देवी जरत्कारू की कथा: नागवंश की रक्षा के लिए हुआ ऋषि जरत्कारू से विवाह, ऐसे जन्मे आस्तीक मुनि
नई दिल्ली (भारत)। मनसा देवी जिन्हे हिन्दू धर्मग्रंथों में देवी जरत्कारू के नाम से जाना जाता है, इनका संबंध नागवंश और आस्तीक मुनि की कथा से जुड़ा है। महाभारत के आदिपर्व में उन्हें नागराज वासुकि की बहन बताया गया है। उनका विवाह महान तपस्वी ऋषि जरत्कारू से हुआ और उनके पुत्र आस्तीक मुनि ने आगे चलकर राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ को रोककर नागवंश की रक्षा की।
नागवंश को बचाने के लिए हुआ विवाह
पौराणिक कथा के अनुसार नागमाता कद्रू ने अपने ही संतानों को जीवित अग्नि मे भष्म होने का श्राप दिया था। नागराज वासुकि और अन्य नागों ने भगवान शिव और ब्रम्हा से अपने भाइयों की रक्षा करने के लिए प्रार्थना की। भगवान शिव और भगवान ब्रम्हा ने उन्हे बताया कि नागों की जनसंख्या काफी बढ़ गई है और नाग अपने अहंकार में सृष्टि के विनाश पर उतार आए हैं।
इसीलिए देवी कद्रू के श्राप के अनुसार उन सभी नागों की मरितु हो जाएगी जो सृष्टि का संतुलन बिगाड़ रहे हैं। उनके आलवे बाँकी सांपों की रक्षा ऋषि जरत्कारू और उनकी समान नाम वाली पत्नी से जन्म लेने वाला पुत्र करेगा।
देवी जरत्कारू(मनसा देवी) का ऋषि जरत्कारू से विवाह
इसी उद्देश्य से वासुकि नाग ने अपनी बहन जरत्कारू(मनसा देवी) का विवाह ऋषि जरत्कारू से कराया। ऋषि ने विवाह के समय शर्त रखी कि यदि उनकी पत्नी ने कभी ऐसा कार्य किया जो उन्हें पसंद न हो, तो वे उसे छोड़ देंगे।
पति की नींद और देवी जरत्कारू (मनसा देवी) की परीक्षा
एक दिन ऋषि जरत्कारू गहरी नींद में सो रहे थे। संध्या का समय हो चुका था और उनकी संध्या-वंदना का समय निकल रहा था। देवी जरत्कारू धर्म-संकट में पड़ गईं। यदि वे पति को जगातीं तो उनकी नींद टूटती और यदि नहीं जगातीं तो ऋषि की धार्मिक दिनचर्या प्रभावित होती।
अंततः उन्होंने धर्म का ध्यान रखते हुए ऋषि को जगा दिया। जागने पर ऋषि बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने पत्नी को छोड़ने का निर्णय लिया। हालांकि उन्होंने जाते समय यह आशीर्वाद दिया कि उनके गर्भ से एक तेजस्वी, विद्वान और धर्मपरायण पुत्र जन्म लेगा।
जन्म हुआ आस्तीक मुनि का
समय आने पर देवी जरत्कारू (मनसा देवी) ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम आस्तीक पड़ा। पौराणिक कथाओं में आस्तीक को अत्यंत ज्ञानी और तपस्वी बताया गया है। उन्होंने आगे चलकर अपने पिता के पितरों का भी उद्धार किया।
आस्तीक ने ऐसे बचाया नागवंश
आगे चलकर राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हुई। इसके बाद उनके पुत्र राजा जनमेजय ने नागों से बदला लेने के लिए सर्पसत्र शुरू कराया। यज्ञ की अग्नि में अनेक नाग खिंचे चले आने लगे।
जब नागवंश पर संकट बढ़ गया, तब आस्तीक मुनि यज्ञस्थल पर पहुंचे। उन्होंने अपनी बुद्धि और मधुर वाणी से राजा जनमेजय को प्रसन्न किया और वरदान के रूप में सर्पयज्ञ रोकने की मांग की। राजा ने उनकी बात स्वीकार कर ली और इस प्रकार अनेक नागों का जीवन बच गया।
नागों की रक्षा में देवी जरत्कारू की बड़ी भूमिका
इस कथा में देवी का महत्व इसलिए भी विशेष माना जाता है क्योंकि उनके पुत्र आस्तीक ही वह व्यक्ति बने जिन्होंने नागवंश को विनाश से बचाया। देवी जरत्कारू (मनसा देवी) की पूजा करने से सर्पदोष से मुक्ति मिलती है। विभिन्न लोककथाओं और दंतकथाओं में जरत्कारू (मनसा देवी) की अनेकों कहानियाँ मिलती है। जरत्कारू (मनसा देवी) का विवाह केवल पारिवारिक संबंध नहीं, बल्कि पौराणिक कथा के अनुसार नागवंश के संरक्षण का माध्यम बना।
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