मानव उत्पत्ति पर शोध का केंद्र अब वैश्विक दक्षिण की ओर, दक्षिण एशिया पर बढ़ा फोकस
वाराणसी (उत्तर प्रदेश): मानव उत्पत्ति पर वैश्विक शोध में लंबे समय से चली आ रही असमानताओं को दूर करने के लिए ऑस्ट्रेलिया के ग्रिफ़िथ विश्वविद्यालय के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय केंद्र ने दक्षिण एशिया को इस शोध के केंद्र में लाने का संकल्प लिया है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) इस पहल में एक प्रमुख भारतीय भागीदार है। बीएचयू के प्राणी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे इसमें सहयोगी अन्वेषक के रूप में शामिल हैं।
35 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का मिला अनुदान
दिसंबर 2025 में ऑस्ट्रेलियाई अनुसंधान परिषद ने "एआरसी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ट्रांसफॉर्मिंग ह्यूमन ओरिजिन रिसर्च" को देश के आठ उत्कृष्टता केंद्रों में से एक के रूप में नामित किया। इस केंद्र का निर्देशन प्रोफेसर माइकल पेट्राग्लिया कर रहे हैं। इसे 35 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का संघीय अनुदान मिला है। भागीदार विश्वविद्यालयों और संगठनों के योगदान को शामिल करने पर कुल निधि लगभग 85 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर होने का अनुमान है। यह परियोजना सात वर्षों तक चलेगी।
क्यों इंसान बने धरती की एकमात्र जीवित मानव प्रजाति?
केंद्र का मुख्य सवाल यह है कि होमो सेपियन्स पृथ्वी पर एकमात्र जीवित मानव प्रजाति क्यों बन गए। शोध अफ्रीका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के उन क्षेत्रों पर केंद्रित है, जिन्हें सामूहिक रूप से "दक्षिणी चाप" कहा गया है। इन क्षेत्रों में आधुनिक मानवों ने लंबे समय तक प्रवास, अनुकूलन और नवाचार किया, लेकिन यूरोसेंट्रिक आख्यानों में इन्हें अक्सर पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
शोध में तीन बड़ी असमानताओं को दूर करने का प्रयास
पेट्राग्लिया के अनुसार, मानव उत्पत्ति पर शोध लंबे समय से तीन प्रमुख समस्याओं से प्रभावित रहा है—भौगोलिक पूर्वाग्रह, स्वदेशी और पारंपरिक ज्ञान की उपेक्षा तथा औपनिवेशिक आख्यान। केंद्र का उद्देश्य इन बाधाओं को दूर करना है। 40 से अधिक शोधार्थियों, करीब 70 पीएचडी और मास्टर छात्रों तथा 100 से अधिक ऑनर्स छात्रों के लिए आधे अवसर स्वदेशी समुदायों या वैश्विक दक्षिण के शोधकर्ताओं को प्राथमिकता के आधार पर दिए जाएंगे।
भारत समेत कई देशों के संस्थान जुड़े
अंतरराष्ट्रीय साझेदारों में केन्या, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब, चीन, इंडोनेशिया, श्रीलंका और भारत के संस्थान शामिल हैं। भारत से बीएचयू और अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई इस पहल का हिस्सा हैं। केंद्र के लिए अगस्त 2026 के अंत में ब्रिस्बेन में एक कार्यशाला आयोजित की गई थी। पेट्राग्लिया के अनुसार, इसमें दक्षिण अफ्रीका, केन्या, सऊदी अरब, भारत, चीन, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने रखे दो प्रस्ताव
प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने दो पैनल चर्चाओं में हिस्सा लिया। बैठक के दौरान पेट्राग्लिया ने कहा कि चौबे की भागीदारी ने दक्षिण एशिया पर केंद्र के फोकस को और मजबूत किया है। यह वही क्षेत्र है, जहां आदिमानवों ने काफी समय बिताया था। विचार-विमर्श के दौरान प्रोफेसर चौबे ने दो प्रस्ताव रखे, जिन पर सर्वसम्मति बनी। उन्होंने कहा कि कई देशों की पाठ्यपुस्तकों में आज भी औपनिवेशिक युग की गलत धारणाएं पढ़ाई जाती हैं, जिनमें नस्ल संबंधी सिद्धांत भी शामिल हैं। आधुनिक डीएनए अनुसंधान से पता चलता है कि मानव विविधता एक निरंतर प्रक्रिया है और कठोर नस्लीय श्रेणियां गहन जांच में खरी नहीं उतरतीं।
भाषा से भी मिलेगी मानव प्रवास की जानकारी
दूसरे प्रस्ताव में प्रोफेसर चौबे ने भाषाई पृथकताओं के व्यवस्थित अध्ययन की बात कही। दक्षिण एशिया और पड़ोसी क्षेत्रों में पाई जाने वाली विभिन्न भाषाएं प्रवास, अलगाव और प्राचीन संपर्क के बारे में महत्वपूर्ण सुराग दे सकती हैं। उनके अनुसार, मानव की कहानी को आनुवंशिकी, पुरातत्व और भाषाविज्ञान के एकीकरण से ही पूरी तरह समझा जा सकता है।
दक्षिण से लिए गए नमूनों की व्याख्या भी दक्षिण में हो
प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य उन वैज्ञानिकों और क्षेत्रों के सहयोग से मानव उत्पत्ति की कहानी लिखना है, जो इस इतिहास के केंद्र में स्थित हैं। लंबे समय से इस बात को लेकर असंतोष रहा है कि नमूने दक्षिण से लिए जाते हैं, लेकिन उनकी व्याख्याएं केवल उत्तर में ही की जाती हैं। यह केंद्र इसी असंतुलन को दूर करने का लक्ष्य रखता है।
(एएनआई)
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