उम्र बढ़ने पर क्यों कमजोर होती हैं मांसपेशियां? वैज्ञानिकों ने खोजा अहम कारण, चूहों पर प्रयोग में दिखी उम्मीद
वॉशिंगटन: उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों का कमजोर होना एक आम समस्या है, लेकिन वैज्ञानिकों ने अब इसके पीछे काम करने वाले एक ऐसे तंत्र की पहचान की है, जो मांसपेशियों को नुकसान से बचाने में भूमिका निभा सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के शोधकर्ताओं के अध्ययन के मुताबिक, मांसपेशियां कोशिकाओं को नुकसान से बचाने के लिए अपनी ताकत और ऊर्जा इस्तेमाल करने के तरीके में बदलाव कर सकती हैं। चूहों पर किए गए प्रयोगों में एक खास अणु के स्तर में बदलाव से मांसपेशियों के क्षय में सुधार देखा गया और समय से पहले होने वाली मौतों को रोका गया। इससे उम्र से जुड़ी मांसपेशियों की कमजोरी के संभावित उपचार की नई राह खुल सकती है।
उम्र बढ़ने पर मांसपेशियों में क्यों होता है बदलाव?
उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों की ताकत कम होने लगती है और कोशिकाओं में मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है। माइटोकॉन्ड्रिया कोशिकाओं के ऐसे हिस्से हैं, जो शरीर की गतिविधियों के लिए जरूरी ऊर्जा बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। मांसपेशियों में अलग-अलग तरह के फाइबर होते हैं। फास्ट-ट्विच फाइबर तेजी से और अधिक ताकत के साथ काम करते हैं, लेकिन जल्दी थक जाते हैं। वहीं, स्लो-ट्विच फाइबर लंबे समय तक चलने वाली गतिविधियों में मदद करते हैं और ऊर्जा उत्पादन के लिए माइटोकॉन्ड्रिया पर अधिक निर्भर रहते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों में स्लो-ट्विच फाइबर का अनुपात बढ़ सकता है, जबकि इसी दौरान माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यक्षमता घटने लगती है। इस बदलाव ने वैज्ञानिकों के सामने सवाल खड़ा किया कि मांसपेशियां ऊर्जा बनाने की कम प्रभावी होती जा रही प्रणाली पर अधिक निर्भर क्यों होने लगती हैं।
कार्डियोलिपिन अणु की अहम भूमिका
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए शोधकर्ताओं ने कार्डियोलिपिन नाम के एक खास वसा अणु पर ध्यान केंद्रित किया। यह मुख्य रूप से माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली में पाया जाता है और उसकी संरचना को बनाए रखने में मदद करता है। कार्डियोलिपिन की कमी होने पर माइटोकॉन्ड्रिया की ऊर्जा बनाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, कोशिकाओं के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी संकेतों और पदार्थों के उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि चूहों और इंसानों, दोनों के मांसपेशी ऊतकों में उम्र बढ़ने या बीमारी के साथ कार्डियोलिपिन का स्तर कम हो सकता है। इसके साथ माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना और सामान्य कार्यप्रणाली में भी बदलाव देखे गए।
चूहों पर प्रयोग में मांसपेशियों के क्षय में सुधार
यह पता लगाने के लिए कि कार्डियोलिपिन की कमी इन बदलावों का कारण बनती है या केवल उनके साथ दिखाई देती है, वैज्ञानिकों ने युवा चूहों में इसके स्तर को कम किया। प्रयोग में मांसपेशियों के फाइबर फास्ट-ट्विच प्रकार से स्लो-ट्विच प्रकार की ओर बदलने लगे। यह वही पैटर्न था, जिसे शोधकर्ता पहले उम्र बढ़ने वाली मांसपेशियों में देख चुके थे। अध्ययन के मुताबिक, कार्डियोलिपिन के स्तर में बदलाव करने पर मांसपेशियों के क्षय में सुधार हुआ और प्रयोग में शामिल प्रभावित चूहों में समय से पहले होने वाली मौतों को रोका जा सका। हालांकि, ये परिणाम पशु-अध्ययन से मिले हैं और इंसानों में इसी तरह के प्रभाव की पुष्टि अभी नहीं हुई है। शोधकर्ताओं के आगे के प्रयोगों से पता चला कि मांसपेशियों के फाइबर में यह बदलाव कोशिकाओं को नुकसान से बचाने की एक प्रतिक्रिया हो सकता है। कार्डियोलिपिन का स्तर कम होने पर क्षतिग्रस्त माइटोकॉन्ड्रिया से रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज (ROS) नाम के अणुओं का उत्पादन बढ़ सकता है। इनकी अधिक मात्रा कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है, हालांकि ये कोशिकाओं को तनाव और क्षति का संकेत देने में भी भूमिका निभाते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि ROS फास्ट-ट्विच फाइबर से स्लो-ट्विच फाइबर में बदलाव शुरू करने में मदद करते हैं। जब कार्डियोलिपिन की कमी वाली मांसपेशी कोशिकाओं को एंटीऑक्सीडेंट से उपचार दिया गया, तो यह बदलाव कम हो गया।
