भगवान जगन्नाथ आज अपने भाई-बहन भगवान बलभद्र और देवी

आज शुरू होगी भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा, श्रद्धा और आस्था के महासागर में डूबी पुरी

Lord Jagannath's Grand Rath Yatra Begins in Puri

पुरी (ओडिशा)। भगवान श्रीजगन्नाथ की विश्वविख्यात रथ यात्रा आज  से प्रारंभ होगी। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर निकलने वाली यह ऐतिहासिक यात्रा देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा उत्सव मानी जाती है। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा को भव्य एवं आकर्षक लकड़ी के रथों पर विराजमान कर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है।

भगवान स्वयं आते हैं अपने भक्तों के बीच

रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं। मान्यता है, कि इस दिन भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं और उन्हें दर्शन देकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। यही कारण है कि इस पर्व को सनातन परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है।

रथ यात्रा को सुरक्षित और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए व्यापक तैयारी

इस वर्ष भी प्रशासन ने रथ यात्रा को सुरक्षित और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए व्यापक तैयारियां की हैं। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। यातायात व्यवस्था, चिकित्सा सेवाएं, पेयजल, नियंत्रण कक्ष और आपातकालीन सहायता के लिए विशेष टीमें तैनात की गई हैं। बड़ी संख्या में पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियों के जवान पूरे यात्रा मार्ग पर निगरानी रखेंगे।

नई लकड़ियों से पारंपरिक विधि के अनुसार होता है, रथों का निर्माण 

रथ यात्रा का सबसे आकर्षक दृश्य तब होता है जब हजारों श्रद्धालु विशाल रथों को मोटी रस्सियों से खींचते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, भगवान बलभद्र का तालध्वज और देवी सुभद्रा का दर्पदलन (देवदलन) नाम से जाना जाता है। हर वर्ष इन रथों का निर्माण नई लकड़ियों से पारंपरिक विधि के अनुसार किया जाता है, जो इस उत्सव की विशेष पहचान है।

निभाई जाती है 'छेरा पहरा' की रस्म

रथ यात्रा के दौरान 'छेरा पहरा' की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। इस अनुष्ठान में पुरी के गजपति महाराज स्वर्ण झाड़ू से रथों के आसपास सफाई करते हैं। यह परंपरा इस संदेश का प्रतीक है कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं और सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

ओडिशा की समृद्ध संस्कृति, लोक परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक

धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह उत्सव ओडिशा की समृद्ध संस्कृति, लोक परंपरा और सामाजिक एकता का भी प्रतीक माना जाता है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु भजन-कीर्तन, संकीर्तन और जयघोष के बीच भगवान के रथों को खींचकर स्वयं को धन्य मानते हैं। रथ यात्रा के बाद भगवान लगभग एक सप्ताह तक गुंडिचा मंदिर में विराजमान रहते हैं, जिसके उपरांत बहुदा यात्रा के माध्यम से पुनः श्रीजगन्नाथ मंदिर लौटते हैं।

श्रद्धा, सेवा, समर्पण और भारतीय सांस्कृतिक विरासत का भव्य उत्सव

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा, समर्पण और भारतीय सांस्कृतिक विरासत का भव्य उत्सव है, जिसका इंतजार हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु बड़ी उत्सुकता से करते हैं।

यह भी पढ़ेंः आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का दूसरा दिन, द्वितीया-तृतीया तिथि का विशेष संयोग