मेवाड़ में अच्छी बारिश की कामना के लिए महिलाओं ने निभाई अनोखी 'मटका फोड़' परंपरा
उदयपुर (राजस्थान): देशभर में मानसून के दौरान अच्छी वर्षा की कामना के लिए अलग-अलग धार्मिक और लोक परंपराएं निभाई जाती हैं। राजस्थान के उदयपुर जिले के मेवाड़ में भी एक ऐसी ही अनोखी परंपरा आज भी जीवित है, जिसे 'मटका फोड़' या 'मटकी फोड़' कहा जाता है। यह लोक-अनुष्ठान विशेष रूप से तब आयोजित किया जाता है, जब मानसून कमजोर पड़ जाए और क्षेत्र में अच्छी बारिश न हो। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस परंपरा के निर्वहन से वर्षा के देवता इंद्रदेव प्रसन्न होते हैं और क्षेत्र में अच्छी वर्षा होती है।
राजमाली समाज की महिलाएं निभाती हैं यह परंपरा
इस परंपरा का सबसे प्रमुख आयोजन उदयपुर के भोईवाड़ा क्षेत्र में देखने को मिलता है। यहां राजमाली समाज की महिलाएं श्रावण कृष्ण पंचमी की सुबह पारंपरिक वेशभूषा में एकत्र होकर पिछोला झील स्थित प्रसिद्ध गणगौर घाट पहुंचती हैं। सबसे पहले वे सरोवर की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं और जल स्रोतों के संरक्षण तथा भरपूर वर्षा की कामना करती हैं। पूजा के बाद घूघरी का प्रसाद अर्पित किया जाता है, जिसे शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
पूरे शहर मे फोर जाते हैं मटके
पूजन के बाद महिलाएं पानी या कई बार गंदे पानी से भरे मिट्टी के मटकों को सिर पर रखकर शहर के प्रमुख मार्गों और बाजारों की ओर निकलती हैं। महिलाएं दुकानों और सार्वजनिक स्थानों के चौखट पर इन मटकों को फोड़ती हैं। इस दौरान पारंपरिक लोकगीत भी गाए जाते हैं, जिससे पूरा वातावरण धार्मिक और सांस्कृतिक रंग में रंग जाता है।
इस अनुष्ठान के पीछे कई रोचक कहानियाँ
इस अनुष्ठान के पीछे कई रोचक लोकमान्यताएं जुड़ी हुई हैं। सबसे प्रमुख विश्वास यह है, कि मटके फोड़ने से इंद्रदेव प्रसन्न होकर झमाझम बारिश करते हैं। वहीं एक अन्य स्थानीय मान्यता के अनुसार, जब दुकानों के सामने गंदा पानी फैलने और मटके टूटने से दुकानदार नाराज नहीं होते हैं, तो इंद्रदेव मेवाड़ मे बारिश करवाते हैं। इसके बाद इंद्रदेव अपनी खुशी वर्षा के रूप में प्रकट करते हैं और क्षेत्र में मूसलाधार बारिश होती है।
मेवाड़ की अनोखी परंपरा
मेवाड़ की यह परंपरा केवल वर्षा की कामना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य अकाल जैसी परिस्थितियों से मुक्ति, प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा, खेती-किसानी की समृद्धि और समाज में सुख-शांति बनाए रखने की प्रार्थना भी है। मेवाड़ की यह अनूठी लोक परंपरा लोगों की आस्था, सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति के प्रति सम्मान का जीवंत उदाहरण बनी हुई है।
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