ERRγ प्रोटीन भी निभाता है अहम भूमिका
अध्ययन में ERRγ नाम के प्रोटीन की भी पहचान की गई, जो इस प्रक्रिया को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह कोशिकाओं को माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना में बदलाव करने और मांसपेशी फाइबर के गुणों को बदलने में मदद करता है। शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में विकसित मांसपेशी कोशिकाओं में ERRγ की गतिविधि रोकी, तो फाइबर के एक प्रकार से दूसरे प्रकार में बदलने की प्रक्रिया रुक गई। इससे संकेत मिला कि यह प्रोटीन मांसपेशियों की अनुकूलन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकता है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि कार्डियोलिपिन की कमी वाले चूहे अपने रक्त से अधिक ग्लूकोज अवशोषित कर रहे थे। हालांकि, मांसपेशियां इस अतिरिक्त शर्करा का इस्तेमाल मुख्य रूप से ऊर्जा बनाने के लिए नहीं कर रही थीं। विशेष रूप से चिह्नित ग्लूकोज की मदद से किए गए प्रयोगों में पता चला कि मांसपेशी कोशिकाएं इसका उपयोग एंटीऑक्सीडेंट बनाने के लिए कर रही थीं। इससे उन्हें अधिक मात्रा में ROS के हानिकारक प्रभावों से बचने में मदद मिल सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के सहायक प्रोफेसर और अध्ययन के प्रमुख लेखकों में शामिल फैबियन फिंगर के मुताबिक, मांसपेशी फाइबर का यह बदलाव केवल मांसपेशियों की विफलता नहीं, बल्कि नुकसान से बचने के लिए ताकत के इस्तेमाल में बदलाव भी हो सकता है। उन्होंने बताया कि जब चूहों को ROS को कम करने के लिए एंटीऑक्सीडेंट दिए गए, तो उनकी मांसपेशियों का प्रदर्शन बेहतर होने के बजाय और खराब हुआ। इससे संकेत मिलता है कि इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करते समय कोशिकाओं की प्राकृतिक सुरक्षा प्रतिक्रिया को समझना जरूरी है।
मांसपेशियों की कमजोरी के इलाज की नई उम्मीद
शोधकर्ताओं के मुताबिक, कार्डियोलिपिन और ERRγ भविष्य में उम्र से जुड़ी मांसपेशियों की कमजोरी के संभावित उपचार के लिए अहम लक्ष्य बन सकते हैं। हालांकि, मांसपेशियों के क्षय को रोकने और उसमें सुधार से जुड़े प्रयोग चूहों पर किए गए थे। इंसानी मांसपेशियों के नमूनों का इस्तेमाल मुख्य रूप से उम्र के साथ कार्डियोलिपिन के स्तर में बदलाव की जांच के लिए किया गया। अध्ययन में एलामिप्रेटाइड दवा का भी उल्लेख किया गया है, जिसे कार्डियोलिपिन को स्थिर करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। यह बार्थ सिंड्रोम नाम की दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी के उपचार के लिए विकसित की गई है। हालांकि, उम्र से जुड़ी सामान्य मांसपेशियों की कमजोरी में इसकी प्रभावशीलता अभी स्थापित नहीं है। ERRγ को सक्रिय करने वाली दवाओं पर भी अन्य चिकित्सकीय उपयोगों के लिए शुरुआती स्तर पर शोध किया जा रहा है। भविष्य में कार्डियोलिपिन के स्तर को बेहतर बनाने या ERRγ के जरिए मांसपेशियों की सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया को प्रभावित करने की रणनीतियों पर काम किया जा सकता है।
थोड़े से बदलाव से भी मिल सकती है मदद
अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के एसोसिएट प्रोफेसर ज़ैकरी गेरहार्ट-हाइन्स ने कहा कि कार्डियोलिपिन के स्तर में आंशिक सुधार से भी मांसपेशियों की स्थिति में बदलाव देखने को मिला। अब शोधकर्ता यह जानना चाहते हैं कि क्या उम्र बढ़ने वाली मांसपेशियों में कार्डियोलिपिन का स्तर बढ़ाया जा सकता है या ERRγ को लक्षित करके कोशिकाओं की स्वस्थ अनुकूलन प्रक्रिया को बढ़ावा दिया जा सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इन निष्कर्षों से उम्र से जुड़ी मांसपेशियों की कमजोरी को समझने और भविष्य में उसके उपचार के नए तरीके विकसित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इंसानों में इन संभावित उपचारों की सुरक्षा और प्रभावशीलता निर्धारित करने के लिए आगे के शोध की जरूरत है।
(ANI)
ये भी पढ़ें: ट्रंप ने नेतन्याहू के चुनावी प्रदर्शन का लिया श्रेय, बोले- इज़राइल में गठबंधन सरकार बनाने पर करेंगे विचार