संक्रांति और पूर्णिमा में क्या है अंतर? जानिए इन दोनों दिनों से महीने के समापन का क्या है संबंध
नई दिल्ली (भारत)। हिंदू पंचांग में संक्रांति और पूर्णिमा दोनों का विशेष धार्मिक महत्व है, लेकिन इन दोनों का आधार अलग-अलग है। एक ओर संक्रांति का संबंध सूर्य की राशि परिवर्तन से है, तो दूसरी ओर पूर्णिमा का संबंध चंद्रमा की कला और तिथि से है। यही कारण है, कि हिंदू कैलेंडर में महीने की गणना अलग-अलग परंपराओं के अनुसार की जाती है।
क्या होती है संक्रांति?
जब सूर्य एक राशि से निकलकर दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उस घटना को संक्रांति कहा जाता है। सूर्य के 12 राशियों में प्रवेश के कारण साल में कुल 12 संक्रांतियां होती हैं। जैसे सूर्य के मकर राशि में प्रवेश को मकर संक्रांति कहा जाता है। संक्रांति मुख्य रूप से सौर गणना पर आधारित होती है।
संक्रांति पर महीने का समापन क्यों?
सौर पंचांग में महीने का निर्धारण सूर्य की राशि के आधार पर किया जाता है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते ही पुराना सौर मास समाप्त और नया सौर मास शुरू माना जाता है। इसलिए संक्रांति सौर मास के परिवर्तन का आधार बनती है।इसलिए जिस क्षेत्र या पंचांग परंपरा में सौर मास माना जाता है, वहां सूर्य के राशि परिवर्तन के साथ एक सौर महीने का अंत और दूसरे महीने की शुरुआत मानी जाती है।
पूर्णिमा क्या होती है?
जब चंद्रमा पृथ्वी से देखने पर पूरी तरह प्रकाशित दिखाई देता है, उस दिन की तिथि को पूर्णिमा कहा जाता है। हिंदू पंचांग में प्रत्येक चंद्र मास में एक पूर्णिमा आती है। पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष शुरू होता है और अगली अमावस्या तक चलता है। पूर्णिमा का संबंध चंद्रमा की गति और तिथियों से है। इसलिए पूर्णिमा की तारीख हर महीने एक जैसी नहीं होती।
पूर्णिमा पर महीने का समापन क्यों?
यह समझना जरूरी है कि हिंदू पंचांग में मास की गणना की अलग-अलग पद्धतियां हैं। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में प्रचलित परंपराओं में महीना पूर्णिमा के बाद समाप्त माना जाता है और अगला महीना शुरू हो जाता है। उदाहरण के लिए, पूर्णिमा के अगले दिन से नया चंद्र मास माना जाता है।
वहीं अमांत परंपरा में महीना अमावस्या के बाद समाप्त होता है और उसके अगले दिन नया महीना शुरू होता है। दक्षिण भारत के कई हिस्सों में अमांत मास की परंपरा अधिक प्रचलित है।
दोनों में मुख्य अंतर
संक्रांति — सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश पर आधारित है और इसका संबंध सौर मास से है।
पूर्णिमा — चंद्रमा की पूर्ण अवस्था और पूर्णिमा तिथि पर आधारित है तथा इसका संबंध चंद्र मास से है।
इस प्रकार संक्रांति और पूर्णिमा दोनों को महीने के परिवर्तन से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इनके पीछे सूर्य और चंद्रमा की अलग-अलग गणना पद्धतियां काम करती हैं। यही भारतीय पंचांग की विशेषता है कि यहां सूर्य, चंद्रमा और उनकी गतियों के आधार पर समय और महीनों की गणना की समृद्ध परंपरा विकसित हुई है।
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