राधा रानी की अष्टसखियों में प्रमुख ललिता सखी का जन्मोत्सव, जानें कथा, पूजा विधि और मुहूर्त
नई दिल्ली (भारत)। राधा-कृष्ण की भक्ति परंपरा में ललिता सखी का विशेष स्थान माना जाता है। उन्हें राधा रानी की अष्टसखियों में प्रमुख सखी बताया गया है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को ललिता सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन ललिता सखी का प्राकट्य हुआ था। ब्रज क्षेत्र में इस अवसर पर राधा-कृष्ण के साथ ललिता सखी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
2026 में कब है ललिता सप्तमी?
ललिता सप्तमी 2026 में 18 सितंबर, रविवार को मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को पड़ता है। सप्तमी तिथि के आरंभ और समाप्त होने के समय में अलग-अलग पंचांगों तथा स्थान के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए व्रत और पूजा के लिए स्थानीय पंचांग के समय को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।
पूजा का शुभ मुहूर्त
ललिता सप्तमी की पूजा के लिए दिन के समय को शुभ माना जाता है। भक्त स्नान आदि से निवृत्त होकर ललिता सखी, राधा रानी और श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए पूजा कर सकते हैं।
व्रत-पूजन का समय: स्थानीय पंचांग के अनुसार
पर्व: ललिता सप्तमी
तिथि: भाद्रपद शुक्ल सप्तमी
कौन हैं ललिता सखी?
वैष्णव और ब्रज भक्ति परंपरा में ललिता सखी को राधा रानी की अष्टसखियों में प्रमुख माना जाता है। अष्टसखियों के नाम ललिता, विशाखा, चित्रा, चंपकलता, तुंगविद्या, इंदुलेखा, रंगदेवी और सुदेवी बताए जाते हैं। भक्ति साहित्य में ललिता सखी को राधा-कृष्ण की लीलाओं की प्रमुख सहचरी के रूप में वर्णित किया गया है। उनकी भूमिका राधा रानी की सेवा और श्रीकृष्ण के साथ उनकी दिव्य लीलाओं में सहयोग करने वाली सखी के रूप में बताई जाती है।
ललिता सखी के जन्म की कथा
ललिता सखी का प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को हुआ था। कथा के अनुसार ललिता सखी का जन्म ब्रज क्षेत्र में हुआ। वे बचपन से ही राधा रानी की अत्यंत प्रिय सखी थीं। उनके पिता का नाम विशोक और माता का नाम सारदी है। ललिता सखी को राधा रानी से आयु में बड़ी और स्वभाव से अत्यंत स्पष्टवादी बताया गया है। भक्ति परंपरा में कहा जाता है कि वे राधा-कृष्ण के प्रेम में आने वाली किसी भी स्थिति को दूर करने और दोनों के मिलन में सहयोग करने के लिए सदैव तत्पर रहती थीं।
ललिता सखी का स्वभाव
राधा-कृष्ण भक्ति साहित्य में ललिता सखी के व्यक्तित्व को प्रेम, सेवा, साहस और स्पष्टता से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि वे राधा रानी के प्रति अत्यंत समर्पित थीं। जब राधा और कृष्ण के बीच किसी बात को लेकर नाराजगी होती, तो ललिता सखी अपनी बुद्धिमत्ता से स्थिति को संभालने में सहयोग करती थीं। उनका प्रेम केवल भावनात्मक नहीं बल्कि सेवा-भाव से जुड़ा माना जाता है। इसी कारण भक्त उन्हें राधा रानी की प्रमुख सेविका और सखी के रूप में स्मरण करते हैं।
ललिता सप्तमी की पूजा विधि
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल को साफ करके चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएं।
- राधा-कृष्ण और ललिता सखी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- दीपक और धूप जलाएं।
- ललिता सखी को पुष्प और माला अर्पित करें।
- राधा रानी और श्रीकृष्ण को भी फूल, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
- फल, मिठाई और अन्य सात्विक भोग लगाएं।
- राधा-कृष्ण के मंत्रों का जाप करें।
- ललिता सखी की कथा का श्रवण या पाठ करें।
- अंत में आरती करके सुख-शांति और भक्ति की प्रार्थना करें।
पूजा में क्या चढ़ाएं?
ललिता सप्तमी के दिन श्रद्धा के अनुसार फूल, माला, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, फल और मिठाई अर्पित की जा सकती है। राधा-कृष्ण को प्रिय माने जाने वाले माखन-मिश्री का भोग भी लगाया जाता है। भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार पंचामृत, दूध, दही, फल और अन्य सात्विक प्रसाद भी अर्पित कर सकते हैं।
ललिता सप्तमी का व्रत कैसे रखें?
कई भक्त इस दिन उपवास या फलाहार करते हैं। व्रत की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। जो लोग स्वास्थ्य कारणों से उपवास नहीं कर सकते, वे श्रद्धा के साथ पूजा और नाम-स्मरण कर सकते हैं। धार्मिक व्रत के लिए स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाला कठोर उपवास करना आवश्यक नहीं माना जाना चाहिए।
ललिता सखी और राधा-कृष्ण की भक्ति
ललिता सखी का चरित्र राधा-कृष्ण भक्ति में सेवा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। उनके माध्यम से भक्त यह भाव ग्रहण करते हैं कि ईश्वर की भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रेम, सेवा, समर्पण और सद्भाव भी भक्ति के महत्वपूर्ण अंग हैं। इसी कारण ललिता सप्तमी केवल जन्मोत्सव नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण की भक्ति परंपरा में सखी-भाव और सेवा-भाव को स्मरण करने का अवसर भी माना जाता है।
(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)
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