मिथिला का अनोखा लोकपर्व आज, जानिए चौरचन की कथा, पूजा विधि और चंद्र देव की उपासना के नियम
नई दिल्ली (भारत)। भारत अपनी विविध संस्कृति और अनोखे पर्व-त्योहारों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में मनाए जाने वाले पर्व वहां की लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं। इन्हीं विशिष्ट परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है मिथिला, जहां जूर-शीतल, कोजगरा और मधुश्रावणी जैसे कई ऐसे पर्व मनाए जाते हैं, जिनकी अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है।
चंद्रदेव की पूजा से मिलती है बुद्धि, स्मरण शक्ति और मानसिक शांति
इन्हीं प्रमुख लोकपर्वों में शामिल है चौठ चंद्र, जिसे चौरचन के नाम से भी जाना जाता है। यह मिथिला का एक प्राचीन पर्व है, जिसमें चंद्रदेव की विशेष पूजा की जाती है। भारत के साथ-साथ नेपाल के मिथिला क्षेत्र में भी यह पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। चौठ चंद्र भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को चंद्रमा के उदय होने के बाद विशेष पूजा करते हैं। मान्यता है कि चंद्रदेव की पूजा करने से बुद्धि, स्मरण शक्ति और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
गणेश चतुर्थी से अलग है मिथिला की परंपरा
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भारत के अधिकांश हिस्सों में गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा की जाती है। वहीं, मिथिला में इसी तिथि को चौठ चंद्र (चौरचन) पर्व मनाने की परंपरा है। जहां गणेश चतुर्थी से जुड़ी मान्यता में इस दिन चंद्रमा के दर्शन नहीं करने की बात कही जाती है, वहीं मिथिला में इसी शाम चंद्रदेव की विशेष पूजा करके उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। यही विशेष परंपरा चौठ चंद्र को देश के अन्य पर्वों से अलग पहचान देती है।
चंद्रदेव को गणेश जी ने क्यों दिया था श्राप?
चौठ चंद्र से जुड़ी लोकमान्यता को समझने के लिए भगवान गणेश और चंद्रदेव की कथा का उल्लेख किया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान गणेश भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को स्वर्ग से धरती पर अपने भक्तों से मिलने आ रहे थे। उस समय चंद्रदेव को अपने रूप और सुंदरता पर अहंकार हो गया था। कहा जाता है, कि चंद्रदेव ने भगवान गणेश के गजमुख और उनके वाहन मूषक का उपहास किया। उनके उपहास से गणेश जी क्रोधित हो गए।
इसी दौरान चंद्रदेव ने अपना प्रकाश भी गायब कर दिया, जिससे अचानक अंधकार हो गया। अंधेरा होने के कारण भगवान गणेश का वाहन मूषक एक पत्थर से टकरा गया और भगवान गणेश गिर पड़े। इस दृश्य को देखकर चंद्रदेव जोर से हंस पड़े। चंद्रदेव के इस व्यवहार से नाराज होकर भगवान गणेश ने उन्हें श्राप दिया कि जो भी व्यक्ति इस तिथि को चंद्रमा के दर्शन करेगा, उसे मिथ्या कलंक का सामना करना पड़ सकता है।
बाद में चंद्रदेव ने भगवान गणेश से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर गणेश जी ने श्राप को आंशिक रूप से समाप्त किया और कहा कि यदि कोई व्यक्ति भूलवश या अनजाने में चंद्रमा के दर्शन कर लेता है तो उस पर इस श्राप का प्रभाव नहीं होगा। इसी कथा से जुड़ी मान्यता के कारण भारत के कई हिस्सों में गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन से बचने की परंपरा बनी। वहीं मिथिला में चंद्रदेव की पूजा और दर्शन के साथ चौठ चंद्र पर्व मनाया जाता है।
मिथिला में कैसे शुरू हुआ चौठ चंद्र?
