EVM Totaliser पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम: बूथवार वोटिंग पैटर्न छिपाने के लिए केंद्र से मांगी व्यवहारिकता रिपोर्ट
नई दिल्ली। EVM से डाले गए वोटों की गिनती के दौरान मतदान केंद्रवार वोटिंग पैटर्न की पहचान रोकने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम कदम उठाया। कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह जांचने को कहा कि क्या चुनाव में Totaliser मशीनों के इस्तेमाल की व्यवस्था लागू की जा सकती है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र से यह भी विचार करने को कहा कि क्या ऐसी व्यवस्था लाई जा सकती है, जिससे किसी व्यक्तिगत मतदान केंद्र के नतीजे अलग से सामने न आएं। इसका उद्देश्य चुनाव के बाद मतदाताओं को धमकी, डराने-धमकाने या प्रताड़ना से बचाने के साथ मतदान की गोपनीयता को मजबूत करना है। पीठ में चीफ जस्टिस सूर्यकांत के अलावा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें EVM से डाले गए वोटों की गिनती के लिए Totaliser मशीनों की शुरुआत की मांग की गई है।
क्या है Totaliser मशीन और क्यों उठी इसकी मांग?
Totaliser ऐसी व्यवस्था है, जिसमें नतीजे घोषित करने से पहले कई EVM से मिले वोटों को एक साथ जोड़कर उनकी गणना की जाती है। इससे किसी एक मतदान केंद्र का अलग-अलग परिणाम सामने नहीं आता और यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि किसी खास बूथ पर मतदाताओं ने किस तरह मतदान किया।
याचिकाकर्ता योगेश गुप्ता की ओर से अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दलील दी कि इस व्यवस्था से चुनाव के बाद मतदाताओं को होने वाली धमकी, डराने-धमकाने और हिंसा से बचाने में मदद मिल सकती है। याचिका का मूल तर्क यही है कि अगर किसी बूथ का मतदान पैटर्न स्पष्ट रूप से सामने नहीं आएगा, तो उस आधार पर मतदाताओं की पहचान कर उन्हें निशाना बनाना कठिन होगा। इस तरह Totaliser व्यवस्था को मतदान की गोपनीयता और मतदाता सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।
चुनाव आयोग ने समर्थन किया, लेकिन बताईं व्यावहारिक दिक्कतें
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू पेश हुए। आयोग ने मतदाता की पहचान और मतदान की गोपनीयता सुरक्षित रखने के उद्देश्य का समर्थन किया, लेकिन Totaliser लागू करने से जुड़ी कई व्यावहारिक और कानूनी चुनौतियों की ओर कोर्ट का ध्यान दिलाया। नायडू ने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में उम्मीदवारों और उनके मतदान एजेंटों को Form 17C की प्रतियां मिलती हैं। इस फॉर्म में प्रत्येक मतदान केंद्र पर पड़े वोटों का रिकॉर्ड दर्ज होता है।
Form 17C में उपलब्ध आंकड़े उम्मीदवारों और उनके पोलिंग एजेंटों को मतगणना के दौरान EVM के नतीजों का मिलान और क्रॉस-चेक करने में मदद करते हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक, अगर कई मतदान केंद्रों के वोटों को एक साथ जोड़कर परिणाम सामने लाया जाता है, तो बूथवार सत्यापन की मौजूदा प्रक्रिया मुश्किल हो सकती है।
VVPAT से मिलान को लेकर भी आयोग की चिंता
चुनाव आयोग ने EVM के नतीजों और VVPAT पर्चियों के मिलान को लेकर भी सवाल उठाया। आयोग ने कहा कि अगर अलग-अलग मतदान केंद्रों के वोटों को एकत्रित कर एक साथ गिना जाता है, तो जरूरत पड़ने पर EVM परिणामों का VVPAT स्लिप्स के साथ मिलान करने की प्रक्रिया में व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं। इस तरह आयोग की आपत्ति Totaliser के मूल उद्देश्य पर नहीं, बल्कि मौजूदा चुनावी सत्यापन व्यवस्था के साथ इसके तालमेल को लेकर सामने आई। खास तौर पर Form 17C के बूथवार रिकॉर्ड और VVPAT सत्यापन की व्यवस्था इसके केंद्र में रही।
पहले भी Totaliser की सिफारिश कर चुका है चुनाव आयोग
सुनवाई में यह भी सामने आया कि चुनाव आयोग पहले Totaliser मशीनों के इस्तेमाल की सिफारिश कर चुका है। हालांकि बाद में सरकार द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के मौजूदा रुख को महत्वपूर्ण माना। चीफ जस्टिस ने संकेत दिया कि आयोग की वर्तमान स्थिति Totaliser की मूल अवधारणा को खारिज करने के बजाय मुख्य रूप से उसके कार्यान्वयन से जुड़ी कठिनाइयों को रेखांकित करती दिखाई देती है। यानी अदालत के सामने बहस का केंद्र यह नहीं रहा कि Totaliser का उद्देश्य उचित है या नहीं, बल्कि यह रहा कि इसे मौजूदा चुनावी प्रक्रिया में किस तरह लागू किया जा सकता है।
अब केंद्र सरकार को क्या करना है?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार को Totaliser मशीनों के जरिए वोटों की गिनती शुरू करने की व्यवहारिकता की जांच करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने केंद्र से यह भी विचार करने को कहा कि क्या इस व्यवस्था को लागू करने के लिए Conduct of Elections Rules में संशोधन किया जा सकता है। इसके साथ ही सरकार को Conduct of Elections Rules के Rule 59A पर भी विचार करने को कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर Law Commission की 255वीं रिपोर्ट में दी गई Totalisation संबंधी सिफारिश को भी ध्यान में रखने का निर्देश दिया है। (भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)
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