नागों को माता कद्रू ने क्यों दिया था श्राप? जानिए कैसे आस्तीक मुनि ने नागवंश का किया उद्धार
नई दिल्ली (भारत)। हिंदू पौराणिक कथाओं में नागों की उत्पत्ति और उनके उद्धार की कहानी महाभारत के आदिपर्व के आस्तीक पर्व में मिलती है। कथा के अनुसार नागों की माता कद्रू ने अपने ही पुत्रों को जिंदा आग में जलकर मरने का श्राप दिया था। आगे चलकर इसी श्राप के कारण राजा जनमेजय ने सर्पयज्ञ कराया और हजारों नागों के जीवन पर संकट आ गया।
उच्चैःश्रवा के कारण शुरू हुआ विवाद
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता कद्रू और उनकी माता विनता के बीच दिव्य घोड़े उच्चैःश्रवा के रंग को लेकर शर्त लगी। माता विनता का कहना था, कि उच्चैःश्रवा पुरा सफेद है और माता कद्रू का कहना था, की उसकी पुंछ काली है। माता कद्रू ने अपने पुत्रों से कहा, कि घोड़े की पूंछ से लिपटकर उसे काला दिखा दें, जिससे शर्त में उनकी जीत हो और विनता उनकी दासी बन जाए।
कई नाग पुत्रों ने मां के छल में साथ देने से इनकार कर दिया। इसी बात से क्रोधित होकर कद्रू ने उन्हें श्राप दिया कि वे जीवित रूप में ही अग्नि में भस्म हो जाएंगे। महाभारत की कथा में बताया गया है, कि नागों की संख्या बहुत बढ़ गई थी और उनके विष तथा हिंसक स्वभाव से प्राणियों को खतरा पैदा हो रहा था। इसलिए ब्रह्मा ने नागों के पिता ऋषि कश्यप को समझाया कि नागों के विनाश का विधान पहले से ही निर्धारित था।
महादेव का वरदान
श्राप सुनकर नागराज वासुकि और अन्य नाग चिंतित हो गए। वे इस संकट से अपने भाइयों को बचाने के लिए महादेव के पास गए।महादेव ने बताया, कि ऋषि जरत्कारु और नागकन्या जरत्कारु (मनसा/विषहरा) के पुत्र आस्तीक भविष्य में नागवंश को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
राजा जनमेजय ने क्यों कराया सर्पयज्ञ?
आगे चलकर राजा जनमेजय के पिता राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हुई। पिता की मृत्यु से क्रोधित जनमेजय ने नागों से बदला लेने के लिए सर्पयज्ञ कराने का निर्णय लिया। यज्ञ में मंत्रों के प्रभाव से नाग अग्निकुंड में गिरने लगे।
आस्तीक मुनि ने ऐसे किया नागों का उद्धार
जब सर्पयज्ञ अपने चरम पर पहुंचा, तब नागराज वासुकि ने आस्तीक से नागों की रक्षा करने का आग्रह किया। आस्तीक यज्ञस्थल पर पहुंचे और अपने ज्ञान तथा मधुर वचनों से राजा जनमेजय को प्रसन्न किया। जनमेजय ने आस्तीक को वरदान मांगने के लिए कहा। आस्तीक ने सर्पयज्ञ बंद करने और नागों को बचाने का वर मांगा। राजा ने आस्तीक की बात मान ली और सर्पयज्ञ रोक दिया गया। इस तरह वासुकि, शेषनाग और तक्षक सहित बचे हुए नागों का जीवन बच गया।
नागों के उद्धार की कथा देती है बड़ा संदेश
पौराणिक कथा में आस्तीक को नागवंश के रक्षक के रूप में याद किया जाता है। उनकी बुद्धिमत्ता और शांतिपूर्ण प्रयासों ने प्रतिशोध की भावना से चल रहे यज्ञ को रोक दिया। इसी कारण आस्तीक की कथा नाग पूजा और नाग पंचमी से जुड़ी लोकपरंपराओं में भी विशेष महत्व रखती है।
(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध ग्रंथों पर आधारित है।)
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