती, तो यदि आपके पास सुविधा नहीं होती तो आप बच्ची को दूसरे अस्पताल ले जाते। क्या आपने इसलिए अनदेखी की क्योंकि वह गरीब थी? क्या आप अपनी फीस नहीं दे सकते थे?” कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी स्थिति का सामना करने वाले किसी भी डॉक्टर से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सुनिश्चित करे कि बच्ची को तत्काल चिकित्सा सहायता मिले।

अस्पताल के रवैये पर मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “इतने जघन्य अपराध की शिकार बच्ची को आपके सामने लाया गया और आप इतने निर्दयी हैं कि आपने उसे चिकित्सा सहायता भी नहीं दी। अगर आपमें थोड़ी भी सहानुभूति होती तो आप उसे स्वयं अस्पताल ले जाते।” मुख्य न्यायाधीश ने अस्पताल को उसके आचरण के संभावित परिणामों के बारे में चेतावनी दी।

जुर्माने को लेकर कोर्ट की चेतावनी

न्यायालय ने कहा, “यदि हम जुर्माना लगाते हैं तो इसका भयावह प्रभाव पड़ेगा। आपने अत्यंत क्रूरता से काम लिया है।” न्यायालय की ये टिप्पणियां गाजियाबाद में चार वर्षीय बच्ची के कथित बलात्कार और हत्या के मामले की सुनवाई जारी रखते हुए आईं। न्यायालय ने संकेत दिया है कि वह इस मामले की सुनवाई अगले सप्ताह, अधिमानतः मंगलवार को करेगा।

पुलिस जांच में लापरवाही पर भी फटकार

पिछली सुनवाई में, न्यायालय ने गाजियाबाद पुलिस की प्रारंभिक जांच में पूर्ण उदासीनता और असंवेदनशीलता की कड़ी आलोचना की थी, जिसमें एफआईआर दर्ज करने में देरी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज चोटों के बावजूद शुरू में बलात्कार और पीओसीएसओ के तहत अपराध न करना और कई अन्य जांच एवं चिकित्सा संबंधी चूक शामिल थीं।

अधिकारियों को किया गया था तलब

जांच में स्पष्ट खामियों को उजागर करते हुए, न्यायालय ने गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त और नंदग्राम पुलिस स्टेशन के एसएचओ को घटना का क्रम स्पष्ट करने के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया था।

एफआईआर में देरी और जांच पर सवाल

न्यायालय ने गौर किया कि घटना के एक दिन बाद ही एफआईआर दर्ज की गई थी, जबकि पीड़ित एक चार वर्षीय बच्चा था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए, पीठ ने पाया कि उसमें बच्चे के गुप्तांगों पर चोट के निशान थे, जो किसी कुंद वस्तु से हमले का संकेत देते हैं।

बलात्कार की धाराएं देर से जोड़ने पर आपत्ति

इन निष्कर्षों के बावजूद, पुलिस ने शुरू में मामले की जांच केवल हत्या के मामले के रूप में की, जिस पर न्यायालय  ने टिप्पणी की कि "अभी तक कोई उचित जांच नहीं की गई है" और घटना के संबंध में "गुप्त रवैया" अपनाया गया प्रतीत होता है। न्यायालय ने पिछली सुनवाई के दौरान यह भी सवाल उठाया था कि पुलिस ने शुरू में केवल हत्या और साक्ष्य नष्ट करने से संबंधित अपराधों का ही आरोप क्यों लगाया। न्यायालय ने पाया कि यौन उत्पीड़न के स्पष्ट संकेतों के बावजूद, शुरुआत में पीओसीएसओ अधिनियम या बलात्कार के प्रावधानों के तहत कोई अपराध दर्ज नहीं किया गया था। न्यायालय ने गौर किया कि बलात्कार के आरोप बाद में, अपराध की गंभीरता का पता चलने पर ही जोड़े गए थे।

मेडिकल और फोरेंसिक जांच में मिली खामियां

जांच के अलावा, न्यायालय ने चिकित्सा और फोरेंसिक रिकॉर्ड की भी गहन जांच की। न्यायालय ने पाया कि पंचनामा में यह उल्लेख नहीं किया गया था कि बच्ची के मिलने के समय उसने कोई कपड़े पहने थे या नहीं, जबकि उसके गुप्तांगों से खून बहने की बात दर्ज थी। न्यायालय ने पोस्टमार्टम में भी कमियां पाईं और पाया कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर यौन उत्पीड़न के आरोपों की उचित जांच के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान देने में विफल रहे थे।

परिवार को धमकाने का आरोप

पीड़ित के पिता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने अदालत को बताया कि घटना के बाद परिवार को कथित तौर पर धमकाया गया था। इन दलीलों को दर्ज करते हुए, पीठ ने इस बात पर गौर किया कि याचिकाकर्ता के परिवार के सदस्यों को गलत तरीके से हिरासत में लिया गया, उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें घटना के बारे में चुप रहने के लिए कहा गया, जिससे स्थानीय पुलिस तंत्र पर उनका विश्वास टूट गया।

दो निजी अस्पतालों पर लगे इलाज से इनकार के आरोप

अदालत को यह भी बताया गया कि सरकारी अस्पताल पहुंचने से पहले, गंभीर हालत में होने के बावजूद, दो निजी अस्पतालों ने कथित तौर पर बच्चे को भर्ती करने और आपातकालीन उपचार देने से इनकार कर दिया था।

चिकित्सा सहायता से इनकार का मुद्दा बना केंद्र

मामले का यही पहलू आज की सुनवाई के दौरान प्रमुखता से सामने आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण समय में तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान करने से कथित इनकार के मामले में एक डॉक्टर और निजी अस्पताल के आचरण पर सवाल उठाए। (Source- ANI)

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