चौठ चंद्र की शुरुआत को लेकर मिथिला में एक प्रसिद्ध लोककथा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार इस पर्व की शुरुआत 16वीं शताब्दी में हुई थी। कहा जाता है, कि उस समय मिथिला में हेमागंद ठाकुर का राज था, जबकि भारत में मुगल बादशाह अकबर का शासन था। लोककथा के अनुसार हेमानंद ठाकुर ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने और कर देने से इनकार कर दिया था। इससे नाराज होकर अकबर ने उन्हें मंदिर जाने के रास्ते से गिरफ्तार करवा लिया। उन्हें एक ऐसी जेल में रखा गया, जिसकी छत पर केवल एक छोटा-सा छेद था। कथा के अनुसार उन्हें दो दिनों में केवल एक बार भोजन और पानी दिया जाता था।
जेल में चंद्रमा को देखकर मांगी थी मन्नत
कहा जाता है, कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को जेल की छत के उस छोटे से छेद से हेमानंद ठाकुर की नजर चंद्रदेव पर पड़ी।उन्होंने मन ही मन चंद्रदेव से कहा कि चंद्रमा के दर्शन करने से लोगों को कष्ट प्राप्त होने की मान्यता है, लेकिन वे पहले से ही कष्ट में हैं। यदि चंद्रदेव की कृपा से उन्हें इस संकट से मुक्ति मिलती है तो वे मिथिला में चंद्रदेव की पूजा शुरू करेंगे। इसके बाद जेल में रहते हुए उन्होंने ‘ग्रहण माला’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें आने वाले 500 वर्षों में होने वाले सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण का विवरण दिया गया था।
अकबर ने कराई ग्रंथ की जांच
जब अकबर को हेमानंद ठाकुर द्वारा लिखे गए इस ग्रंथ के बारे में जानकारी मिली तो उसने ग्रंथ को अपने पास मंगवाया और अपने दरबार के नवरत्नों से ग्रंथ की जांच कराई। जांच में ग्रंथ में दी गई गणनाएं सटीक पाई गईं। हेमानंद ठाकुर की इस विलक्षण प्रतिभा से प्रभावित होकर अकबर ने उन्हें कैद से रिहा कर दिया और राजकीय सम्मान के साथ मिथिला वापस भेज दिया। जब हेमानंद ठाकुर मिथिला पहुंचे तो उस दिन फिर से भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी थी। उनकी पत्नी हेमलता ने कहा—“आज मिथिला का चंद्र कलंक मुक्त हुआ है। आज हम पूरे विधि-विधान से चंद्रदेव की पूजा करेंगे।” इसके बाद हेमानंद ठाकुर ने पुरोहितों और ज्योतिषाचार्यों से पूजा की विधि को लेकर चर्चा की और चंद्रदेव की पूजा की परंपरा शुरूआत की।
एक अन्य मान्यता में महादेव-पार्वती ने शुरू किया पर्व
चौठ चंद्र की शुरुआत को लेकर एक अन्य कथा भी प्रचलित है। इसके अनुसार भगवान गणेश के श्राप से चंद्रदेव को मुक्त कराने के लिए भगवान महादेव और माता पार्वती ने इस पर्व की शुरुआत की थी। इसी वजह से चौठ चंद्र की पूजा में भगवान चंद्रमा के साथ माता गौरी और भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा भी कई स्थानों पर देखने को मिलती है।
क्यों कहा जाता है छोटा छठ?
चौठ चंद्र को कई जगहों पर “छोटा छठ” भी कहा जाता है। इसके पीछे इसकी पूजा पद्धति में छठ पर्व से मिलती-जुलती परंपराएं बताई जाती हैं। इस पर्व में व्रती पूरे दिन बिना भोजन और पानी के उपवास रखते हैं। शाम को पूजा की तैयारी की जाती है और चंद्रमा के उदय होने के बाद उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। पूजा की थाली या डलिया में फल, मिठाई, दही, नारियल, पान, सुपारी आदि सजाए जाते हैं।
चौठ चंद्र की पूजा की तैयारी कैसे होती है?
