इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा-वृंदावन में भीड़ प्रबंध

मथुरा-वृंदावन में भीड़ प्रबंधन पर हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार को दी कई अहम सिफारिशें

Allahabad HC Issues Crowd Management Recommendations for Mathura-Vrindavan

प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वृंदावन में कथित अवैध निर्माण से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए मथुरा-वृंदावन में भीड़ प्रबंधन में गंभीर कमियों को दूर करने के लिए कार्यवाही का दायरा बढ़ाया और उत्तर प्रदेश सरकार को कई सिफारिशें जारी कीं।

न्यायमूर्ति ने कहा भगदड़ और भीड़ केवल प्रशासनिक चूक नही

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की अध्यक्षता वाली एकल-न्यायाधीश पीठ ने कहा कि धार्मिक सभाओं में भगदड़ और भीड़ से संबंधित घटनाएं केवल प्रशासनिक चूक या अपर्याप्त बुनियादी ढांचे का परिणाम नहीं हैं। भीड़ के व्यवहार के विज्ञान को समझने में विफलता का परिणाम हैं।

अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई में भेदभाव का आरोप

यह याचिका मूल रूप से स्वामी शिव स्वरूपानंद जी महाराज द्वारा वृंदावन में अपनी भूमि पर आश्रम के निर्माण से संबंधित विध्वंस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता ने 23 अवैध निर्माणों में से केवल कुछ के खिलाफ चुनिंदा कार्रवाई का आरोप लगाते हुए इसे "मनमानी" वाला दृष्टिकोण बताया।

त्योहारों में भगदड़ की घटनाओं पर अधिकारियों से मांगे हलफनामे

मथुरा-वृंदावन में होली और अन्य त्योहारों के दौरान हाल ही में हुई भगदड़ जैसी घटनाओं का संज्ञान लेते हुए, अदालत ने मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) के उपाध्यक्ष, जिला मजिस्ट्रेट, नगर आयुक्त और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से विस्तृत हलफनामे मांगे।

अवैध निर्माण के आंकड़ों को कोर्ट ने बताया समस्या का छोटा हिस्सा

MVDA के हलफनामे के अनुसार, 2021-22 और 2025-26 के बीच अवैध निर्माणों के खिलाफ 2,453 नोटिस जारी किए गए। इनमें से 700 मामलों में विध्वंस आदेश पारित किए गए, लेकिन केवल 323 पर ही अमल किया गया। कुल 104 संपत्तियों को सील किया गया और 212 मामलों में समझौता किया गया। अदालत ने इन आंकड़ों को "समस्या का एक छोटा सा हिस्सा" बताया, जिससे संकेत मिलता है कि वास्तविक समस्या कहीं अधिक गंभीर है।

भीड़ प्रबंधन को केवल यातायात नियंत्रण तक सीमित करने पर नाराजगी

पीठ ने पाया कि मथुरा में भीड़ प्रबंधन को काफी हद तक यातायात प्रबंधन तक सीमित कर दिया गया है। ये भीड़ की गतिशीलता की मूलभूत गलतफहमी को दर्शाता है। अदालत ने कहा कि धार्मिक सभाएं राजनीतिक रैलियों या खेल आयोजनों से काफी अलग होती हैं, क्योंकि भावनात्मक जुड़ाव के कारण श्रद्धालु अक्सर खतरे के प्रति कम जागरूक हो जाते हैं।

भीड़ विज्ञान पर कोर्ट ने बताई गंभीर स्थिति

भीड़-भाड़ के विज्ञान पर हुई स्टडीज़ का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रति वर्ग मीटर चार से पाँच लोगों की भीड़ होने पर लोगों का खुद पर नियंत्रण कम होने लगता है। जबकि प्रति वर्ग मीटर छह से सात लोगों की भीड़ दम घुटने जैसे हालात पैदा कर सकती है। ऐसी स्थिति अक्सर भारत में तीर्थस्थलों पर देखने को मिलती है

धार्मिक शहरों के लिए लंबी अवधि की योजना की जरूरत

न्यायालय ने मथुरा के लिए अपनाई गई अल्पकालिक योजना की भी आलोचना करते हुए कहा कि मथुरा, अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट जैसे अपार सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व वाले शहरों के लिए लंबे समय की शहरी योजना की जरूरत है और इन्हें सामान्य शहरों की तरह नहीं माना जा सकता।

अवैध निर्माण नेटवर्क पर संस्थागत इच्छाशक्ति की जरूरत

यह देखते हुए कि तीर्थ नगरों में अवैध निर्माण अक्सर भूमि माफियाओं, बिल्डरों और राजनीतिक संरक्षण से जुड़े संगठित नेटवर्क द्वारा संचालित होते हैं। न्यायालय ने कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए केवल कड़े कानूनों के बजाय मजबूत संस्थागत इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

भीड़ विज्ञान को पाठ्यक्रम और शहरी योजना में शामिल करने की सिफारिश

उच्च न्यायालय ने शहरी नियोजन, आपदा प्रबंधन, सिविल इंजीनियरिंग और मनोविज्ञान से संबंधित विश्वविद्यालय पाठ्यक्रमों में भीड़ व्यवहार विज्ञान को एक औपचारिक विषय के रूप में शामिल करने की सिफारिश की। इसने IIT कानपुर या IIT रुड़की जैसे संस्थानों के सहयोग से भीड़ विज्ञान और शहरी जोखिम प्रबंधन पर एक उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने, दिल्ली शहरी कला आयोग की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के लिए एक वैधानिक शहरी डिजाइन आयोग बनाने, प्रमुख सार्वजनिक आयोजनों के लिए प्रमाणित भीड़ सुरक्षा विशेषज्ञों को अनिवार्य करने और तीर्थ नगरों के लिए मास्टर प्लानिंग और भवन विनियमों में भीड़ विज्ञान को शामिल करने का भी सुझाव दिया।

याचिकाकर्ता को राहत, आदेश पर पुनर्विचार की अनुमति

याचिकाकर्ता को राहत देते हुए, न्यायालय ने उसे सक्षम प्राधिकारी के समक्ष एक नया अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की अनुमति दी, जो सर्वोच्च न्यायालय के 13 नवंबर, 2024 के निर्देशों और बाद के सरकारी परिपत्रों के आलोक में मामले पर पुनर्विचार करेगा। आगरा संभागीय आयुक्त का 4 सितंबर, 2025 का आदेश स्थगित रहेगा।

हाईकोर्ट की सिफारिशों पर विचार के लिए आदेश भेजने के निर्देश

न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि इसकी सिफारिशों पर उचित विचार के लिए इसके आदेश की एक प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, राज्य उच्च शिक्षा सचिव, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष और केंद्रीय उच्च शिक्षा सचिव को भेजी जाए। (Source: ANI)

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