रिवर्स इंजीनियरिंग से आगे: भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए अब 'फॉरवर्ड इंजीनियरिंग' क्यों है जरूरी?
नई दिल्ली। दुनिया भर में खाई जाने वाली हर पांच में से एक जेनेरिक दवा भारत में बनती है और 150 से अधिक देशों को हमारे यहां से वैक्सीन सप्लाई की जाती है। 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' का यह तमगा बेहद गौरवशाली है, लेकिन इस चमक के पीछे एक कड़वी हकीकत भी छिपी है। साल 2021 से अब तक भारत में सिर्फ आठ (8) स्वदेशी फार्मास्युटिकल इनोवेशन यानी नई दवाओं की खोज हुई है, जो यह सोचने पर मजबूर करती है कि विनिर्माण में बादशाहत रखने के बाद भी हम आविष्कार में इतने पीछे क्यों हैं।
रिवर्स इंजीनियरिंग से आगे: फॉरवर्ड इंजीनियरिंग की चुनौती
भारत ने रिवर्स इंजीनियरिंग (दूसरों की दवा का फॉर्मूला समझकर वैसी ही दवा बनाना) की कला में महारत हासिल करके वैश्विक बाजार में अपनी धाक जमाई है। लेकिन अब समय आ गया है कि देश 'फार्वर्ड इंजीनियरिंग' की ओर बढ़े, जहां भारतीय लैबोरेट्रीज में नए मॉलिक्यूल्स और लाइफ-सेविंग थेरेपीज का आविष्कार हो।
यह अंतर तब और बड़ा दिखाई देता है जब हम वैश्विक स्तर पर तुलना करते हैं। साल 2021 से जहां अमेरिका ने लगभग 500 महत्वपूर्ण फार्मास्युटिकल इनोवेशन किए हैं (जिसमें करीब 160 न्यू केमिकल एंटिटीज यानी NCEs शामिल हैं), वहीं चीन ने लगभग 150 स्वदेशी इनोवेशन डिलीवर किए हैं (जिसमें करीब 95 NCEs शामिल हैं)। इसके मुकाबले भारत का आंकड़ा अभी भी सिंगल डिजिट (सिर्फ 8) पर अटका हुआ है।
यह अंतर वैज्ञानिकों की क्षमता का नहीं, बल्कि इनोवेशन को मिलने वाले माहौल और सुरक्षा का है। जायडस लाइफसाइंसेज, वॉकहार्ट, ऑर्किड फार्मा, बायोकॉन, इम्यूनोएक्ट और एंटोड फार्मास्युटिकल्स जैसी चुनिंदा भारतीय कंपनियों ने न्यू केमिकल एंटिटीज, बायोलॉजिक्स, इम्यूनोथेरेपी, सेल थेरेपी और नोवेल ड्रग फॉर्मूलेशन के क्षेत्रों में काम करके यह साबित किया है कि हमारे वैज्ञानिकों में ग्लोबल स्टैंडर्ड पर आविष्कार करने का पूरा दम है।
क्या है 'एलीफेंट इन द रूम' और डेटा एक्सक्लूसिविटी का पेच?
एक नई दवा को बाजार में लाने के लिए सालों की रिसर्च, कड़े क्लिनिकल ट्रायल और भारी-भरकम पूंजी निवेश की जरूरत होती है। अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन जैसे बड़े देशों में दवा खोजकर्ताओं को 'क्लिनिकल डेटा एक्सक्लूसिविटी' (Clinical Data Exclusivity) का कानूनी अधिकार मिलता है। इस नियम के तहत एक तय समय तक कोई भी प्रतिस्पर्धी कंपनी मूल खोजकर्ता के क्लिनिकल ट्रायल डेटा का इस्तेमाल करके अपनी दवा की मंजूरी नहीं ले सकती। भारत में इस तरह के मजबूत सुरक्षा ढांचे की कमी है। चूंकि दवा बनाने और उसकी मंजूरी के साक्ष्य जुटाने में ही 8 से 12 साल लग जाते हैं, तब तक पेटेंट की अवधि का एक बड़ा हिस्सा खत्म हो चुका होता है। डेटा सुरक्षा न होने से भारतीय कंपनियां नया निवेश करने से कतराती हैं।
आम जनता और देश पर इसका क्या होगा असर?
दवाओं की कीमतों पर असर: एंटोड फार्मास्युटिकल्स के सीईओ के निजी विचारों के मुताबिक, अगर भारत में क्लिनिकल डेटा एक्सक्लूसिविटी का ढांचा लागू होता है, तो इससे दवाओं की दीर्घकालिक सामर्थ्य (Affordability) या मरीजों तक पहुंच पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि एक तय समय के बाद बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाएगी।
गंभीर बीमारियों का स्वदेशी इलाज: इस सुरक्षा से भारतीय फार्मा कंपनियां उन बीमारियों के लिए दवा खोजने में निवेश करेंगी जो अभी तक लाइलाज हैं या जिनकी दवाएं बहुत महंगी हैं। इससे देश के नागरिकों को देश में ही बनीं अत्याधुनिक और सस्ती थेरेपी मिल सकेंगी।
इकोनॉमी और इंडस्ट्री को मजबूती: जब तक देश में नए आविष्कारों को पुरस्कृत और सुरक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक इनोवेशन महज अपवाद बने रहेंगे। इस बदलाव से भारत सिर्फ दूसरों की दवाएं बनाने वाला देश न रहकर, दुनिया को नई दवाएं देने वाला 'ग्लोबल लीडर' बन सकता है। (Source: ANI)
डिस्क्लेमर: लेखक 'एंटोड फार्मास्युटिकल्स' के सीईओ (CEO) हैं। यहां साझा किए गए विचार उनके निजी हैं।
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