हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखने वाला पितृपक्ष आज स

पितृपक्ष आज से शुरू: 16 दिनों तक चलेगा तर्पण और पिंडदान का सिलसिला, जानें क्या करें और क्या नहीं

PitruPaksha Begins Today

नई दिल्ली (भारत)। हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं। मान्यता है कि इन दिनों पितरों का स्मरण करने और विधि-विधान से श्राद्ध करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

भाद्रपद पूर्णिमा से पितृपक्ष की शुरुआत

पितृपक्ष की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा से मानी जाती है और इसके बाद आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। इस अवधि में अलग-अलग तिथियों पर दिवंगत परिजनों का श्राद्ध किया जाता है। पितृपक्ष की अंतिम तिथि को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है।

पितृपक्ष में क्यों किया जाता है श्राद्ध?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का समय है। इस दौरान परिवार के लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों का स्मरण करते हैं। तर्पण में जल अर्पित किया जाता है, जबकि श्राद्ध कर्म में पिंडदान और भोजन आदि की परंपरा निभाई जाती है। मान्यता है, कि श्रद्धा के साथ किया गया श्राद्ध पितरों को संतुष्टि प्रदान करता है। यही कारण है कि देशभर में लोग अपने पैतृक स्थानों, तीर्थस्थलों और विशेष रूप से गया जी जैसे पितृतीर्थों पर पहुंचकर पिंडदान करते हैं।

गया में पिंडदान का विशेष महत्व

बिहार के गया को पितृश्राद्ध और पिंडदान के प्रमुख तीर्थों में माना जाता है। यहां फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, सीता घाट और अक्षयवट जैसे स्थानों पर पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। धार्मिक कथा के अनुसार, भगवान राम और माता सीता ने गया में महाराज दशरथ का पिंडदान किया था। इसी कथा के कारण गया की पितृ परंपरा को माता सीता और भगवान राम से भी जोड़ा जाता है।

पितृपक्ष में क्या करें?

पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार ये कार्य कर सकते हैं—

  • पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें।
  • श्राद्ध की निर्धारित तिथि पर तर्पण और पिंडदान करें।
  • जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं।
  • ब्राह्मण भोजन और दान की परंपरा निभाएं।
  • गाय, कौआ और अन्य जीवों को भोजन कराने की भी परंपरा है।
  • अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करें।
  • घर में पितरों का स्मरण करते हुए शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखें।

इन बातों का रखें ध्यान

पितृपक्ष को श्रद्धा और संयम का समय माना जाता है। इसलिए इस दौरान परिवार की परंपरा और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध कर्म करना उचित माना जाता है। यदि किसी विशेष तिथि पर श्राद्ध करना है तो स्थानीय पंचांग या विद्वान से तिथि की पुष्टि कर लेना चाहिए। पितृपक्ष केवल कर्मकांड का समय नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर भी माना जाता है।

(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)

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