आधी रात कारागार में हुआ श्रीकृष्ण का जन्म, यमुना पार कर गोकुल पहुंचे कान्हा
नई दिल्ली (भारत)। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व जन्माष्टमी देशभर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में मथुरा की धरती पर उस समय अवतार लिया, जब अत्याचार और अधर्म बढ़ रहा था। जन्माष्टमी पर भगवान के जन्म की कथा सुनने और सुनाने की विशेष परंपरा है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कंध में श्रीकृष्ण के जन्म और उनके मथुरा से गोकुल पहुंचने का विस्तृत वर्णन मिलता है।
कंस के अत्याचार से परेशान थी मथुरा
पौराणिक कथा के अनुसार मथुरा पर राजा कंस का शासन था। वह अत्यंत शक्तिशाली लेकिन क्रूर शासक था। अपनी बहन देवकी का विवाह जब वसुदेव से हुआ, तब कंस स्वयं उन्हें रथ से विदा करने जा रहा था। इसी दौरान आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस के विनाश का कारण बनेगी।
यह सुनकर कंस भयभीत हो गया। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। कंस को डर था कि देवकी की आठवीं संतान ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। इसी भय के कारण उसने देवकी की संतानों को जन्म लेते ही मारना शुरू कर दिया।
आठवीं संतान के रूप में हुआ श्रीकृष्ण का जन्म
समय बीतता गया और देवकी के गर्भ से आठवीं संतान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। धार्मिक परंपरा के अनुसार उनका जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में हुआ था। जन्म के समय कारागार में दिव्य प्रकाश फैल गया और वातावरण अद्भुत हो उठा।
कथा के अनुसार भगवान ने पहले देवकी और वसुदेव को अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन दिया। इसके बाद उन्होंने उन्हें आश्वस्त किया कि वे कंस के अत्याचार का अंत करने के लिए अवतरित हुए हैं।
जन्म के साथ ही खुल गए कारागार के द्वार
श्रीकृष्ण के जन्म के बाद कंस के सैनिक गहरी नींद में सो गए। कारागार के दरवाजे और बेड़ियां खुल गईं। वसुदेव ने नवजात श्रीकृष्ण को एक टोकरी में रखा और उन्हें लेकर कारागार से बाहर निकल पड़े।
उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यमुना नदी को पार करने की थी। बाहर रात का अंधेरा था और बारिश हो रही थी। इसके बावजूद वसुदेव भगवान को लेकर गोकुल की ओर आगे बढ़ते रहे। श्रीमद्भागवत की कथा में बताया गया है कि इस यात्रा के दौरान शेषनाग ने अपने फनों से भगवान श्रीकृष्ण के ऊपर छाया की और यमुना ने भी उनके लिए मार्ग प्रदान किया।
गोकुल में यशोदा के घर पहुंचे कान्हा
वसुदेव जब गोकुल पहुंचे, तब नंद बाबा और यशोदा के घर एक कन्या का जन्म हुआ था। कथा के अनुसार यशोदा उस समय योगमाया के प्रभाव में थीं। वसुदेव ने नवजात श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुला दिया और वहां जन्मी कन्या को अपने साथ लेकर मथुरा के कारागार लौट आए।
वसुदेव ने कन्या को देवकी के पास रख दिया। जैसे ही कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली, वह कारागार में पहुंच गया। उसने उस कन्या को भी मारने का प्रयास किया, लेकिन वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में देवी के रूप में प्रकट हुई।
कथा के अनुसार देवी ने कंस को बताया कि उसका संहार करने वाला जन्म ले चुका है और वह सुरक्षित स्थान पर पहुंच चुका है। यह सुनकर कंस और अधिक चिंतित हो गया।
नंद-यशोदा के घर पले श्रीकृष्ण
उधर गोकुल में नंद बाबा और यशोदा के घर श्रीकृष्ण का पालन-पोषण होने लगा। बाल कृष्ण की लीलाओं ने पूरे गोकुल को आनंद से भर दिया। माखन चोरी, गोप-गोपियों के साथ उनकी बाल लीलाएं और बांसुरी की मधुर धुन से जुड़ी कथाएं आज भी भक्तों के बीच लोकप्रिय हैं।
आगे चलकर श्रीकृष्ण ने अनेक अत्याचारी शक्तियों का सामना किया और अंततः मथुरा लौटकर कंस का वध किया। इस प्रकार पौराणिक मान्यता में उनका जन्म अधर्म के अंत और धर्म की स्थापना से जुड़ा माना जाता है।
क्यों मनाई जाती है जन्माष्टमी?
श्रीकृष्ण के जन्म की स्मृति में जन्माष्टमी मनाई जाती है। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं, भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं और रात में उनके जन्म के समय विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं, भजन-कीर्तन होते हैं और भगवान के बाल स्वरूप को झूले में विराजमान किया जाता है।
मथुरा और वृंदावन में जन्माष्टमी का विशेष उत्साह देखने को मिलता है। 2026 में भी मथुरा में जन्मोत्सव को लेकर विशेष सजावट और सुरक्षा व्यवस्थाएं की गई हैं।
श्रीकृष्ण जन्म कथा देती है बड़ा संदेश
श्रीकृष्ण की जन्म कथा केवल एक धार्मिक कहानी नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में आशा और धर्म की विजय का संदेश भी देती है। उनका जन्म कारागार में हुआ, लेकिन उनका जीवन आगे चलकर धर्म, ज्ञान और कर्म का मार्गदर्शक बना।
भगवान श्रीकृष्ण ने बाद में कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया। उन्होंने मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
श्रीकृष्ण जन्म कथा का संदेश स्पष्ट है— जब अधर्म और अत्याचार बढ़ता है, तब धर्म और सत्य की स्थापना का मार्ग भी प्रशस्त होता है। यही कारण है कि जन्माष्टमी का पर्व आज भी करोड़ों लोगों के लिए आस्था, भक्ति और आशा का प्रतीक बना हुआ है।
(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)
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