डिंडौरी के प्राचीन ऋण मुक्तेश्वर महादेव मंदिर में

डिंडौरी का ऋण मुक्तेश्वर महादेव मंदिर: जहां आस्था के साथ जुड़ी है वफादार कुत्ते की अनोखी कथा

Dindori’s Rin Mukteshwar Mahadev Temple Draws Devotees with Its Unique Legend

डिंडौरी (मध्य प्रदेश)। जिला मुख्यालय से लगभग 13 किलोमीटर दूर ग्राम कुकर्रामठ में स्थित भगवान ऋण मुक्तेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर आस्था, इतिहास और लोकविश्वास का अनूठा केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडव काल में हुआ था और वर्तमान में इसकी देखरेख पुरातत्व विभाग के अधीन है। वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन माह और महाशिवरात्रि के अवसर पर हजारों भक्त भगवान ऋण मुक्तेश्वर के दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं।

भगवान ऋण मुक्तेश्वर का जलाभिषेक करने से होती है ऋण मुक्ति

स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार भगवान ऋण मुक्तेश्वर का जलाभिषेक करने और सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं को आर्थिक संकट और ऋण संबंधी परेशानियों से मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यही कारण है कि दूर-दराज के गांवों और जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं।

कुत्ते को रखा गिरवी

इस मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथा एक साहूकार और उसके प्रति वफादार कुत्ते की है। बताया जाता है कि बहुत समय पहले एक व्यापारी ने व्यापार के उद्देश्य से दूसरे राज्य जाने के लिए एक साहूकार से कर्ज लिया। उसके पास गिरवी रखने के लिए कोई कीमती वस्तु नहीं थी, इसलिए उसने अपने सबसे प्रिय और वफादार कुत्ते को साहूकार के पास गिरवी रख दिया और वादा किया कि व्यापार से लौटकर ऋण चुका देगा। कुछ समय बाद साहूकार के घर चोरी हो गई। चोर घर का बहुमूल्य सामान लेकर जंगल की ओर भाग गए। वफादार कुत्ते ने चोरों का पीछा किया और यह देख लिया कि उन्होंने चोरी का सामान कहां छिपाया है।

कुत्ते की समाधि पर मंदिर का निर्माण

अगले दिन वह साहूकार को उसी स्थान पर ले गया, जहां सारा सामान सुरक्षित मिल गया। साहूकार कुत्ते की स्वामिभक्ति और ईमानदारी से इतना प्रभावित हुआ कि उसने व्यापारी का पूरा कर्ज माफ कर दिया और एक पत्र लिखकर कुत्ते के गले में बांध दिया, जिसमें लिखा था कि ऋण पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है और कुत्ते को उसके मालिक के पास वापस भेजा जा रहा है। जब कुत्ता अपने मालिक के पास पहुंचा तो व्यापारी ने दूर से उसे अकेले आते देखा। उसे लगा कि कुत्ता साहूकार के यहां से भाग आया है। बिना सच्चाई जाने उसने क्रोध में आकर कुत्ते की हत्या कर दी। बाद में जब उसने कुत्ते के गले में बंधा पत्र पढ़ा तो उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। कुत्ते की समाधि पर मंदिर निर्माण कराया गया है ऐसा जानकर बतलाते हैं।

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