छत्तीसगढ़ के पूर्वी भाग में स्थित ऐतिहासिक सुअरमार

सुअरमार गढ़ में मकान की खुदाई में मिला स्वर्ण रंग का धातु अवशेष, वैज्ञानिक जांच से खुलेगा प्राचीन रहस्य

गढ़ की खुदाई में मिला स्वर्ण रंग का धातु अवशेष

महासमुंद: छत्तीसगढ़ के पूर्वी भाग में स्थित ऐतिहासिक सुअरमार गढ़ क्षेत्र में मकान निर्माण के दौरान स्वर्ण रंग का धातु अवशेष मिलने से क्षेत्र के पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक महत्व को लेकर नई जिज्ञासा पैदा हो गई है। कोमाखान क्षेत्र के निवासी विजय कुमार पांडे के मकान निर्माण के दौरान करीब तीन फीट की गहराई में खुदाई करने पर यह धातु खंड मिला। प्राप्ति स्थल से काली मिट्टी और पुरानी खपरैल के अवशेष भी मिले हैं।

चपटा और अनियमित आकार का है धातु अवशेष

प्राप्त धातु वस्तु चपटी और अनियमित आकार की है। इसकी सतह पर दबाव और मोड़ के निशान दिखाई देते हैं। प्रथम दृष्टया यह हथौड़े से पीटकर तैयार की गई धातु पट्टिका अथवा पत्र जैसी प्रतीत होती है। स्थानीय स्तर पर इसे स्वर्ण धातु का अवशेष माना जा रहा है, हालांकि इसकी वास्तविक धातु संरचना की पुष्टि अभी वैज्ञानिक परीक्षण से नहीं हुई है।

वैज्ञानिक जांच से खुलेगा राज

विशेषज्ञ परीक्षण के बाद ही यह निर्धारित किया जा सकेगा कि यह स्वर्णपत्र, आभूषण का कोई हिस्सा, धार्मिक प्रतिमा या राजकीय अलंकरण का अंश है अथवा प्राचीन धातु शिल्प से जुड़ी कोई अन्य वस्तु। इसके लिए एक्स-रे फ्लोरेसेंस (XRF) अथवा अन्य वैज्ञानिक परीक्षण उपयोगी हो सकते हैं।

पुरानी खपरैल और काली मिट्टी भी मिली

पुरानी खपरैल और काली मिट्टी की मौजूदगी से यह संभावना जताई जा रही है कि यह स्थान अतीत में किसी आवासीय या संरक्षित परिसर का हिस्सा रहा होगा। हालांकि, केवल इन अवशेषों के आधार पर स्थल का निश्चित काल निर्धारित करना उचित नहीं होगा।

वैज्ञानिक पुरातात्त्विक सर्वेक्षण की मांग

इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोगों का कहना है कि सुअरमार गढ़ क्षेत्र में व्यवस्थित और वैज्ञानिक पुरातात्त्विक सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए। प्राप्त धातु अवशेष का वैज्ञानिक परीक्षण करने के साथ उसके प्राप्ति स्थल की स्तरीय खुदाई, आसपास मिले खपरैल, मिट्टी और अन्य पुरावशेषों का दस्तावेजीकरण और संरक्षण भी जरूरी है।

प्राचीन काल से जुड़े होने की संभावना

प्राप्त अवशेषों को देखते हुए कुछ लोगों ने इसे मध्यकालीन अथवा उससे भी प्राचीन काल से संबंधित होने की संभावना जताई है। हालांकि, इसका वास्तविक काल और महत्व विशेषज्ञ पुरातत्वविदों की जांच तथा वैज्ञानिक परीक्षण के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

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