2.4 करोड़ वर्ष पुराने केवड़े के जीवाश्म की ऐतिहासिक खोज
नई दिल्ली: यह कथन Geobios पत्रिका में जुलाई 2026 में प्रकाशित एक बेहद महत्वपूर्ण पुरावनस्पतिक (Paleobotanical) अध्ययन से संबंधित है। लखनऊ स्थित विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) के वैज्ञानिकों हर्षिता भाटिया और गौरव श्रीवास्तव द्वारा किए गए इस शोध ने केवड़े के पौधे (पैंडनस फैसिक्युलरिस) के इतिहास को लेकर एक ऐतिहासिक खुलासा किया है।
असम से मिले 2.4 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म
स्थान: वैज्ञानिकों को असम के माकुम कोयला क्षेत्र (टिकाक पर्वत संरचना) से आधुनिक केवड़े के पत्तों से उल्लेखनीय रूप से मेल खाती हुई चार संरक्षित जीवाश्म पत्तियाँ मिलीं। शारीरिक संरचना की समानता: जीवाश्म पत्तियों के रूपात्मक और सूक्ष्मदर्शी (Microscopic) विश्लेषण से पता चला कि इनमें लंबी तलवार के आकार की पत्तियां, समानांतर नसें और विशिष्ट किनारे वाले कांटे मौजूद हैं। यह हूबहू आज के आधुनिक केवड़े जैसे ही हैं। समय काल: यह खोज प्रमाणित करती है कि केवड़ा भारतीय उपमहाद्वीप में कम से कम 2.4 करोड़ वर्षों से अस्तित्व में है। यह समय मानव सभ्यता और हिमालय के निर्माण के भी पहले का है।
विकासवादी इतिहास की 'मिसिंग लिंक' हुई पूरी
वैश्विक वितरण: पैंडनस (केवड़ा) परिवार के 85 से 66 मिलियन वर्ष पुराने जीवाश्म इतिहास बताते हैं कि यह कभी उत्तरी गोलार्ध (यूरोप और उत्तरी अमेरिका) में व्यापक रूप से फैला हुआ था। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: लगभग 34 मिलियन वर्ष पहले जब वैश्विक जलवायु ठंडी होने लगी, तो यह पौधा उत्तरी गोलार्ध के कई क्षेत्रों से पूरी तरह विलुप्त हो गया और केवल उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गया। कमी की पूर्ति: असम से मिले इन जीवाश्मों ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका के करोड़ों साल पुराने अभिलेखों को उष्णकटिबंधीय एशिया और ऑस्ट्रेलिया के आधुनिक अभिलेखों से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण 'मिसिंग लिंक' को पूरा कर दिया है।
भारत बना प्राचीन पौधों की सुरक्षित शरणस्थली
शोध से यह साबित होता है कि जब हिमयुग और वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के अधिकांश हिस्सों से यह पौधा खत्म हो रहा था, तब भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन उष्णकटिबंधीय जंगलों ने एक जीवनरक्षक 'शरणस्थली' (Refugium) की भूमिका निभाई। भारत की अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण केवड़े का यह प्राचीन वंश यहाँ जीवित बच सका।
आधुनिक प्रजातियों और जीवाश्मों से हुई विस्तृत तुलना
वैज्ञानिकों ने जीवाश्मों की तुलना हर्बेरिया और वानस्पतिक डेटाबेस में संरक्षित आधुनिक केवड़ा प्रजातियों के साथ-साथ दुनिया के विभिन्न हिस्सों से पहले से दर्ज जीवाश्म अभिलेखों से की। विश्वभर की आधुनिक प्रजातियों और जीवाश्म अभिलेखों के साथ विस्तृत तुलना से केवड़ा परिवार (पैंडानेसी) से उनकी समानता की पुष्टि हुई। इससे पता चलता है कि मनुष्यों के पृथ्वी पर आने से लाखों वर्ष पहले ही इस प्राचीन पादप वंश की उत्पत्ति भारत में हो चुकी थी।
भूवैज्ञानिक और पुराजलवायु साक्ष्यों से मिला मजबूत आधार
इन पौधों के विकासवादी इतिहास और प्राचीन पर्यावरण के पुनर्निर्माण के लिए भूवैज्ञानिक, पुरावनस्पति विज्ञान और पुराजलवायु संबंधी साक्ष्यों को एकीकृत किया गया। आज पैंडनस मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक ही सीमित है। हालांकि, यूरोप और उत्तरी अमेरिका से प्राप्त 85–66 मिलियन वर्ष पुराने जीवाश्म प्रमाण बताते हैं कि यह पौधा कभी उत्तरी गोलार्ध में कहीं अधिक व्यापक रूप से फैला हुआ था। लगभग 34 मिलियन वर्ष पहले वैश्विक जलवायु के ठंडा होने के साथ, यह पौधा धीरे-धीरे कई क्षेत्रों से लुप्त हो गया और उष्णकटिबंधीय इलाकों तक ही सीमित रह गया। असम से मिले जीवाश्म यह दर्शाते हैं कि भारत एक महत्वपूर्ण शरणस्थल था, जहाँ यह प्राचीन वंश जीवित रहा जबकि दुनिया के कई अन्य हिस्सों से विलुप्त हो गया।
शोध का निष्कर्ष और महत्व
Geobios पत्रिका में प्रकाशित इस खोज ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका (85–66 मिलियन वर्ष पूर्व) के पुराने जीवाश्म अभिलेखों को उष्णकटिबंधीय एशिया और ऑस्ट्रेलिया के नए अभिलेखों से जोड़कर इस पादप परिवार के विकासवादी इतिहास में एक महत्वपूर्ण कमी को पूरा किया है। यह अध्ययन वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राचीन उष्णकटिबंधीय पौधों के वंशों के लिए भारत की एक महत्वपूर्ण शरणस्थली के रूप में भूमिका को भी उजागर करता है। इससे स्पष्ट होता है कि केवड़ा भारतीय वनस्पति का कोई नया घटक नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में इसका बेहद समृद्ध और गहरा विकासवादी इतिहास रहा है। इन निष्कर्षों से उष्णकटिबंधीय पौधों, भारतीय जैव विविधता के विकास और अतीत में पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया को समझने में नई दिशा मिलेगी, जो भविष्य में जैव विविधता संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र के अध्ययन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी।
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