पुराने और नए वोटर लिस्टों में वोटरों की मैचिंग में अंतर से परेशानी बढ़ी
West Bengal : चुनाव आयोग ने पुराने और नए वोटर लिस्टों में वोटरों की मैचिंग (मिलान) का काम पूरा कर लिया है। देखा यह गया कि पुराने वोटर लिस्ट में जिन वोटरों के नाम हैं, उनमें से अधिकतर वोटरों के नाम नये वोटर लिस्ट में नहीं हैं। यानी वोटरों के नामों की औसतन 52 फीसद मैचिंग हैं। नए वोटर लिस्ट में वोटरों की संख्या बढ़ी हैं। चुनाव आयोग की एसआईआर के कार्य के बोझ से परेशानी बढ़ेगी। मैचिंग के मामले में पश्चिम बंगाल बिहार से पिछड़ा हुआ है। बिहार में औसतन 60 फीसद मैचिंग थी।
राज्य चुनाव आयोग के मिली जानकारी के मुताबिक चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार 2002 के वोटर लिस्ट में वोटरों के नाम से 2025 के वोटर लिस्ट के वोटरों के नाम का मैचिंग किया गया। औसतर 52 फीसद ही नामों का मैचिंग हो पाया। मौजूदा वोटर लिस्ट में वोटरों की संख्या सात करोड़ 66 लाख 37 हजार 521 है। कलकत्ता से सटे तीन जिलों हावड़ा, उत्तर चौबीस परगना और दक्षिण चौबीस परगना में वोटरों के नामों की 50 फीसद भी मैचिंग नहीं हुई।
हावड़ा जिले में 38 फीसद, उत्तर चौबीस परगना में 41 फीसद और दक्षिण चौबीस परगना में 45 फीसद वोटर के नामों की मैचिंग हुई है। इन तीनों जिलों के बड़ी संख्या में वोटरों को बनने वाले वोटर लिस्ट में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए प्रमाण पत्र दाखिल करने होंगे। राज्य के दूसरे जिलों में भी कम फीसद में मैचिंग हुई है। राज्य चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार पश्चिम बर्धमान में 31 फीसद, दक्षिण कोलकाता में 35 फीसद, कूचबिहार में 48 फीसद, उत्तर दिनाजपुर में 44 फीसद, मालदा में 50 फीसद, झाड़ग्राम में 51 फीसद, अलीपुरदुआर में 54 फीसद कलिमपोंग में 65 फीसद, दक्षिण दिनाजपुर में 55 फीसद, मुर्शिदाबाद में 56 फीसद, नदिया में 51 फीसद, बांकुड़ा में 53 फीसद, पुरुलिया में 79 फीसद, बीरभूम में 73 फीसद, पूर्व बर्धमान में 73 फीसद वोटरों के नामों की मैचिंग हुई है।
पुराने और नए वोटर लिस्टों में वोटरों के नामों की मैचिंग कम होने का मतलब है बीएलओ पर गणना फार्म को देने, भरवाने, जमा करने के कार्यों का बोझ बढ़ जाएगा। जिन वोटरों के नाम 2002 के वोटर लिस्ट में नहीं हैं, उन्हें चुनाव आयोग द्वारा तय प्रमाण पत्रों में कोई न कोई प्रमाण पत्र की व्यवस्था करनी पड़ेगी। मिली जानकारी के मुताबिक कोलकाता नगर पालिका समेत राज्य तमाम नगरपालिकाओं में जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए लोगों की भागदौड़ बढ़ गई है।
जानकारों के अनुसार चुनाव अधिकारियों का मामना है कि वोटरों के एक स्थान से दूसरे स्थान चले जाने, ठिकाना बदलवाने के कारण मैचिंग में कमी आई है। 2002 और 2025 के बीच बने वोटर लिस्ट पर गौर किया जाएगा। इससे और स्पष्ट हो जाएगा कि मैचिंग में कमी के क्या-क्या कारण हो सकते हैं। वोटरों के नामों की मैचिंग में कमी होने पर राजनीति गरमा गई है। टीएमसी का कहना है कि बड़ी संख्या में वोटरों के नामों की साजिश ही रही है।
दूसरी तरफ बीजेपी का कहना है कि बड़ी संख्या में फर्जी और बांग्लादेश से आए घुसपैठिए वोटर बन गए हैं। ऐसे लोगों की संख्या एक करोड़ से भी अधिक है। इधर एक नई समस्या खड़ी हुई है कि छपे 2002 के वोटर लिस्ट और चुनाव आयोग की ओर से वेबसाइट पर जारी वोटर लिस्ट में काफी अंतर हैं। जानकारों का कहना है कि बीएलओ को वोटरों के यहां जाने पर इसके चलते भी विवाद खड़ा होगा। किस वोटर लिस्ट को सही माना जाए, किसे नहीं, इसी सवाल पर विवाद खड़ा होगा।
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