दीपावली की रात कई क्षेत्रों में मां महाकाली की विश

दीपावली की रात होती है मां महाकाली की विशेष आराधना; जानिए उनका स्वरूप और धार्मिक महत्व

मां महाकाली

नई दिल्ली (भारत)। दीपावली का पर्व केवल मां लक्ष्मी की पूजा तक सीमित नहीं है। देश के कई हिस्सों, विशेषकर पश्चिम बंगाल, असम, मिथिला, ओडिशा और त्रिपुरा में कार्तिक अमावस्या की रात मां काली की विशेष आराधना की जाती है। इसे काली पूजा या श्यामा पूजा कहा जाता है। इस अवसर पर मंदिरों और पूजा पंडालों में मां महाकाली की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। पूरी रात मंत्रोच्चार, आरती और विशेष अनुष्ठानों के साथ देवी की उपासना होती है।

कौन हैं मां काली?

मां काली को आदिशक्ति का अत्यंत प्रभावशाली स्वरूप माना जाता है। वे दस महाविद्याओं में प्रथम महाविद्या हैं। मां का श्याम वर्ण, गले में मुंडमाला, हाथों में खड्ग और असुर का कटा हुआ सिर तथा बाहर निकली हुई जिह्वा उनके प्रसिद्ध स्वरूप की पहचान है। मां काली का स्वरूप बुराई, अहंकार, अत्याचार और आसुरी शक्तियों के विनाश का प्रतीक है। वे अपने भक्तों को निर्भयता प्रदान करने वाली और संकटों से रक्षा करने वाली देवी मानी जाती हैं। उनका उग्र स्वरूप अधर्म के लिए है, जबकि भक्तों के लिए वे करुणामयी मां हैं।

काली पूजा का महत्व

कार्तिक अमावस्या की रात्रि में मां काली की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। इस पर्व को श्यामा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात मां काली की आराधना करने से भय, नकारात्मकता और जीवन की बाधाओं से मुक्ति की कामना की जाती है। भक्त मां से साहस, शक्ति, स्वास्थ्य और परिवार की रक्षा का आशीर्वाद मांगते हैं। काली पूजा की रात्रि को तांत्रिक साधना के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया है। विशेष तांत्रिक अनुष्ठान योग्य गुरु के मार्गदर्शन में करें।

मां काली के प्रकट होने की कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे शक्तिशाली असुरों ने देवताओं तथा संसार में आतंक मचा रखा था। देवता उनके अत्याचारों से परेशान होकर देवी की शरण में पहुंचे। देवी दुर्गा ने असुरों से युद्ध किया। इसी युद्ध के दौरान उनके तेज और क्रोध से मां काली का प्राकट्य हुआ। मां काली ने अपने भयंकर स्वरूप से असुरों की सेना का संहार करना शुरू कर दिया। सबसे कठिन युद्ध रक्तबीज के साथ हुआ। उसे वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें धरती पर गिरेंगी, उतने ही नए रक्तबीज पैदा हो जाएंगे। इस कारण उसका वध करना लगभग असंभव हो गया था।

रक्तबीज के अंत को प्रगटी मां काली

तब मां काली ने रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही ग्रहण करना शुरू कर दिया। इस तरह उसकी नई प्रतियां पैदा होना बंद हो गईं और अंततः उसका वध हुआ। असुरों का संहार करने के बाद भी मां काली का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। उनका तांडव इतना प्रचंड था कि पूरी सृष्टि पर संकट मंडराने लगा। देवताओं ने भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की। तब भगवान शिव मां काली के मार्ग में लेट गए। युद्ध के उन्माद में मां का पैर भगवान शिव के वक्ष पर पड़ गया। जैसे ही उन्हें पता चला कि उनका पैर अपने आराध्य पति भगवान शिव पर पड़ा है, वे लज्जित हो गईं और उनकी जिह्वा बाहर निकल आई और माँ का क्रोध शांत हो गया। इस कथा में मां काली को अधर्म और अत्याचार का अंत करने वाली महाशक्ति के रूप में दर्शाया गया है।

काली पूजा की विधि

काली पूजा सामान्यतः रात्रि में की जाती है। पूजा की विधि क्षेत्रीय परंपरा और परिवार की मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

पूजा स्थल की सफाई: सबसे पहले पूजा स्थल को साफ करें। मां काली की प्रतिमा या तस्वीर को चौकी पर स्थापित करें।

स्नान और संकल्प: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मां का ध्यान करते हुए परिवार की सुख-शांति और कल्याण का संकल्प लें।

दीप प्रज्वलित करें: मां के सामने घी या तेल का दीपक जलाएं। धूप और अगरबत्ती अर्पित करें।

पुष्प अर्पित करें: मां काली को लाल गुड़हल के फूल विशेष रूप से प्रिय माने जाते हैं। उन्हें फूल और माला चढ़ाएं।

भोग लगाएं: मां को फल, मिठाई, नारियल, खीर और अन्य पकवान अर्पित करें।

मंत्र जाप करें: मां काली के मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें।

आरती करें: पूजा के अंत में मां की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।

मां काली के प्रमुख मंत्र

ॐ क्रीं कालिकायै नमः।

ॐ काली महाकाली कालिके परमेश्वरी। सर्वानंदकरी देवी नारायणि नमोऽस्तुते॥

ॐ कालिकायै च विद्महे, श्मशानवासिन्यै धीमहि, तन्नो काली प्रचोदयात् ॥

ॐ करालवदनां घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम् । कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमाला विभूषिताम् ॥ शरणागत-दीनार्त-परित्राण-परायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि ! नारायणि ! नमोस्तुते ॥

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते॥

इन मंत्रों का जाप श्रद्धा और एकाग्रता से करें। विशेष तांत्रिक मंत्रों और अनुष्ठानों के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक माना जाता है।

मां काली को कौन-कौन से भोग लगाए जाते हैं?

मां काली की पूजा में क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग भोग अर्पित किए जाते हैं। सामान्य रूप से भक्त इन चीजों का भोग लगाते हैं:

  • लाल गुड़हल के फूल
  • नारियल
  • केला और अन्य फल
  • खीर
  • हलवा
  • मिठाई
  • गुड़ से बने पकवान
  • चावल से बने पारंपरिक व्यंजन

कुछ परंपराओं में मां को विशेष भोग अर्पित किया जाता है। कुछ मंदिरों में स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग-अलग अनुष्ठान होते हैं।

धूमधाम से होती है श्यामा पूजा

काली पूजा का उत्सव विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। गांवों एवं शहरों में भव्य पंडाल बनाए जाते हैं। मां काली की विशाल और आकर्षक प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। मंदिरों में पूरी रात पूजा-अर्चना होती है। इस दिन घरों और मंदिरों में दीप जलाए जाते हैं। भक्त मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और परिवार की सुख-शांति, समृद्धि तथा सुरक्षा की कामना करते हैं। दीपावली के साथ मनाई जाने वाली श्यामा पूजा बंगाल की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)

यह भी पढ़ें: दीपावली पर क्यों दी जाती है पितरों को विदाई? जानिए धार्मिक महत्व, पूजा विधि, नियम और मान्यताएं