संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्

जीवित्पुत्रिका व्रत: जानिए इस वर्ष कब है जितिया व्रत, पूजा का शुभ समय, कथा और इसके विशेष नियम

Jivitputrika Vrat: Date, Auspicious Timings, Significance, Rituals, and Legend

नई दिल्ली (भारत)। हिंदू धर्म में संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जितिया व्रत विशेष महत्व रखता है। यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। नेपाल के मिथिला क्षेत्र में भी इसे जितिया के नाम से मनाने की परंपरा है। इस व्रत में माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और मंगलकामना के लिए कठिन निर्जला उपवास करती हैं। हालांकि स्वास्थ्य और स्थानीय परंपरा के अनुसार व्रत के नियम अलग हो सकते हैं।

कब है जीवित्पुत्रिका व्रत 2026?

वर्ष 2026 में जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा। यह व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार 3 अक्टूबर को सप्तमी तिथि सुबह 7:59 बजे तक रहेगी और इसके बाद अष्टमी तिथि शुरू होगी, जो 4 अक्टूबर की सुबह करीब 5:51 बजे तक रहेगी। इसलिए व्रत के लिए 3 अक्टूबर को अष्टमी तिथि का पालन किया जाएगा।

जीवित्पुत्रिका व्रत 2026 का समय

व्रत की तारीख: 3 अक्टूबर 2026, शनिवार अष्टमी तिथि प्रारंभ: 3 अक्टूबर, सुबह 7:59 बजे अष्टमी तिथि समाप्त: 4 अक्टूबर, सुबह 5:51 बजे पारण: स्थानीय पंचांग में दिए गए नियम और पारण समय के अनुसार

क्यों मनाया जाता है जीवित्पुत्रिका व्रत?

जीवित्पुत्रिका व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना माना जाता है। धार्मिक परंपरा में माताओं द्वारा अपनी संतान के लिए किए जाने वाले त्याग और तपस्या का यह महत्वपूर्ण पर्व है। ‘जीवित्पुत्रिका’ नाम का संबंध ही संतान के जीवित और स्वस्थ रहने की कामना से जोड़ा जाता है। इसी वजह से इसे कई जगह जितिया या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन श्रद्धा से व्रत और पूजा करने से संतान पर भगवान की कृपा बनी रहती है। इन मान्यताओं को धार्मिक आस्था और परंपरा के रूप में देखा जाता है।

जीवित्पुत्रिका व्रत की प्रसिद्ध कथा

जीवित्पुत्रिका व्रत से जुड़ी प्रमुख कथा में राजा जीमूतवाहन, नागराज और गरुड़ का प्रसंग आता है। कथा के अनुसार एक समय नागवंश पर गरुड़ का भय बना हुआ था। परंपरा में वर्णित है कि गरुड़ को प्रसन्न करने के लिए नागों की ओर से प्रतिदिन एक नाग को बलि के रूप में प्रस्तुत किया जाता था।

एक दिन जीमूतवाहन की नजर एक नाग माता पर पड़ी, जो अपने पुत्र शंखचूड़ को गरुड़ के सामने जाने के लिए तैयार कर रही थी। मां का विलाप और पुत्र को खोने का भय देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने शंखचूड़ को बचाने का निश्चय किया और स्वयं नाग के स्थान पर बलि के लिए प्रस्तुत हो गए। जीमूतवाहन ने लाल वस्त्र धारण कर स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत किया।

गरुड़ उन्हें लेकर चले गए, लेकिन जब उन्हें पता चला कि जीमूतवाहन नाग नहीं बल्कि एक मानव हैं और उन्होंने नाग के प्राण बचाने के लिए स्वयं को समर्पित किया है, तो वे उनके त्याग से प्रभावित हुए। कथा के अनुसार गरुड़ ने जीमूतवाहन के त्याग से प्रसन्न होकर नागों को अभय दिया और आगे से नागों को इस प्रकार बलि देने की परंपरा समाप्त हो गई। इसी कथा को जीवित्पुत्रिका व्रत की प्रमुख कथाओं में सुनाया जाता है। कथा का केंद्रीय संदेश त्याग, करुणा, परोपकार और दूसरे के जीवन की रक्षा से जुड़ा है।

कैसे करें जीवित्पुत्रिका व्रत की पूजा?

व्रत के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की सफाई करके वहां भगवान विष्णु अथवा परंपरा के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत से संबंधित देवी-देवताओं की पूजा करें।

पूजा में अपनी परंपरा के अनुसार—

  • दीपक और धूप
  • अक्षत
  • रोली और चंदन
  • फूल
  • फल
  • नैवेद्य
  • पूजा का जल
  • व्रत कथा की पुस्तक

आदि सामग्री रखी जा सकती है। इसके बाद संतान के स्वास्थ्य, लंबी आयु और सुखी जीवन की कामना करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा के बाद जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनने या पढ़ने की परंपरा है।

जितिया का लाल धागा भी है खास

कई क्षेत्रों में जीवित्पुत्रिका व्रत के दौरान जितिया या जिउतिया धारण करने की परंपरा है। इसे संतान की मंगलकामना और व्रत के संकल्प से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि इसे पहनने का तरीका और समय अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों में अलग हो सकता है। इसलिए स्थानीय परंपरा का पालन करना उचित है।

व्रत में क्या खाया जाता है?

जीवित्पुत्रिका व्रत के नियम क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हैं। कई स्थानों पर व्रत से पहले नहाय-खाय और उसके बाद उपवास की परंपरा होती है। व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार भोजन करती हैं और अगले दिन पारण करती हैं।

व्रत का पारण कब करें?

जीवित्पुत्रिका व्रत के बाद अगले दिन पारण करने की परंपरा है। पारण का समय स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्धारित किया जाता है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और तिथि के अंतर के कारण पारण का समय अलग हो सकता है। इसलिए बिहार, मिथिला, उत्तर प्रदेश, झारखंड या नेपाल में रहने वाले श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार पारण करना चाहिए।

मिथिला में जितिया का विशेष महत्व

मिथिला में जितिया केवल धार्मिक व्रत ही नहीं, बल्कि पारिवारिक और लोक-सांस्कृतिक परंपरा का भी हिस्सा है। माताएं संतान की मंगलकामना से व्रत रखती हैं और परिवार की महिलाएं मिलकर व्रत की कथा और पूजा में शामिल होती हैं। कई स्थानों पर इस पर्व से जुड़े लोकगीत भी गाए जाते हैं। इससे जितिया की परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही है।

क्या है जीवित्पुत्रिका व्रत का संदेश?

जीवित्पुत्रिका व्रत मातृ प्रेम और संतान के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इसकी कथा में जीमूतवाहन का त्याग भी महत्वपूर्ण संदेश देता है कि किसी दूसरे के जीवन की रक्षा के लिए किया गया निःस्वार्थ प्रयास मानवता का बड़ा उदाहरण हो सकता है। धार्मिक मान्यता अपनी जगह है, लेकिन इस पर्व का सामाजिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है—यह परिवार, मातृत्व, त्याग, करुणा और संतान के प्रति जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करने वाला अवसर माना जाता है।

(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)

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