तारापीठ में मां तारा की अनूठी रथ यात्रा, वर्षों से निभाई जा रही है अद्भुत परंपरा
तारापीठ (पश्चिम बंगाल)। देशभर में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा श्रद्धा और उत्साह के साथ निकाली जाती है। वहीं पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ तारापीठ में इसी दिन एक अनोखी और दुर्लभ परंपरा निभाई जाती है। यहां भगवान जगन्नाथ के स्थान पर महाकाली के स्वरूप मानी जाने वाली मां तारा भव्य रथ पर सवार होकर अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए नगर भ्रमण पर निकलती हैं। इस विशेष अवसर पर हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन और रथ खींचने के लिए दूर-दूर से तारापीठ पहुंचते हैं।
बामाखेपा ने पहली बार खींचा था मां तारा का रथ
मां तारा की रथ यात्रा का इतिहास वर्षों पुराना माना जाता है। मान्यता है, कि तारापीठ के महान सिद्ध संत बामाखेपा ने अपने हाथों से पहली बार मां तारा के रथ की रस्सी खींचकर इस दिव्य यात्रा का शुभारंभ किया था। तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है और हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को पूरे धार्मिक विधि-विधान के साथ आयोजित की जाती है।
समय के साथ बदला रथ का स्वरूप
समय के साथ रथ यात्रा के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है। प्रारंभिक वर्षों में मां तारा की प्रतिमा को चानन काठ (चंदन की लकड़ी) के रथ पर विराजमान कर नगर भ्रमण कराया जाता था, लेकिन अब उन्हें सुंदर नक्काशी से सुसज्जित भव्य पीतल के रथ पर विराजमान किया जाता है। रथ पर सवार मां तारा की एक झलक पाने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है और पूरा तारापीठ क्षेत्र जयकारों से गूंज उठता है।
होता है मां का भव्य श्रृंगार
रथ यात्रा के दिन सुबह से ही मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं। मां तारा का लाल रंग की बनारसी साड़ी तथा सोने-चांदी के आभूषणों से भव्य श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद उन्हें पांच प्रकार की मिठाइयों, मौसमी फलों और विशेष रूप से गरमा-गरम जलेबी का महाभोग अर्पित किया जाता है।
शंखनाद, ढाक और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच नगर भ्रमण करती हैं मां
दोपहर बाद शंखनाद, ढाक और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच मां तारा का रथ मंदिर के गर्भगृह से निकलकर नगर भ्रमण पर रवाना होता है। श्रद्धालु पूरे मार्ग में भक्ति गीत गाते हुए रथ की रस्सी खींचते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मां तारा के रथ की रस्सी खींचने वाले भक्तों के पाप नष्ट होते हैं, जीवन के कष्ट दूर होते हैं और देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के बीच बताशा और पेड़ा प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
आषाढ़ शुक्ल दशमी को उल्टा रथ का आयोजन
जगन्नाथ रथ यात्रा की तरह ही तारापीठ में भी आषाढ़ शुक्ल दशमी को उल्टा रथ (बहुदा यात्रा) का आयोजन होता है। इस दिन मां तारा पुनः अपने भव्य रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण करती हुई मंदिर के गर्भगृह में विराजमान होती हैं। धार्मिक आस्था, प्राचीन परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का यह अद्भुत संगम हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को तारापीठ की ओर आकर्षित करता है।
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