शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर 2026 से आरंभ हो रही है,

शारदीय नवरात्रि 2026: 11 अक्टूबर से शुरू होगी मां दुर्गा की आराधना, जानिए कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Sharad Navratri 2026

नई दिल्ली। सनातन धर्म में माता आदिशक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। माता आदिशक्ति ही संपूर्ण ब्रह्मांड की आदि-कारण, परम चेतना और सर्वोच्च ऊर्जा हैं। वे ही इस सृष्टि के सृजन, पालन और संहार की मूल शक्ति हैं, जिनका अस्तित्व समय और स्थान की उत्पत्ति से भी पहले से है।

देवीभागवत पुराण के अनुसार देवी हैं परम सत्य

देवीभागवत पुराण के अनुसार, त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी अपनी शक्तियां उन्हीं से प्राप्त करते हैं। चाहे वे ममतामयी मां ललिता त्रिपुरासुंदरी हों, दुष्टों का नाश करने वाली मां दुर्गा हों, या परिवर्तन की तीव्र शक्ति मां काली; आदिशक्ति का हर स्वरूप परम सत्य को दर्शाता है जो सृष्टि में संतुलन बनाए रखता है और भक्तों को मोक्ष की ओर ले जाता है।

11 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक होगी मां दुर्गा की पूजा

माता आदिशक्ति की आराधना का पावन पर्व दुर्गापूजा आरंभ होने वाला है। मां दुर्गा की आराधना का सबसे पावन पर्व शारदीय नवरात्रि इस वर्ष 11 अक्टूबर 2026, रविवार से शुरू होगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाएगी। दुर्गापूजा का समापन 21 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ होगा। पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ल प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात से शुरू होकर 11 अक्टूबर रात तक रहेगी, इसलिए उदया तिथि के आधार पर नवरात्रि का पहला दिन 11 अक्टूबर माना गया है।

मां का आगमन और प्रस्थान दोनों गजारूढ़ यानी हाथी पर

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के आरंभ और समापन के दिन के वार के आधार पर मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान के वाहन तय होते हैं। 2026 में नवरात्रि की शुरुआत रविवार से हो रही है, इसलिए मां दुर्गा का आगमन गजारूढ़ यानी हाथी पर होगा। वहीं विजयादशमी बुधवार को है, अर्थात मां का प्रस्थान भी गजारूढ़ यानी हाथी पर ही होगा। धार्मिक परंपरा में हाथी को वर्षा, समृद्धि और सुख-समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। अतः यह वर्ष अत्यंत शुभ होगा।

घटस्थापना का शुभ समय सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक

नवरात्रि के पहले दिन घर और मंदिरों में कलश स्थापना यानी घटस्थापना की जाती है। इसे नवरात्रि पूजा की शुरुआत का प्रमुख संस्कार माना जाता है। पंचांग के अनुसार 11 अक्टूबर को घटस्थापना का शुभ समय सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक रहेगा। इसकी अवधि करीब 3 घंटे 52 मिनट है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा। इस दौरान भी घटस्थापना किया जा सकता है।

बनारसी पंचांग में घटस्थापना का समय सुबह 5:54 बजे से 9:48 बजे तक

वहीं बनारसी पंचांग में घटस्थापना का समय सुबह 5:54 बजे से 9:48 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:21 बजे से दोपहर 12:08 बजे तक दिया गया है। अतः घटस्थापना से पहले अपने क्षेत्र के मान्य पंचांग में तिथि की जांच कर लें।

ऐसे करें घटस्थापना

घटस्थापना से पहले पूजा स्थान की अच्छी तरह सफाई करें। इसके बाद चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद  पूजा स्थल पर थोड़ी मिट्टी रखकर उसमें जौ के बीज बोएं। तांबे या मिट्टी के कलश में स्वच्छ जल भरें। कलश में अक्षत, सुपारी, दूर्वा और सिक्का आदि रखें। कलश के ऊपर आम का पल्लव लगाएं। उसके ऊपर नारियल रखें और कलश को मौली से बांधें। कलश को जौ के ऊपर स्थापित करें। मां दुर्गा का आह्वान करते हुए दीपक, धूप, फूल, अक्षत और नैवेद्य अर्पित करें। अंत में मां दुर्गा की आरती करें। साथ ही नवमी तक प्रत्येक दिन जौ के बिज में जल अर्पित करें।

प्रत्येक दिन मां के अलग-अलग स्वरूप की होगी पूजा

नवरात्रि में प्रत्येक दिन मां के अलग-अलग स्वरूप की पूजा की जाती है। श्रद्धालु अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रख सकते हैं। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां को सफेद फूल, अक्षत, धूप और दीप अर्पित कर पूजा करें। इस दिन घटस्थापना भी की जाती है। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। भक्त मां को फूल, फल और नैवेद्य अर्पित करके संयम और साधना का संकल्प लेते हैं। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होती है। देवी को सुगंधित फूल और भोग अर्पित कर आरती की जाती है। चौथे दिन मां कूष्मांडा की आराधना की जाती है। इस दिन विशेष रूप से सात्त्विक भोजन और फल का भोग लगाया जा सकता है। पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। भक्त संतान और परिवार की सुख-शांति की कामना से देवी की आराधना करते हैं। छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है। देवी को लाल या पीले पुष्प अर्पित कर दुर्गा मंत्रों का जाप किया जाता है। सातवें दिन मां कालरात्रि की आराधना होती है। देवी को गुड़ का भोग लगाकर दीप और धूप अर्पित करने की परंपरा है। महाअष्टमी पर मां महागौरी की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर इसी दिन कन्या पूजन और हवन किया जाता है। महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। कई परिवार इस दिन कन्या पूजन, हवन और विशेष भोग के साथ नवरात्रि व्रत का समापन करते हैं।

प्रतिदिन करें देवी के विभिन्न मंत्रों का पाठ

प्रतिदिन देवी पुराण, देवी भागवत, दुर्गा सप्तशती या दुर्गा मंत्रों का पाठ अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार करें। शाम को भी दीपक जलाकर मां की आरती करें। यदि सुबह संभव ना हो, तो शाम के समय भी पाठ किया जा सकता है। व्रत रखने वाले लोग अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार या सात्त्विक भोजन कर सकते हैं। भोजन को लेकर परिवार और क्षेत्र की परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं। अतः अपनी परंपरा के अनुसार ही भोजन करें।

महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी को विशेष पूजा

नवरात्रि की महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी को विशेष पूजा का दिन माना जाता है। इन दिनों कई घरों में कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर भोजन कराया जाता है। कन्या पूजन के बाद उन्हें फल, मिठाई, वस्त्र, दक्षिणा आदि भेंट करने की परंपरा है। नवमी के दिन हवन और कन्या पूजन के साथ नवरात्रि का समापन किया जाता है। दशमी की तिथि को विजयादशमी मनाई जाएगी। यह पर्व मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय और भगवान राम की रावण पर विजय की स्मृति से जुड़ा है, साथ ही इस दिन मां दुर्गा को विदाई दी जाएगी।

(Script: Aashutosh kumar jha)

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