सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकर

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को नहीं मिलेगा पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से इस्लाम धर्म अपनाने वाला व्यक्ति 'पिछड़ा वर्ग' (BC) आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की बेंच ने तमिलनाडु सरकार की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी।

कानूनी प्रावधान और अदालत की दलीलें

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से किसी गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में चला जाता है, वह केवल धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता।

बेंच ने 'संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950' का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्तियों तक सीमित है। अदालत ने कहा कि पुरानी सामाजिक व्यवस्था में झेला गया पिछड़ापन, धर्म परिवर्तन के बाद नए धर्म में स्वतः स्थानांतरित नहीं होता।

क्या था पूरा मामला?

तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को एक सरकारी आदेश (GO) जारी किया था। इसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जातियों से इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को 'पिछड़ा वर्ग (मुसलिम)' श्रेणी में आरक्षण का लाभ देने के लिए सामुदायिक प्रमाण पत्र (Community Certificate) जारी किया जा सके।

मद्रास हाई कोर्ट ने 25 जून के अपने फैसले में इस सरकारी आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व न्यायिक फैसलों के विपरीत है। इसके खिलाफ तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

समीर अहमद की याचिका से जुड़ा है विवाद

यह पूरा कानूनी विवाद समीर अहमद की याचिका से शुरू हुआ था। समीर ने साल 2015 में इस्लाम धर्म अपना लिया था और नाम बदलने के साथ ही नए धर्म के अनुसार विवाह किया था।

इसके बाद उन्होंने मार्च 2024 के सरकारी आदेश का हवाला देते हुए 'मुस्लिम लेब्बाई' (एक मान्यता प्राप्त पिछड़ा मुस्लिम समुदाय) के रूप में सामुदायिक प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया था। स्थानीय तहसीलदार द्वारा आवेदन खारिज किए जाने के बाद उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसके बाद से यह कानूनी लड़ाई शीर्ष अदालत तक पहुंची। ​(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)

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