चौठ चंद्र के दिन घर की विशेष साफ-सफाई की जाती है। शाम की पूजा के लिए आंगन को गाय के गोबर से लीपने की परंपरा है। इसके बाद पीठार, यानी चावल के आटे से तैयार किए गए घोल और सिंदूर की सहायता से सुंदर अरिपन बनाया जाता है। अरिपन के ऊपर कलश, पकवान, दही और पूजा में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री सजाई जाती है। शाम के समय विशेष रूप से खीर और पूरी तैयार की जाती है। इनसे एक खास प्रकार का प्रसाद तैयार किया जाता है और उसे केले के पत्ते पर सजाया जाता है। इसके बाद परिवार के लोग चंद्रमा के उदय होने की प्रतीक्षा करते हैं।
चंद्रमा के उदय के बाद होती है पूजा
चंद्रोदय के बाद चौठ चंद्र की पूजा शुरू होती है। अधिकांश स्थानों पर यह पर्व महिलाओं द्वारा किए जाने की परंपरा है। व्रती भगवान चंद्रमा के साथ माता गौरी और भगवान गणेश की पूजा करते हैं। पूजा के दौरान चंद्रदेव से संबंधित पारंपरिक गीत भी गाए जाते हैं। इस पर्व में व्रती पश्चिम दिशा की ओर मुख करके पूजा करते हैं। इसके बाद चंद्रदेव को फल, मिठाई और अन्य प्रसाद से उसी प्रकार अर्घ्य देने की परंपरा है, जैसे छठ पर्व में सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है।
घर के बच्चे की भी होती है विशेष भूमिका
चौठ चंद्र की पूजा में घर के बालक की भूमिका भी विशेष मानी जाती है। पूजा के अंत में घर के बच्चे द्वारा खीर वाले प्रसाद को दो हिस्सों में बांटने की परंपरा है। पूजा समाप्त होने के बाद व्रती और परिवार के सदस्य हाथों में अलग-अलग फल लेकर चंद्रमा को प्रणाम करते हैं। इसके बाद चंद्रदेव से प्रार्थना की जाती है कि वे परिवार के सदस्यों को मिथ्या दोष से बचाए रखें और घर-परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। पूजा पूर्ण होने के बाद व्रत का पारण किया जाता है और प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
चौठ चंद्र का सामाजिक महत्व
चौठ चंद्र केवल धार्मिक पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि यह मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। आधुनिक समय में जब पारंपरिक रीति-रिवाजों से नई पीढ़ी का जुड़ाव कई जगह कम होता जा रहा है, ऐसे पर्व लोगों को अपनी जड़ों, संस्कारों और लोकपरंपराओं से जोड़ने का काम करते हैं।
इस पर्व के दौरान लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। कई परिवार ऐसे भी होते हैं जहां किसी कारण से चौठ चंद्र की पूजा नहीं हो पाती। ऐसे में आसपास के लोग उनके घर प्रसाद पहुंचाते हैं। कई स्थानों पर सामूहिक रूप से भी चौठ चंद्र की पूजा आयोजित की जाती है। इससे समाज में प्रेम, सम्मान, सहयोग और सामूहिकता की भावना मजबूत होती है।
भारत के साथ नेपाल में भी मनाया जाता है पर्व
चौठ चंद्र की परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं है। नेपाल के मिथिला क्षेत्र में भी इस पर्व को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। सीमा के दोनों ओर रहने वाले मैथिल परिवारों के लिए यह पर्व अपनी सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक जीवनशैली से जुड़ने का अवसर होता है।
मिथिला की पहचान है चौठचंद्र
मिथिला के पर्वों की खासियत यह है कि इनमें धार्मिक आस्था के साथ लोकसंस्कृति, पारिवारिक संबंध और सामुदायिक जीवन की झलक भी देखने को मिलती है। चौठ चंद्र इसी परंपरा का एक सुंदर उदाहरण है। जहां एक ओर इसमें चंद्रदेव की पूजा और मिथ्या दोष से जुड़ी धार्मिक मान्यता है, वहीं दूसरी ओर अरिपन, पारंपरिक पकवान, लोकगीत और सामूहिक पूजा इसे विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान प्रदान करते हैं।
(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)
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