वैज्ञानिकों द्वारा विकसित PLATON तकनीक लाइट-फील्ड

वैज्ञानिकों ने बनाया PLATON कैमरा, जो अदृश्य कणों को 3D में ट्रैक कर सकेगा

Scientists Develop PLATON Camera to Track Invisible Particles in 3D

वाशिंगटन डीसी,(अमेरिका)। वैज्ञानिकों ने 'प्लेटन' (PLATON) नाम का एक नया पार्टिकल डिटेक्टर (कणों का पता लगाने वाला यंत्र) बनाया है। यह तकनीक लाखों छोटे-छोटे कल-पुर्जों की जगह सिर्फ एक ठोस ब्लॉक (टुकड़े) से काम चला सकती है। एक खास 'लाइट-फील्ड कैमरा', बेहद संवेदनशील लाइट सेंसर्स और AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मदद से यह कैमरा न दिखने वाले कणों के रास्तों को पलक झपकते ही बिल्कुल साफ 3D तस्वीर में बदल देता है।

आज के सबसे बेहतरीन डिटेक्टर्स को टक्कर दे सकता है यंत्र

कंप्यूटर जांच (सिमुलेशन) से पता चलता है कि यह नया तरीका आज के सबसे बेहतरीन डिटेक्टर्स को टक्कर दे सकता है या उनसे भी बेहतर काम कर सकता है। साथ ही, इसे बनाना और बड़ा करना बहुत आसान है। इस तकनीक से भविष्य में मेडिकल फील्ड के PET स्कैन भी पहले से कहीं ज्यादा साफ और सटीक हो सकेंगे। यह तकनीक ब्रह्मांड के उन रहस्यों को सुलझाने में बहुत मददगार साबित हो सकती है, जिन्हें खोजना बहुत मुश्किल होता है—जैसे कि 'न्यूट्रिनो' और 'डार्क मैटर' के कण। ये कण आम चीजों से बहुत कम टकराते हैं, इसलिए इन्हें पकड़ना नामुमकिन सा होता है।

मौजूदा डिटेक्टर्स इतने जटिल क्यों होते हैं?

ज्यादातर साइंस एक्सपेरिमेंट्स में वैज्ञानिकों को यह देखना होता है कि छोटे-छोटे परमाणु कण किसी ठोस चीज के अंदर से गुजरते हुए किस रास्ते से गए।

चमक से पहचान: इसके लिए एक खास मटेरियल (scintillator) का इस्तेमाल होता है। जब कोई चार्ज्ड पार्टिकल (कण) इसमें से गुजरता है, तो वहां रोशनी की हल्की सी चमक पैदा होती है। वैज्ञानिक इसी चमक को देखकर पता लगाते हैं कि कण कहाँ गया।

लाखों पुर्जों का झंझट: अभी तक सटीक जगह का पता लगाने के लिए इस मटेरियल को लाखों छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटना पड़ता है और हर टुकड़े से रोशनी को बाहर लाने के लिए ऑप्टिकल फाइबर (बारीक तार) जोड़ने पड़ते हैं।

बढ़ता खर्च और सिरदर्दी: उदाहरण के लिए, जापान के एक बड़े एक्सपेरिमेंट में 20 लाख छोटे क्यूब्स और 60,000 फाइबर तारों का इस्तेमाल किया गया है। जैसे-जैसे एक्सपेरिमेंट्स बड़े हो रहे हैं, लाखों पुर्जों को एक-एक करके जोड़ना और उनका डेटा संभालना वैज्ञानिकों के लिए बहुत महंगा और थका देने वाला काम बनता जा रहा है।

एक बिल्कुल नया और अनोखा तरीका

स्विट्जरलैंड के (ETH Zurich और EPFL) संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का एक तोड़ निकाला है। उन्होंने एक ऐसा प्रोटोटाइप (शुरुआती मॉडल) बनाया है जिसमें पूरे ब्लॉक को लाखों टुकड़ों में काटने की जरूरत ही नहीं है। वे एक ही बड़े और बिना कटे ब्लॉक का इस्तेमाल करते हैं और एक एडवांस कैमरे की मदद से सीधे यह भांप लेते हैं कि रोशनी का जन्म ब्लॉक के किस हिस्से से हुआ था। इस पूरी खोज को मशहूर साइंस मैगजीन Nature Communications में छापा गया है।

फोटोग्राफी तकनीक बनी विज्ञान का हथियार

यह डिटेक्टर 'प्लिनोप्टिक कैमरे' (Light Field Camera) के सिद्धांत पर काम करता है। आम कैमरा बनाम यह कैमरा: एक साधारण कैमरा सिर्फ यह रिकॉर्ड करता है कि रोशनी कितनी तेज है। लेकिन लाइट-फील्ड कैमरा यह भी देख लेता है कि रोशनी किस दिशा से आ रही है। इससे किसी भी नजारे की गहराई (3D लुक) का पता चल जाता है।

अंधेरे में भी कारगर:  इस कैमरे में हजारों छोटे-छोटे लेंस लगे होते हैं जो एक ही नजारे को अलग-अलग एंगल से देखते हैं। चूंकि कणों से निकलने वाली रोशनी बेहद धुंधली होती है, इसलिए इस कैमरे के साथ एक खास सेंसर (SPAD) लगाया गया है जो रोशनी के एक सिंगल कण (फोटॉन) को भी गिन सकता है।

AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का कमाल

इस कैमरे को और बेहतर बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने AI की मदद ली है। उन्होंने इसमें वैसी ही ट्रांसफॉर्मर तकनीक (Transformer Architecture) का इस्तेमाल किया है, जैसी आजकल चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसे बड़े लेंग्वेज मॉडल्स में इस्तेमाल होती है। लेकिन यह AI शब्दों को समझने के बजाय, रोशनी के कणों के चमकने के पैटर्न को समझता है। यह पल भर में अंदाजा लगा लेता है कि कौन सी चमक किस कण की वजह से पैदा हुई थी।

विज्ञान से आम जिंदगी को क्या फायदा?

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक का फायदा सिर्फ बड़ी-बड़ी लैब्स और स्पेस रिसर्च तक ही सीमित नहीं रहेगा:

बेहतर मेडिकल स्कैन: वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का इस्तेमाल PET स्कैन (कैंसर और अन्य बीमारियों की जांच के लिए होने वाला मेडिकल टेस्ट) में करने के लिए तीन पेटेंट (पेटेंट अधिकार) फाइल किए हैं। इससे डॉक्टरों को मरीजों के शरीर के अंदर की बेहद साफ तस्वीरें मिल सकेंगी।

इतिहास गवाह है: विज्ञान के इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है जब बड़े एक्सपेरिमेंट्स के लिए बनाई गई चीजें आम इंसान के काम आईं। जैसे, इंटरनेट (WWW) की शुरुआत भी CERN लैब से हुई थी और आज कैंसर के इलाज में काम आने वाली 'प्रोटॉन थेरेपी' भी पार्टिकल फिजिक्स की ही देन है। अब 'प्लेटन' भी इस लिस्ट में शामिल होने जा रहा है। 

यह भी पढ़ेंः रोहित शर्मा के वनडे संन्यास की अटकलों पर मदन लाल बोले- फैसला पूरी तरह उन्हीं पर निर्भर